क्या इंसान ही अतिथि हो सकता है?  नहीं, एक स्ट्रे कैटल भी अतिथि हो सकता है, इसे सभी समझे

 
Can only a human be a guest?   No, even a stray cattle can be a guest, everyone should understand this
 
mahendra india news, new delhi
लेखक
नरेंद्र यादव
नेशनल वाटर अवॉर्डी
यूथ एंपावरमेंट मेंटर
क्या अतिथि केवल इंसान के रूप में ही आते है? क्या अतिथि हमारे जानकार ही हो सकते है? नहीं, अतिथि तो कोई भी हो सकते है, जो बिना तिथि बताए आपके द्वार पर आते है वो सभी अतिथि है, चाहे वो इंसान हो, चाहे वो पशु हो, चाहे वो पक्षी हो, चाहे वो बिल्ली हो जो दरवाजे पर म्याऊं म्याऊं करके पुकारती है, फिर चाहे वो कुत्ते हो, सुबह सुबह हमारे दरवाजे पर रोटी के टुकड़े के लिए दस्तक देते है, चाहे फिर वो स्ट्रे कैटल हो, गाय हो, नंदी हो, जो हमारे दरवाजों पर बड़ी ही आस से आते है, वो सभी अतिथि है। इंसान एक मात्र प्रजाति है जो इस पृथ्वी के सबसे अधिक संसाधनों का उपयोग करती है, संसाधनों का दुरुपयोग भी करती है, जिससे हमारे दूसरे जीव जंतु ही नहीं, बल्कि इंसानों को भी भोजन तक उपलब्ध नहीं हो पाता है। लोग खुद के लिए तो छप्पन प्रकार के भोज तैयार कर लेते है लेकिन घर पर आने वाले कुत्ते बिल्लियों के लिए एक रोटी तक फालतू नहीं बनाते है। कुछ महानुभाव तो ऐसे रईस है कि उनके घरों में तो गिनती की ही रोटियां बनती है, कहां गाय की रोटी, कहां कुत्ते की रोटी, कहां चिड़ियों के लिए रोटी के टुकड़े मिलेंगे? लोग जितना आधुनिक व आर्थिक रूप से अमीर हो रहे है, वैसे ही वो भीतर से ईश्वर के प्रति कृतघ्न बनते जा रहे है, भीतर से बीमार बनते जा रहे है क्योंकि अगर उस सर्वशक्तिमान के प्रति कृतज्ञता हो तो फिर घर में गिन कर तो रोटी बिल्कुल नहीं बनाएंगे। कुछ लोगों के लिए अतिथि केवल उनके रिश्तेदार ही होते है और वो भी बिल्कुल नजदीकी, दूर के रिश्तेदारों से तो वैसे भी दूरी बनानी शुरू करने  लगे है। हम पंचभूत से बने है, इसमें एक महत्वपूर्ण तत्व आकाश है जो इंसान को बड़ा सोचने का अवसर प्रदान करता है, हृदय में विशालता का एहसास आकाश तत्व से ही आता है। जब अपने शरीर में पांचों तत्वों का एहसास करते है तभी वो गुण हमारे भीतर विकसित होते है, जैसे पृथ्वी तत्व धृति का द्योतक है, अर्थात धैर्य व धीरज लेकर आता है, वैसे ही जल तत्व जीवन में गति व शीतलता को विकसित करता है, वायु तत्व जीवंतता को दर्शाता है, इसी तरह अग्नि तत्व ऊर्जा, व ज्ञान रूपी प्रकाश को विकसित करता है। विचारों में विशालता, विराटता तथा सभी के उत्थान व कल्याण का विमर्श आकाश तत्व से विकसित होता है, तभी हम अपने पराए को छोड़कर सभी को भोजन, पानी, आश्रय देने की बात विचारते है, अन्यथा संकीर्णता घेर लेती है। अगर संकीर्णता होगी तो अतिथि का कोई मायने नहीं रह जाते है, जिनके भीतर संकीर्णता है, क्या वो किसी को देने की बात कर सकते है, क्या वो किसी के साथ शेयर करने का विमर्श रख सकते है, क्या वो किसी पशु पक्षी को अतिथि मान सकते है। ये जीवन की संकीर्णता ही तो है कि हम खुद की जरूरत के अलावा दूसरे के विषय में सोचते ही नहीं है। भारतीय संस्कृति ने तो वसुधैव कुटुंबकम् की बात की है, फिर अतिथियों में इंसान ही नहीं सभी जीव शामिल होने चाहिए, क्योंकि इस धरती पर जो भी जीव है वो एक परिवार का हिस्सा ही तो है। वसुधैव कुटुंबकम् के सिद्धांत को तो एक किसान बेहतर ढंग से निभाता है, उसके खेत से सभी पशु पक्षी कीट पतंगे भोजन लेते है, खेत में खड़े वृक्ष भी भोजन लेते है तथा मित्र कीट, मित्र वृक्ष, मित्र पक्षी व पशु मित्र होने का फर्ज भी अदा करते है, यही तो वसुधैव कुटुंबकम् का नियम है। कहना बहुत आसान है लेकिन किसी को अपने घर से एक टुकड़ा भी रोटी का न डालना, बड़ी मानसिक संकीर्णता को दर्शाता है। हम मन से बहुत छोटे होते जा रहे है, हम जीवन की धारा को बांधने में लगे हुए है, जिससे हम खुद तक सिमट कर रह जाते है। अगर घर के दरवाजे पर को पशु या स्ट्रे कैटल आ जाए तो उसे डंडे से भगाने का कार्य ही तो करते है, अगर घर की मुंडेर पर कोई पक्षी आकर बैठ जाए और बोलने लगे तो उसे उड़ाने और इरिटेट होने का ही तो कार्य करते है, अगर घर के द्वार पर कोई कुत्ता बिल्ली आ जाए तो डंडे से उसे भगाने का ही तो कार्य करते है, घर पर कोई भिखारी आ जाए तो उसे आगे चलने के लिए बोलते है, अगर द्वार पर कोई कुछ मांगने आ जाए तो उससे मुंह फेरने का ही तो कार्य करते है, यही तो संकीर्णता है। मानव होने के नाते मानवीय गुणों को भी विकसित करने की कौशिश करनी चाहिए, अन्यथा एक इंसान और पशु पक्षी में क्या अंतर रह जाएगा। हर समय इतना सतर्क रहना चाहिए कि घर के दरवाजे से कोई खाली हाथ न जाए, चाहे वो पशु हो, पक्षी हो, चाहे वो कोई स्ट्रे कैटल हो, चाहे वो कोई गाय हो, कोई नंदी हो, चाहे कोई मांगने वाला हो, कोई अनजान हो, गर्मियों के दिनों में घर के सामने पानी की व्यवस्था करनी चाहिए। घर में गिन गिन कर रोटियां नहीं बनानी चाहिए, क्योंकि फिर हम किसी अतिथि का हिस्सा नहीं रख पाएंगे। अगर अतिथियों का हिस्सा भी देना है, जो हमे उनके नाम से भी ईश्वर देता है, उन्हें देने की वृति बनानी चाहिए, ताकि जीवन में विशालता विकसित हो सकें। एक विशेष बात और स्पष्ट करनी है कि कुछ लोग ये भी जानना चाहते होंगे कि जो मेहमान तय समय पर आते है उन्हें क्या कहते है, दोस्तों उन्हें अभ्यागत कहते है, इसलिए अतिथि की जब बात करते है तो इसका अर्थ होता है बिना तय समय के कोई भी आए वो अतिथि है, चाहे वो इंसान, अन्य जीव ही क्यों न हो। उन सभी की सेवा सत्कार करना ही, अतिथि देवों भव: के मंत्र को सार्थकता प्रदान करता है। आओ सभी इस धरती माता के कर्ज को अदा करने का संकल्प करें, और जो हिस्सा दूसरे जीवों का हमारे पास है उसे खुद न खाकर उन्हें भी प्रेम व आदर के साथ देने का प्रण लें।
जय हिंद, वंदे मातरम