केवल परंपरा नहीं, जीवन को नई दिशा देते हैं गुरु पूर्णिमा और श्रावण मास: डा. पुनीत गोयल

 

mahendra india news, new delhi
 गुरु पूर्णिमा तथा पावन श्रावण मास की देश व प्रदेशवासियों को शुभकामनाएं देते हुए ज्योतिष व वास्तु विशेषज्ञ डा. पुनीत गोयल ने कहा कि आषाढ़ पूर्णिमा को मनाई जाने वाली गुरु पूर्णिमा और उसके अगले ही दिन आरंभ होने वाला पावन श्रावण मास भारतीय संस्कृति के दो ऐसे महत्वपूर्ण अवसर हैं, जो हमें केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि जीवन जीने की सही कला भी सिखाते हैं।

उन्होंने कहा कि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार आषाढ़ पूर्णिमा के दिन महर्षि वेदव्यास का अवतरण हुआ था। उन्होंने वेदों का संकलन किया, महाभारत की रचना की तथा भारतीय ज्ञान परंपरा को व्यवस्थित रूप दिया। इसी कारण उन्हें 'आदि गुरु' कहा जाता है और उनके सम्मान में यह दिन गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। भारतीय संस्कृति में गुरु वह है जो अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान का प्रकाश प्रदान करे। डा. गोयल ने कहा कि इसके तुरंत बाद प्रारंभ होने वाला श्रावण मास भगवान शिव को समर्पित माना जाता है। समुद्र मंथन की कथा में जब हलाहल विष निकला और संपूर्ण सृष्टि संकट में पड़ गई, तब भगवान शिव ने उस विष को अपने कंठ में धारण कर संसार की रक्षा की। यही कारण है कि उन्हें नीलकंठ कहा जाता है। यदि इन कथाओं को आज के समय से जोड़कर देखें तो उनका संदेश और भी गहरा दिखाई देता है। आज का विष केवल समुद्र मंथन से निकला विष नहीं है।

आज का विष है—तनाव, क्रोध, ईर्ष्या, अवसाद, असहिष्णुता, सोशल मीडिया की अंधी दौड़, परिवारों में बढ़ती दूरियाँ और सफलता की असीमित लालसा। उन्होंने कहा कि भगवान शिव हमें सिखाते हैं कि जीवन में आने वाली नकारात्मकता को दूसरों तक पहुंचाने के बजाय धैर्य, विवेक और आत्मसंयम से उसे सकारात्मक ऊर्जा में बदलना ही वास्तविक साधना है।


इसी प्रकार गुरु पूर्णिमा हमें याद दिलाती है कि आज जानकारी बहुत है, लेकिन सही दिशा देने वाले गुरु का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। इंटरनेट हमें उत्तर दे सकता है, लेकिन जीवन जीने की समझ केवल अनुभव, संस्कार और योग्य मार्गदर्शन से ही प्राप्त होती है।

डा. गोयल ने कहा कि श्रावण मास के दौरान यदि प्रतिदिन कुछ समय ईश्वर स्मरण, ध्यान, 'ॐ नम: शिवाय' मंत्र का जाप, अपने माता-पिता एवं गुरुजनों का सम्मान, जरूरतमंदों की सहायता और प्रकृति संरक्षण जैसे छोटे-छोटे कार्य किए जाएं तो उनका प्रभाव केवल आध्यात्मिक ही नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक जीवन पर भी स्पष्ट दिखाई देता है। मन शांत होता है, निर्णय बेहतर होते हैं, रिश्तों में मधुरता आती है और व्यक्ति के भीतर आत्मविश्वास का विकास होता है। उन्होंने कहा कि वास्तव में भगवान शिव का संदेश यह नहीं है कि केवल मंदिरों में जल अर्पित किया जाए, बल्कि अपने भीतर के क्रोध, अहंकार और नकारात्मकता का भी अभिषेक किया जाए। उसी प्रकार गुरु पूर्णिमा का वास्तविक अर्थ केवल गुरु का सम्मान करना नहीं, बल्कि उनके बताए मार्ग पर चलने का संकल्प लेना है।

आज जब पूरा समाज मानसिक तनाव, प्रतिस्पर्धा और असंतोष से जूझ रहा है, तब गुरु पूर्णिमा और श्रावण मास हमें यह संदेश देते हैं कि यदि जीवन में सही मार्गदर्शन, संयम और आत्मचिंतन आ जाए, तो सबसे कठिन परिस्थितियों में भी संतुलित और सफल जीवन जीया जा सकता है। उन्होंने आह्वान किया कि इस गुरु पूर्णिमा और पावन श्रावण मास पर हम केवल पूजा-अर्चना तक सीमित न रहें, बल्कि अपने भीतर एक सकारात्मक परिवर्तन का संकल्प लें। यही भारतीय संस्कृति का वास्तविक संदेश है और यही इन दोनों पावन अवसरों की सबसे बड़ी सार्थकता भी है।