राजनीतिक दल के कार्यकर्ता से पहले आप मतदाता है, मतदाता धर्म का पालन करना चाहिए

 

mahendra india news, new delhi

लेखक
नरेंद्र यादव
नेशनल वाटर अवॉर्डी
यूथ एंपावरमेंट मेंटर
जब कोई भी मतदाता अपने मतदाता धर्म को भूलकर केवल एक पक्ष में खड़ा होकर, किसी भी राजनीतिक पार्टी का कार्यकर्ता बन कर अपने विचारों को सीमित तथा अपने दायरे को सीमित करके कोई भी कार्य करते है तो वह राष्ट्र के प्रति वफादार नहीं रह सकता है, राष्ट्र के हर पहलू को देखने में सक्षम नहीं रहा है, क्योंकि उसने मतदाता होने की भूमिका नहीं निभाई है। मत प्रकट करने की जिम्मेदारी जो एक मतदाता को मिलती है वो कार्यकर्ता बनकर उसे गंवा देते है। जब हम किसी भी पार्टी के पक्ष में खड़े हो जाते है तो फिर कोई भी व्यक्ति अपने ही राष्ट्र का पक्ष छोड़ देते है।

यहां दो पक्ष होते है पहला किसी भी राजनीतिक पार्टी का तथा दूसरा राष्ट्र या देश का पक्ष होता है। जब तक हम एक मतदाता बनकर रहते है तब तक तो हम राष्ट्र के प्रति जवाबदेह रहते है, क्योंकि हम अपने विवेक से मतदान करते है, लेकिन जब कोई मतदाता के अलावा कार्यकर्ता बन जाते है तो हम अच्छे बुरे का विश्लेषण करना छोड़कर अपनी ही पार्टी के साथ खड़े हो जाते है, जिससे उनकी विचार मंथन करने की क्षमता क्षीण हो जाती है, विचारशीलता भी क्षीण हो जाती है। जब हम राष्ट्र को विकसित करने की बात करते है तो हर मतदाता को अपना मत प्रकट करने के लिए स्वतंत्र रहने की जरूरत होती है। किसी भी राजनीतिक दल का कार्यकर्ता बनने से थोड़ा बहुत व्यक्तिगत लाभ तो हो सकता है, ऐसे लोगों को उनकी योग्यता से अधिक व्यक्तिगत फायदा तो हो सकता है, लेकिन ऐसे व्यक्ति जो मतदाता का धर्म भूलकर कार्यकर्ता बनकर अपनी स्वतंत्रता को किसी एक राजनीतिक दल के हवाले कर देते है, वो लोग समाज और राष्ट्र का बहुत अधिक नुकसान करते है। वोटर्स होना बेहद जिम्मेदारी का काम है, प्रिय मतदाता साथियों वोटर्स का देश के लोकतंत्र को सशक्त करने के लिए एक बड़ा दायित्व है, एक जिम्मेदारी का कार्य होता है।

मतदाता व कार्यकर्ता के अर्थ का सार समझने के लिए हमे वोटर्स और पार्टी वर्कर्स के कार्यों पर विमर्श करना होगा। अगर हम मतदाता को देखें, तो उनकी कुछ इस प्रकार जवाबदेही होती है, जैसे ;
1. राष्ट्र को सर्वोपरि मानने वाला बनना होगा, निष्पक्ष बनना होगा।
2. राष्ट्र के पक्ष में अर्थात सत्य के पक्ष में रहना होगा।
3. नागरिकों के भले में सोचना होगा। राष्ट्र की संपदा के संरक्षण के बारे में विचारशील होना होगा।
4. तर्कशीलता तथा विश्लेषण करने की क्षमता होनी चाहिए, जिससे सच्चे, ईमानदार प्रत्याशियों को वोट दिया जा सकें।
5. किसी पर भी विश्वास करने से पहले राष्ट्र और नागरिकों के भले के दूरगामी परिणामों को दृष्टिगत रखना होगा।
6. अपना मत प्रकट करने के लिए स्वतंत्र मानसिकता का होना आवश्यक है।


7. सभी प्रकार की जाति, संप्रदाय से ऊपर उठकर देश के हित में मत करने का दृढ़ संकल्प होना चाहिए।
8. मतदाता वही है जो स्वतंत्रवरूप से मताधिकार करने की ताकत रखता हो।
9. दलगत राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्र के उत्थान के लिए वोट करने की इच्छा शक्ति का होना भी मतदाता की जवाबदेही है।
10. किस पार्टी को हराना है किस को जिताना है, इसकी स्पष्टता के साथ मतदान करने की तर्कशीलता व हिम्मत होनी चाहिए।
11. एक मतदाता सदैव देश के सर्वश्रेष्ठ लोगों को अलग अलग सेवाओं में देखना चाहते है, राष्ट्र का कार्य मेहनती, ईमानदार, संवेदशील महानुभावों के हाथ में हो, ताकि अंतिम से अंतिम व्यक्ति की जरूरतों का भी ख्याल किया जा सकें।
इसके धुर विरुद्ध कार्यकर्ता बनने के मकसद के  लिए तो केवल राजनीतिक दल की विचारधारा को फॉलो करने के लिए ही कार्य करते है, इसमें कोई विशेष काबिलियत की जरूरत नहीं होती है, बस कुछ बाते ध्यान रखनी है, जैसे ;
1. पार्टी लाइन पर कार्य करना है।


2. अपने मताधिकार का स्वतंत्र विचारधारा की बजाय पार्टी के लिए वोट करना है।
3. लकीर का फकीर बनकर खुद को जानने के लिए नहीं, केवल मानने के लिए तैयार करना है।
4. सत्य के पक्ष की बजाय अपने राजनीतिक दल की विचारधारा का अनुसरण करना है।
5. किसी प्रकार की तर्कशीलता, विश्लेषणात्मक शक्ति की जरूरत नहीं होती है।
6. कार्यकर्ता स्वतंत्र मतदाता नहीं हो सकते है, वो अपनी राजनीतिक पार्टी को फॉलो करते है जिनके वो कार्यकर्ता है।
7. ऐसे लोगों को अधिक विचार विमर्श करने की जरूरत नहीं होती है, वो प्रश्न करने से वंचित रह जाते है।
8. पार्टी कार्यकर्ता सत्य से अधिक, निष्पक्ष होने से अधिक या राष्ट्र से अधिक पार्टी की भलाई की बात सोचते है।


बस यही फर्क होता है एक स्वतंत्र मतदाता और पार्टी कार्यकर्ता में, कार्यकर्ता बनकर अपनी स्वतंत्र विचारधारा को तिलांजलि देकर, अपनी पार्टी की सर्वोच्च्य लीडरशिप को सबकुछ मानकर अपना मत देते है, चाहे वो भला करें या बुरा करें। किसी भी राजनीतिक दल के जितने अधिक कार्यकर्ता बनेंगे, उतना ही मताधिकार को किसी एक दल के नाम करेंगे, फिर मत राष्ट्र प्रथम के लिए नहीं,

पार्टी प्रथम के लिए ही होगा, जो राष्ट्र के विकास के लिए घातक होगा, जो सशक्त लोकतंत्र के लिए हानिकर होगा। जब कोई भी व्यक्ति किसी एक पक्ष में हो जाता है तो वो अपनी निष्पक्षता को त्याग देता है, वो अपनी विवेकशीलता वा तर्कशीलता को भी त्याग देते है, वो न्याय की प्रक्रिया से भी हट जाते है क्योंकि ऐसे लोगों के लिए उनकी राजनीतिक पार्टी व अपनी ही पार्टी के नेता सर्वोपरि होते है। जब भी मतदान के लिए जाते है तो उन्हें अपने ही प्रत्याशी दिखते हैं चाहे वो अनपढ़ हो, अपराधी हो, कम पढ़े लिखे हो, चाहे उनके खिलाफ कितने ही मुकदमे दर्ज हो। जिस भी संगत में एक मतदाता, कार्यकर्ता बनकर रहता है, उनकी संगत से वो प्रभावित होता है। मतदाता होना कार्यकर्ता होने से ज्यादा जरूरी है, क्योंकि लोकतंत्र में मतदाता होना किसी पार्टी के कार्यकर्ता से अधिक महत्वपूर्ण है। मतदाता जितना जागरूक होगा लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा।
जय हिंद, वंदे मातरम