Farming : किसानों ने की है बासमती धान की रोपाई, वह किसान इन उपायों को अपनाएं, बंपर होगा उत्पादन

 

mahendra india news, new delhi
Farming : खरीफ के सीजन में किसानों ने धान की रोपाई की हुई है। किसान चाहते हैं कि धान का उत्पादन ज्यादा से ज्यादा हो, मगर कई बार ध्यान देने पर भी उत्पादन नहीं होता है। क्योंकि किसी भी फसल से अच्छा उत्पादन लेने के लिए केवल बुवाई या रोपाई कर देने से अच्छी उपज नहीं ली जा सकती। 

इसके लिए किसानों केा रोपाई के बाद खाद और उर्वरक, सिंचाई और खरपतवार प्रबंधन पर भी ध्यान देने की जरूरत होती है। बासमती धान कब कैसै खाद और उर्वरक,सिंचाई और खरपतवार  प्रबंधन करे बासमती कृषि वैज्ञानिक डा. सुनील बैनीवाल ने किसानों को उपाय बताए हैं। इस बासमती धान की खेती में कुछ खास बातें अपनाकर किसान अच्छी गुणवत्ता और अधिक उपज प्राप्त कर सकते हैं.

बासमती की रोपाई से पहले करें ये कार्य

उन्होंने बताया कि किसान भाई जिस खेत में धान की रोपाई करने जा रहे हैं, उसमें लेजर लेवलर द्वारा समतल करना चाहिए और खेत का आकार छोटा रखें. इससे सिंचाई के लिए आवश्यक पानी की मात्रा में बचत होती है। बासमती धान की खेती के लिए अच्छी जल धारण क्षमता वाली चिकनी मिट्टी सबसे उपयुक्त होती है।

 

धान की रोपाई के पहले धान की खेती के लिए 2 से 3 बार जुताई करें, इसी के साथ ही मजबूत मेंड़ भी बनाएं. हरी खाद की बुवाई जरूर करें, इसके लिए ढैंचा, सनई, लोबिया या मूंग की फसल की बुवाई करें। बासमती धान की रोपाई से पहले खेत में पानी भर कर हरी खाद को पडलिंग के द्वारा खेत में पलट दें, इससे जुताई की लागत भी कम की जा सकती है.

किसान बासमती रोपाई में ये तरीके अपनाएं

उन्होंने बताया कि किसान रोपाई के लिए 20 से 25 दिन की पौध का उपयोग करें, पूसा बासमती 1509 की 18-22 दिन की पौध होने पर रोपाई करें, पौध को उपचारित करने के लिए 2 ग्राम कार्बेन्डाजिम या 5 ग्राम ट्राइकोडर्मा हरजेनियम प्रति लीटर पानी की दर से घोल में कम से कम एक घंटे के लिए डुबो कर रखें,  रोपाई से पहले पौध का ऊपरी भाग 3 से 4 सेंटीमीटर तोड़कर नष्ट कर दें।

पौध की रोपाई हमेशा पंक्तियों में करें। 2 से 3 मीटर रोपाई के बाद 40 सेंटीमीटर के रास्ते छोड़ दें। उन्होंने बताया कि इससे हवा और सूर्य का प्रकाश मिलने के कारण कीटों और बीमारियों का प्रकोप कम होता है और उपज में वृद्धि होती है। रोपाई करते समय पंक्ति से पंक्ति और पौधे से पौधे की दूरी 20 सेंटीमीटर रखें। 

कब और कैसे दें उर्वरक और सिंचाई

डा. बैनीवाल ने बताया कि बासमती धान की परंपरागत प्रजातियों में अपेक्षाकृत कम नाइट्रोजन की जरूरत होती है। इसके लिए उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण और फसल की मांग के आधार पर करें, पूरी फसल के दौरान ऊंची बढ़ने वाली प्रजातियों के लिए प्रति हेक्टेयर 100 किलोग्राम डी.ए.पी., 70 किलोग्राम पोटाश और 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट पर्याप्त होते हैं। बौनी किस्मों के लिए यूरिया 140 किलोग्राम उपयोग करें. डी.ए.पी., पोटाश और जिंक सल्फेट की पूरी मात्रा अंतिम पडलिंग के समय प्रयोग करें। 

उन्होंने बताया कि रोपाई के वक्त 2-3 सेंटीमीटर जल पर्याप्त होता है. खेतों में रोपाई के बाद दरार बनने से पहले हल्की सिंचाई करें। इसके बाद में जल स्तर धीरे-धीरे बढ़ा कर 3-5 सेंटीमीटर तक कर दें और इसे पहले 30 दिन तक बनाए रखें. इससे खरपतवार नियंत्रण में सहायता मिलेगी। बाली निकलने और दाने में दूध बनने की दशा में पानी खेत में भरा रखें।