एक शिक्षक की कलम से: "मोबाइल की चमक में खोते बचपन को वापस लाओ

 
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नमस्ते प्यारे माता-पिता और साथी शिक्षकों!
मैं एक स्कूल टीचर हूं, जो रोज़ाना कक्षा में बहुत से बच्चों के चेहरों को देखता हूं। कुछ बच्चे उत्सुक आंखों से सवाल पूछते हैं, कुछ किताबों में खो जाते हैं, लेकिन कई बच्चे... उनकी आंखें स्क्रीन की नीली रोशनी में डूबी रहती हैं। उनका ध्यान 5 मिनट से ज्यादा नहीं टिकता। होमवर्क अधूरा, जवाब में "सर, मैं तो बस..." और फिर नज़र शर्म से नीचे झुकती चली जाती है।  आज मैं आपको एक टीचर की नज़र से बताता हूं – स्कूल की उम्र (6 से 18 साल) में मोबाइल की लत कितनी खतरनाक है, और हम इसे कैसे रोक सकते हैं। ये सिर्फ सलाह नहीं, मेरे क्लासरूम की सच्ची कहानियां और जो काम कर रहा है, वो तरीके हैं।


मोबाइल से चुपके-चुपके चुराई जा रही जिंदगी –
 हानिकारक प्रभाव: कल्पना कीजिए, एक 12 साल का बच्चा जो पहले क्रिकेट खेलता था, अब रात 12 बजे तक PUBG में "एक और मैच" कहकर जगा रहता है। सुबह आंखें लाल, सिर दर्द, और क्लास में नींद।  भारत में अध्ययनों से पता चलता है कि स्कूल जाने वाले बच्चों में मोबाइल एडिक्शन की दर 20% से 33% तक पहुंच चुकी है। लड़के थोड़े ज्यादा प्रभावित होते हैं, लेकिन लड़कियां भी पीछे नहीं।  यहां कुछ असली प्रभाव जो मैं रोज़ देखता हूं, आंखे और शरीर लगातार स्क्रीन देखने से थक जाते हैं, सिरदर्द, गर्दन-कंधे का दर्द। बच्चे खेलना भूल जाते हैं – मोटापा बढ़ता है, नींद 5-6 घंटे रह जाती है।
दिमाग पर असर: एकाग्रता खत्म! 10 मिनट पढ़ाई के बाद "सर, बोर हो रहा हूं..."। याददाश्त कमजोर, चिंता-तनाव बढ़ता है। कई बच्चे डिप्रेशन जैसी भावनाएं बताते हैं।
पढ़ाई का नुकसान: ग्रेड्स गिरते हैं। एक बच्चा जो पहले टॉप करता था, अब "एग्जाम में छोटी छोटी गलतियों से नंबर कट गए कहकर रोता है।
दोस्ती और परिवार: असली दोस्तों से बात कम, WhatsApp पर "फेक" दोस्ती ज्यादा। घर में माता-पिता से झगड़े बढ़ते हैं – "फोन दो!" की आवाज़ हर घर में गूंजती है।


ये सिर्फ नंबर नहीं, मेरे स्टूडेंट्स की आंखों में दिखता दर्द है।
एक अच्छे टीचर-पैरेंट की भूमिका – संतुलित पैरेंटिंग ही एकमात्र राज है ऐसा मैं मानता हूं – बच्चे को सिर्फ डांटने से नहीं, समझाने और साथ चलने से बदलाव लाया जा सकता है। स्कूल की उम्र में बच्चा स्वतंत्र होना चाहता है, लेकिन गाइडेंस की सबसे ज्यादा जरूरत इसी उम्र में होती है।मेरे जैसे टीचर और आप माता-पिता मिलकर ये कर सकते हैं|
खुद उदाहरण बनें: मैं क्लास में फोन साइलेंट रखता हूं और बताता हूं – "मैं भी इंसान हूं, लेकिन पढ़ाई का समय पढ़ाई का!" जब बच्चे देखते हैं कि टीचर भी कंट्रोल में है, तो वे कॉपी करते हैं।
खुलकर बात करें: "बेटा, फोन अच्छा है, लेकिन जिंदगी फोन से बड़ी है।" उनकी फेवरेट गेम या YouTube चैनल के बारे में पूछें, फिर धीरे-धीरे नुकसान बताएं।
स्कूल और घर में नियम: क्लासरूम में "फोन फ्री जोन", है उसी तरह  घर में डिनर टेबल पर नो-फोन। नियम तोड़ने पर सजा नहीं, बल्कि समझाना।
बचाव की मजेदार और कारगर तकनीकें – जो मेरे क्लास में काम कर रही हैं ये तरीके ट्राई करें, बच्चे खुद फोन से दूर भागेंगे: स्क्रीन टाइम को गेम बनाओ: रोज़ 25-30 की लिमिट। Google Family Link या Apple Screen Time यूज करें। लिमिट खत्म होने पर "आज का स्कोर जीत लिया!" कहकर सेलिब्रेट करें।


फोन की जगह एक्साइटिंग विकल्प: क्रिकेट, बैडमिंटन, ड्रॉइंग, डांस, बोर्ड गेम्स (Ludo, Chess) जैसे कोई भी गेम । घर मे एक दिन  "फोन-फ्रीडे" रख सकते है | बच्चे खुद कहेंगे हैं "पापा , आज तो मजा आया!"
फैमिली टाइम को स्पेशल: वीकेंड पर पिकनिक, किचन में साथ खाना बनाना, पुरानी फोटो देखकर हंसना। बच्चा महसूस करेगा – असली मजा स्क्रीन के बाहर है!


रिवार्ड सिस्टम: पढ़ाई अच्छी हुई, खेल खेला, तो 30 मिनट एक्स्ट्रा स्क्रीन टाइम। लेकिन धीरे-धीरे रिवार्ड कम करें, धीरे –धीरे बिना फोन रहने की आदत बन जाएगी।
अगर लत गंभीर हो: काउंसलर या मनोवैज्ञानिक की मदद लें। कई बच्चे खुद कहते हैं – "मुझे कंट्रोल नहीं होता"। शर्मिंदगी नहीं, मदद जरूरी है।

आखिरी बात – एक टीचर का संदेश: बच्चों का बचपन मोबाइल की चमक में मत खोने दो। वो चमक 2-3 साल में फीकी पड़ जाएगी, लेकिन जो स्किल्स, दोस्ती, यादें आज बनेंगी – वो जिंदगी भर चमकेंगी।  आप और हम मिलकर ये कर सकते हैं। आज से शुरू करें – एक छोटा सा कदम। कल आपका बच्चा कहेगा – "थैंक्यू मम्मी-पापा/सर, आपने मुझे असली दुनिया दिखाई!"मैं तैयार हूँ ,क्या आप तैयार हैं? 
कमेंट में बताइए – आपके घर में कौन-सा तरीका सबसे अच्छा काम कर रहा है?
आपका साथी शिक्षक
विजेंद्र गोदारा 

दयानंद सीनियर सेकेंडरी स्कूल, नाथूसरी चौपटा सिरसा
(एक टीचर जो बच्चों के सपनों को बचाना चाहता है)