शिक्षा वही है जो प्रश्न करना सिखाएं, अन्यथा विद्यार्थियों का मन द्वंद्व व संशय विकसित करता है
mahendra india news, new delhi
लेखक
नरेंद्र यादव
नेशनल वाटर अवॉर्डी
यूथ एंपावरमेंट मेंटर
जब हम प्राथमिक शिक्षा ग्रहण कर रहे थे, अर्थात लगभग 45 से 50 वर्ष पहले तो विद्यालयों में बच्चों को पढ़ने के साथ साथ बोलना भी सिखाया जाता था, हालांकि उस समय प्राइवेट स्कूल्स अधिक नहीं होते थे, परंतु राजकीय विद्यालयों में तो अधिकतर पाठ याद कराने का एक ही तरीका होता था कि बच्चें उसे बोल बोल कर पढ़े तथा याद करें। गणित के शुरुआती फार्मूले या पहाड़े या छोटे बच्चों के लिए सौ संख्या तक की गिनती भी बोल बोल कर सिखाई जाती थी। पहाड़े याद करने का तो एक विशेष तरीका होता था कि बच्चों की दो पक्तियां बनाई जाती थी और उनको आमने सामने खड़ा कर दिया जाता था,
तब पहाड़ा बोलना शुरू होता था, एक लाइन एक संख्या बोलती थी तथा उसी के जबाव में दूसरी लाइन उससे अगली संख्या बोलती थी, जैसे दो का पहाड़ा ही लें तो उसकी पहली संख्या यानी दो एकम दो, पहली पंक्ति बोलती थी तो दूसरा नंबर यानी दो दूनी चार दूसरी पंक्ति बोलती थी, इसी प्रकार दो का पहाड़ा आगे बढ़ता था, यह पहाड़ा बच्चों को याद हो जाता था। इससे दो लाभ होते थे पहला तो विद्यार्थियों को गिनती या पहाड़े याद होते थे तथा दूसरा लाभ उनकी सबके सामने बोलने की झिझक खुलती थी, उन्हें अभिव्यक्त करने का अभ्यास होता था।
इसके अलावा हमारे प्राथमिक विद्यालयों में एक साप्ताहिक कार्यक्रम भी होता था जिसे बाल सभा कहा जाता था, जहां बच्चें अपने बालमन से अपनी क्रिएशन प्रस्तुत करने का अवसर मिलता था, बस यही तरीका था विद्यार्थियों को बोलना सिखाने का, क्योंकि अगर प्राथमिक विद्यालयों में विद्यार्थियों को बोलने का अवसर नहीं मिला, तो फिर वो आगे की कक्षाओं में मूक बनने की कोशिश ही करते है। इसी कारण आजकल विद्यार्थी क्लासेज में प्रश्न करने से झिझकते है, उन्हें शर्म आती है, उनमें शाइनेस है, उन्हें बोलने में दिक्कत होती है, मन में कोई प्रश्न उठने के बावजूद भी उन्हें प्रश्न करने में परेशानी होती है। जब विद्यार्थी प्रश्न करना ही नहीं सीखेंगे तो फिर जीवन में शिक्षा लेने का क्या फायदा होगा, वो भीड़ बनेंगे और भीड से फिर भेड़ बनेंगे। जो विद्यार्थी जब प्रश्न करने की कला सीखने में अभ्यस्त नहीं होंगे तो वो अच्छे को अच्छा वा बुरे को बुरा कैसे कहने की हिम्मत करेंगे, वो इस संसार में, इस समाज में अच्छाई का प्रचार प्रसार कैसे करेंगे?
ऐसे तो शिक्षा देने का जो ध्येय है वो ही क्षीण होने लगेगा, विद्यालयों, महाविद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में विद्यार्थी प्रश्न करना हो भूल जाएंगे, ऐसे तो हम भेड़ों की भीड़ इक्कठी करेंगे, बिना प्रश्न के मानवता का विकास ही नहीं हो पाता है, बिना क्रिटिक्स के तो दैवी संपदाओं का विकास होना बंद हो जाएगा, फिर हमारे सनातन संस्कृति में दिए गए शास्त्रों में लिखे सभी ज्ञान ही काम नहीं आयेंगे। गलतियां पकड़ने वाले भी होने चाहिए, गलतियां बताने वालों का भी स्वागत होना चाहिए, गलतियां स्वीकार करने का साहस भी होना चाहिए,
सत्य को सत्य कहने की हिम्मत भी होनी चाहिए, सत्य को स्वीकारने का हौंसला भी हो तभी मानवता का उत्थान होता है। यही शास्त्रार्थ करने की पद्धति हमारे गुरुकुलो में होती थी, सनातन संस्कृति में अलग अलग विद्वानों को अपने ज्ञान के अनुसार व्याख्या करने का अवसर प्राप्त हुआ, टीका टिप्पणी लिखने का मौका मिला, तभी तो हमारी संस्कृति उत्कृष्ट है और यही वैज्ञानिक दृष्टिकोण को भी विकसित करती है। अगर इसके विपरित विद्यार्थियों को प्रश्न करने ही न सीखें, अपने वैज्ञानिक टेंपरामेंट को दर्शाने का अवसर ही न मिलें, क्रिटिकल थिंकिंग की छूट ही न हो, तो कैसे वो विद्यार्थी साइंटिफिक दृष्टिकोण अपनाएंगे, केवल जो कहा जा रहा है उसी को मानना है तो फिर तो हम नई नई खोज कर ही नहीं पाएंगे, क्योंकि इस सृष्टि में सब कुछ परिवर्तनशील है, इसलिए विद्यार्थियों को प्रश्न करने के लिए न केवल प्रोत्साहित किया जाए,
बल्कि उन्हें सवाल पूछने के लिए प्रेरित करना भी टीचर्स का दायित्व है। अगर हम श्रीमद्भगवद् गीता का अध्ययन करें, इस पवित्र ग्रंथ का पाठ करें तो पाएंगे कि इसमें उपदेशित 700 श्लोक में से 84 श्लोक अर्जुन द्वारा श्रीकृष्ण जी महाराज से प्रश्न पूछने के लिए कहे गए है, तभी तो अर्जुन के मन के द्वंद्व दूर हुए थे। श्रीकृष्ण जी द्वारा अर्जुन को अनेक प्रश्न करने के लिए प्रेरित किया गया था, ताकि उनके मन के सभी संशय दूर किए जा सकें। अर्जुन के भीतर के सभी कॉन्फ्लिक्ट का रेजोल्यूशन किया जा सकें। प्राथमिक स्कूल से लेकर विश्वविद्यालयों तक शिक्षा का उद्वेश्य ही शोध करना, जानना, तर्क करना सीखना, क्रिएटिव थिंकिंग को जन्म देना, क्रिटिकल थिंकिंग को अपनाना, निर्णय लेने की क्षमता को विकसित करना, संवाद करना सीखना, विचार विमर्श करना, ज्ञान को कंठस्थ करना ही तो है। शिक्षा अगर हमे पिछलगु बना रही है,
तर्कहीन बना रही है, प्रश्न करने के लिए उत्साहित नहीं कर रही है तो ऐसी शिक्षा पाखंड के रास्ते खोलने के सिवाय कुछ नहीं कर रही है, यही तो महर्षि स्वामी दयानंद का कथन था, यही शिक्षा तो स्वामी विवेकानंद जी ने दी थी। श्रीमद्भगवद् गीता के चौथे अध्याय के 34 वें श्लोक में श्रीकृष्ण जी महाराज ने अर्जुन को उपदेशित किया है कि " तत्विद्धि प्रतिपातेंन परिप्रश्नन सेवया। उपदेकश्यंति ते ज्ञानं ज्ञानोंसत्तवदर्शिनी।।" अर्थात किसी को भी विधि अनुसार विनम्र भाव से ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रश्न करना चाहिए, लेकिन गुरु से तर्कवितर्क करने के लिए नहीं। ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रश्न करना आवश्यक है जिससे मन के सभी द्वंद्व तथा संशय दूर हो जाते है।
श्रीमद्भगवद् गीता में अर्जुन के 84 प्रश्नों को स्पष्ट करने के लिए श्रीकृष्ण जी ने 574 श्लोकों के माध्यम से उनके उत्तर उपदेश के रूप में दिए है। जब किसी भी बच्चे की आयु छोटी होती है तो उनके मन में बहुत प्रश्न उठते है, जिनका उत्तर मातापिता शुरू में तो देते है परंतु बाद में अक्सर उत्तर देना पसंद नहीं करते है, जबाव न मिलने की वजह से बच्चों के मन के भीतर प्रश्न उठने बंद हो जाते है, और उनके मन में द्वंद्व पैदा होने लगते है, उनके मन में कुंठा पैदा होने लगती है, जिसके कारण उनके भीतर संशय पैदा होते है, संशय से भ्रम की स्थिति बनती है,
वही भ्रम उन्हें दिग्भ्रम की तरफ लेकर जाते है, यहीं उनके भीतर द्वंद्व बनता है, कि क्या करे और क्या न करें ? वो अपने भीतर से उठने वाले प्रश्नों को दबाने लगते है, और अगर कभी कभार कोई प्रश्न उठता भी है तो उसके उत्तर देने वाला कोई नहीं होता है, इसी कारण वो उनका जबाव अपने सहपाठियों से करने लगते है, जिसके परिणाम अक्सर घातक होते है, क्योंकि वो बच्चे भी तो बिना प्रश्न के तथा बिना उत्तर के ही जीवन को ठेल रहे होते है। वैसे तो विद्यार्थियों के लिए प्रश्न करना अनिवार्य होना चाहिए, कक्षा में प्रत्येक विद्यार्थी द्वारा किए गए प्रश्नों का डेटा होना चाहिए, और उनको भी उनके परिणाम में समायोजित किया जाता चाहिए, इससे तीन लाभ होंगे एक तो विद्यार्थियों में सवाल करने की आदत विकसित होगी,
दूसरा प्रश्न करने से उनके भीतर की झिझक खुलेगी और तीसरा प्रश्न करने से पढ़ाई के प्रति उनकी कंसंट्रेशन बढ़ेगी। विद्यालय, महाविद्यालय या विश्वविद्यालय केवल पुस्तकों का ज्ञान देने तक सीमित नहीं है, उनके संपूर्ण व्यक्तित्व विकास के लिए जरूरी है। प्रश्न पूछने के लिए एकाग्र चित होना, प्रश्न बनाना, प्रश्न पूछना, तथा प्रश्न का उत्तर पाना भी तो व्यक्तित्व विकास की ओर बढ़ता कदम ही है। विद्यार्थियों में ऐसी जिज्ञासा पैदा करें कि वो प्रश्न करने की हिम्मत करें।
जय हिंद, वंदे मातरम