एक महिला काम से, घर में भी काम पर ही आती है, और पुरुष संवेदनशील होने का नाटक करते है, इसे समझे पुरुष वर्ग
mahendra india news, new delhi
लेखक
नरेंद्र यादव
नेशनल वाटर अवॉर्डी
यूथ एंपावरमेंट मेंटर
जीवन की बढ़ती भाग दौड़ को मद्देनजर आजकल घर की महिलाओं और विशेषकर शहरी बहनों को भी नौकरी करनी पड़ रही है, या अपने घरेलू व्यवसाय में भी भाग लेने की मजबूरी है, या दूसरे छोटे छोटे व्यवसाय शुरू करने पड़ रहे है, वैसे इसमें कोई बुराई भी नहीं है, हमारी बहनों, बेटियों को अपनी योग्यता को सिद्ध करने का अवसर मिलना चाहिए और मिल रहा है, अपनी योग्यता अनुसार प्रशासनिक सेवाओं में, शिक्षण के क्षेत्र में, डिफेंस में, पुलिस सेवा में, बिजनेस में, खेलकूद के क्षेत्र में, या कृषि के क्षेत्र में या फिर अन्य किसी भी क्षेत्र में बहुत ही बेहतरीन कार्य कर रही हमारी बहन बेटियां अपनी इच्छा अनुसार कार्य करने को स्वतंत्र है।
ये बहुत अच्छी बात है कि हमारे समाज में महिलाओं को कार्य करने की सहमति व स्वीकृति बहुत पहले ही मिल गई थी और कितनी ही हमारी बहने विश्व स्तर पर बड़ी बड़ी कंपनियों के सर्वोच्च्य पदों पर कार्य कर रही है, लेकिन इसके विपरित रोजी रोटी के लिए विभिन्न संस्थानों में काम करते हुए भी उनके कंधों पर घर की साज सम्भाल की जिम्मेदारी होती है, इसमें भी कोई दो राय नहीं है, वो अपने सरकारी या व्यवसायिक संस्थानों से घर पर आने के बाद भी बच्चों की देखभाल, व घर के अन्य कार्यों की भी जिम्मेदारी उन बहनों की ही होती है। एक तरफ पुरुष है जो अगर किसी भी प्रकार की नौकरी या व्यवसायिक गतिविधियां करता है तो उन्हें तो घर के विभिन्न कार्यों से छूट मिल जाती है।
अगर वो अपने काम से देर से भी आए तो भी उन्हें कुछ नहीं कहा जाता है, कोई पूछने वाला नहीं होता है, परंतु हमारी महिलाएं थोड़ी देर से भी आएं तो पूछताछ होती है, इसके दो कारण हो सकते है एक तो उनकी सुरक्षा के प्रति गंभीरता, दूसरा उनको अपने नियंत्रण में रखना, हां अगर सुरक्षा का विषय है तो इसमें कोई बुराई नहीं है। अगर उनपर कठोर पहरेदारी करना चाहते हो तो वो बिल्कुल गलत है। महिलाएं अधिक संवेदनशील होती है, घर में संस्कार महिलाओं से ही आते है, घर में उत्साह व उल्लास महिलाओं से आता है, घर में व्यवस्था भी महिलाओं की ही देन है।
जब हम भगवान शिव के अर्धनारीश्वर रूप की बात करते है तो वहां सभी 26 दैवीय गुणों का विमर्श होता है, जो श्रीमद्भगवद् गीता के सोहलवें अध्याय के पहले तीन श्लोक में दिए गए है। कुछ गुण स्त्री के होते है कुछ गुण पुरुष के होते है, जब हम इन सभी गुणों को एक ही स्त्री या पुरुष में खोजते है तो वो किसी के पास नहीं मिलते है। जब कोई पुरुष संवेदनशीलता या आंखों से आंसु छलकाने की बात करता है तो लोग यही कह कर उसे अवसादित करते है कि क्या तुम स्त्रियों की तरह व्यवहार कर रहे हो, और जब कोई लड़की लड़कों की तरह वीरता का व्यवहार करती है तो उसे भी ऐसे ही कहा जाता है कि तुम अपनी सीमा में रहना सीखो, स्त्रियों सा व्यवहार करो। बस यही नियंत्रण चाहे वो स्त्री पर हो या फिर पुरुष पर हो, वही उन्हें अधूरा रहने के लिए मजबूर करता है।
जब कोई भी इंसान अर्धनारीश्वर के रूप में संपूर्णता से दूर रहता है तो उसी अधूरेपन को दूसरे इंसान अर्थात पुरुष है तो स्त्री में ढूंढता है, और अगर स्त्री है तो पुरुष में ढूंढती है, इसी अधूरेपन से व्यवस्था अव्यवस्थित होती है, यही अधूरापन जो खुद के भीतर है उसे हम दूसरों के पास ढूंढते है। जीवन में संपूर्णता तभी आती है जब हम शिव के अर्धनारीश्वर वाले रूप में जीने की प्रैक्टिस करते है। यहां एक बात और कहने की है कि यही स्थिति हमारे स्वास्थ्य पर भी विपरीत प्रभाव डालती है क्योंकि यहां हम अपनी भावनाओं को दबाने का कार्य करते है, जिससे हमारी तंत्र तंत्रिका डिस्टर्ब होती है और हमारी सेहत पर असर पड़ता है।
मान लो किसी पुरुष को ऐसी पीड़ा है कि उसकी रोने की भावना है तो जब हम उसे ये कहकर रोकते है कि अरे तुम तो पुरुष हो, कैसे महिलाओं की तरह रो रहे हो, तो इस कथन से किसी भी पुरुष का पुरुषत्व जाग जाता है और वह रोने में खुद को अपमानित महसूस करता है, यही तो समस्या है, यही है दैवीय गुणों से दूर जाना, यही है मानवता का अधूरापन, जिसे हमारे सम्मान अपमान से जोड़ दिया जाता है। इंसान जब अधूरा होता है तो वो खुद का सम्मान दूसरे को नियंत्रण करने में खोजता है, वह अपना सम्मान दूसरे के अपमान में खोजता है, वह अपनापन दूसरे में ढूंढता है, इसे ही पूरा करने की जरूरत है। स्त्री और पुरुष दोनों एक ही गाड़ी के दो पहियों की तरह है, जिन्हें समान ऊंचाई, समान सम्मान, समान अवसर, समान पौषण, समान कार्य तथा समान भाव देने की आवश्यकता है, तभी कोई भी इंसान इस धरा पर प्रसन्न रह सकता है। हम सभी को घर में भी मिलजुल कर कार्य करने की जरूरत है।
घरेलू कार्यों में भी मिलजुल कर कार्य करने की जरूरत है, बच्चों की देखभाल में भी समान दृष्टिकोण होना चाहिए, हर कार्य में भी निर्णय आपसी तालमेल से ही होना चाहिए, एक दूसरे के दुख तक़लीफ को महसूस करने की आवश्यकता है, तभी सम्पन्नता आती है। यहां स्त्री के प्रति सभी पुरुषों के भाव सम्मानजनक होने चाहिए, चाहे वो भाई के रूप में हो, या पति के रूप में हो, बेटे के रूप में हो, ससुर के रूप में हो, चाहे पिता के रूप में या फिर दादा के रूप में हो, घर में महिलाओं को उनका ड्यू रिगार्ड देने की आवश्यकता है, इसी प्रकार एक पुरुषों के प्रति भी स्त्रियों के भाव समान होने चाहिए, चाहे वो बेटी के रूप में हो, बहन के रूप में हो, चाहे वो पत्नी के रूप में हो, चाहे माता के रूप में हो, चाहे सास के रूप में हो, चाहे वो दादी के रूप में हो, सभी को सम्मान देने का व्यवहारिक रूप होना चाहिए, तभी कोई भी रिश्ता संपूर्ण माना जाता है।
कोई भी स्त्री चाहे वो कितने भी बड़े पद पर कार्य कर रही हो, लेकिन उसे अपने ऑफिशियल कार्य के बाद भी घर में भी एक दूसरी जिम्मेदारी संभालनी होती है, वह घर की देखभाल, बच्चों की देखभाल, भोजन आदि की व्यवस्था, बच्चों को संस्कार देने की बात, वह एक कार्य से घर में भी दूसरे कार्य के लिए ही आती है। बस यही बात हर पुरुष को समझनी है कि वो भी इंसान है, उसके कार्यों में हाथ बटाना चाहिए, चाहे पुरुष पति के रूप में हो, चाहे भाई के रूप में हो, चाहे बेटे के रूप में हो, उनके द्वारा किए गए कार्यों की सराहना भी होनी चाहिए, घर में उनके द्वारा की जा रही घर की व्यवस्था की प्रशंसा जहां पति को करनी चाहिए वहीं बेटे को भी करनी चाहिए, ससुर को भी करनी चाहिए।
कभी कभी उनके कार्य पुरुषों को करने चाहिए ताकि वो भी कभी आराम कर सकें। ऐसा किसी शास्त्र में नहीं लिखा हुआ है कि घर के सभी कार्य केवल स्त्रियों द्वारा ही किए जाएंगे, लेकिन ये हमारे चलन में है, चाहे महिला कितने ही महत्वपूर्ण पद पर हो, लेकिन बच्चों को संस्कारित उन्ही द्वारा किया जाएगा, वो उनको प्रकृति द्वारा प्रदत्त गुणों के कारण होता है। बस इन्हीं गुणों को संजोकर रखने की जरूरत है। अगर हम अर्धनारीश्वर नहीं बन सकते है तो एक दूसरे का सहयोग तो करना सीखें, एक दूसरे का सहारा तो बनें, एक दूसरे की ताकत तो बनें, एक दूसरे को सम्मान देना तो सीखें, यही जीवन है। अगर कोई बहन, बेटी या मां अपने ऑफिशियल कार्य से आती है तो उसे घर में थोड़ा आराम, थोड़ा सम्मान, थोड़ा सकून तथा थोड़ी जिम्मेदारी बांटने की संवेदना अवश्य मिलनी चाहिए।
वर्तमान समय की भागदौड़ में न जाने हम अपने भारतीय संस्कार कहां छोड़ते जा रहे है, यह ध्यान देने की जरूरत है। मन शांत व सशक्त करने का अभ्यास सभी को करना चाहिए और एक बात सभी को ध्यान में रखने की जरूरत है कि हम सब इंसान है, गलती हो जाती है, परंतु हम सभी को उस गलती का एहसास करना चाहिए, उस गलती पर पछतावा होना चाहिए, उस गलती पर ग्लानि होनी चाहिए और उस गलती को पुनः न करने का संकल्प होना चाहिए, तभी जीवन चलता है अन्यथा कितनी भी सम्पन्नता आ जाए, कितना भी सशक्तिकरण आ जाए, कितने भी भौतिक सुख आ जाए, व्यक्ति कभी प्रसन्न नहीं हो पाएगा और रिश्ते ऐसे ही टूटते रहेंगे। आओ मिलकर जीवन को सत्यम, शिवम, सुंदरम की राह पर ले जाने का संकल्प लें, और एक दूसरों का सम्मान करना सीखें।
जय हिंद, वंदे मातरम