हरियाणा में अफीम की खेती में नहीं लागू होगा कमर्शियल क्वांटिटी,  20 वर्ष की सजा अवैध; हाई कोर्ट का मोटा फैसला 

 
mahendra india news, new delhi

हरियाणा प्रदेश की बड़ी खबरों में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट को लेकर है। हाईकोर्ट ने बुधवार को एनडीपीएस एक्ट से जुड़े एक केस में स्पष्ट किया है कि अफीम पोस्ता की खेती को कमर्शियल क्वालिटी की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

आपको बता देें कि कोर्ट ने कहा कि ऐसे केसों में 20 साल की कठोर कारावास की सजा देना स्पष्ट कानूनी त्रुटि और प्रत्यक्ष अवैधता है। जस्टिस अनूप चितकारा और जस्टिस सुखविंदर कौर की खंडपीठ ने हरियाणा प्रदेश के पानीपत निवासी सत्यवान की अपील पर सुनवाई हुई। कोर्ट में सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की।

बता दें कि कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई 20 वर्ष की सजा पर रोक लगाते हुए मामले को केवल सजा तय करने के उद्देश्य से दोबारा निचली कोर्ट को भेज दिया। केस के मुताबिक 13 मार्च 2019 को पुलिस को गुप्त सूचना मिली थी कि आरोपित अपनी बहन की भूमि पर अवैध रूप से अफीम पोस्ता की खेती कर रहा है।

जानकारी के अनुसार पुलिस ने मौके पर पहुंचकर करीबन 152 पोस्ता पौधे बरामद किए थे, इनका वजन 11 किलो 560 ग्राम पाया गया। इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने इसे कमर्शियल क्वांटिटी मानते हुए आरोपी को एनडीपीएस एक्ट की धारा 18(बी) के तहत दोषी ठहराकर 20 साल की कठोर कैद की सजा सुनाई थी। बता दें कि अपीलकर्ता की ओर से दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने कानून की गलत व्याख्या करते हुए धारा 18(बी) लागू कर दी, जबकि अफीम पोस्ता की खेती के मामलों में "स्माल क्वांटिटी" या "कमर्शियल क्वांटिटी" का कोई पृथक परविधान नहीं है।

ऐसे मामले धारा 18(सी) के अंतर्गत आते हैं, जहां अधिकतम सजा 10 वर्ष तक ही हो सकती है।खंडपीठ ने केंद्र सरकार की 19 अक्टूबर 2001 की अधिसूचना का हवाला देते हुए कहा कि अफीम पोस्ता की खेती से जुड़े अपराध धारा 18(सी) के तहत दंडनीय हैं, न कि धारा 18(बी) के तहत।

अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट यह बताने में पूरी तरह विफल रहा कि आखिर यह मामला कमर्शियल क्वांटिटी की श्रेणी में कैसे आता है।

कोर्ट एक दिन अधिक की सजा भी नहीं दे सकती
जानकारी के अनुसार हाई कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 20(1) का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति को कानून में निर्धारित अधिकतम सीमा से अधिक दंड नहीं दिया जा सकता। अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि जब कानून सजा की अधिकतम सीमा तय कर देता है, तब अदालत एक दिन अधिक की सजा भी नहीं दे सकती।

कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट है कि इस मामले में धारा 18(सी) लागू होती है, जहां अधिकतम सजा 10 साल है। इसलिए 20 साल की सजा कानून के विपरीत प्रतीत होती है। हालांकि कोर्ट ने दोषसिद्धि को बरकरार रखा और केवल सजा के प्रश्न पर निचली कोर्ट के नए सिरे से सुनवाई करने के निर्देश दिए।