सूर्य नमस्कार सूर्य के प्रकाश में ही किया जाए तो विटामिन डी की पूर्ति से मानव को ऊर्जा मिलेगी

 

mahendra india news, new delhi

लेखक
नरेंद्र यादव
नेशनल वाटर अवॉर्डी
यूथ एंपावरमेंट मेंटर
सूर्य नमस्कार केवल एक आसनों की शेप में की जाने वाली  एक्सरसाइज ही नहीं है, यह कोई एक व्यायाम ही नहीं है बल्कि ये ब्रह्मांडीय शक्ति से जुड़ना भी है, सूर्य नमस्कार सूर्य भगवान की आराधना के साथ साथ उसकी ऊर्जा को ग्रहण करने की क्रिया भी है। अगर हम सूर्य नमस्कार को केवल बारह आसन मानकर व्यायाम की तरह करेंगे तो उसका जो लाभ होना चाहिए, उतना नहीं होगा, क्योंकि सूर्य नमस्कार विभिन्न मुद्राओं के माध्यम से या विभिन्न आसन के माध्यम से करेंगे तो केवल व्यायाम ही होगा, जबकि सूर्य नमस्कार एक विशेष क्रिया है, यह व्यायाम से बहुत अधिक है, इस क्रिया में चार सिद्धान्त पर आधारित व्यवस्था काम करती है

जिसमें फिजिकल, मेंटल, स्प्रिचुअल और ब्रीदिंग प्रैक्टिस का महत्व है। सूर्य नमस्कार करने वाले हर व्यक्ति को इन चारों का ध्यान करने की आवश्यकता है, यह एक तरह की सूर्य उपासना है। हमने देखा है कुछ महानुभाव इसे केवल भागम भाग  ही करते है, वो केवल शारीरिक व्यायाम पर फोकस करते है, सूर्य नमस्कार की गिनती बढ़ाने पर अधिक बल देते है। हम सभी के पास यह 12 जनवरी से लेकर 12 फरवरी की अवधि एक पवित्र माह के रूप में उपलब्ध है, इसका लाभ सभी बच्चों को, किशोरावस्था में आने वाले नौजवानों को, युवाओं को और आमजन को लेना चाहिए। इस देश के दो महान संतों स्वामी विवेकानंद जी व महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती जी को याद करने का अवसर भी मिल रहा है, जिन्होंने भारत भूमि का गौरव बढ़ाया था,

महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने तो इंसानी जीवन को श्रेष्ठ मार्ग पर चलने के लिए सत्यार्थ प्रकाश जैसा पवित्र ग्रंथ भी दिया, स्वामी विवेकानंद जी ने विश्व धर्म सम्मेलन में हिंदू धर्म की विशालता पर चर्चा करके भारत मां का गौरव बढ़ाया था।  सूर्य नमस्कार भारत भूमि ने एक ऐसी विद्या दी है जिसके अभ्यास से कोई भी व्यक्ति मानव बन सकता है। जैसे वेदों में कहा गया है कि हे इंसान तू मनुर भव। मनुष्य जीवन अमर्यादा का नाम नहीं है, हम यहां बदलाव को स्वीकार करते हुए आगे बढ़ने की बात कर रहे है। कुछ महानुभाव मर्यादा को भी विकास में बाधा मानते है और कहते है कि यह बदलाव को रोकती है, मै यहां उन सभी सम्मानित महानुभावों से पूछना चाहता हूँ कि बिना नैतिक मूल्यों का विकास तो जंगल वृति को बढ़ावा देता है, वह विकास नहीं विनाश है, वह सभी की जरूरतों के अनुसार बंटवारा नहीं, वह दूसरे का हिस्सा हड़पना कहलाता है।

जब पशु और मनुष्यों में भेद खत्म हो जाता है तो फिर विकास हो या विनाश हो, सब ही तो समान है। विकास मानव को श्रेय मार्ग पर चलाना है, विकास मानव मूल्यों की रक्षा करना है, विकास प्रकृति को सदा संरक्षित करना है, विकास लोभ लालच नहीं, बल्कि त्याग की वृति के साथ जरूरत के अनुसार भोग करना है, विकास सर्वोदय है, विकास अन्तोदय है, सभी को जरूरत के अनुसार उनका हिस्सा मिलना है, विकास निष्पक्षता है, विकास दोहन नहीं है। यह पृथ्वी सभी के जीने की जरूरत तो पूरी कर सकती है लेकिन लोभ किसी का पूरा नहीं कर सकती है। हम यहां सूर्य नमस्कार के द्वारा मानव निर्माण की बात भी करते है, न केवल उनका स्वास्थ्य बेहतर बने, बल्कि वो मानव भी बनें, वो पशुता से ऊपर उठने का संकल्प भी लें, तभी किसी पवित्र क्रिया का लाभ होता है। हम हर किसी बात में तीव्रता तो दिखाते है, परंतु उसकी गंभीरता को भूल जाते है, उसकी दिव्यता को भूल जाते है। सूर्य नमस्कार वर्तमान समय की बहुत बड़ी जरूरत है, जब हम सभी में विटामिन डी की कमी हो रही है,जिसके कारण हमारे स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है,

हड्डियां कमजोर हो रही है, कैल्शियम एब्जॉर्ब नहीं हो पाता है, शरीर कमजोर रह जाता है, जो विटामिन डी हमे सूर्य की किरणों से मिलता था, उसकी भी दवाई खानी पड़ रही है। एक तरफ सूर्य की ऊर्जा प्रकाश के रूप में बरस रही है, दूसरी ओर हम इतने आधुनिक बन गए है कि न तो धूप में निकलते है और न ही अपने बच्चों को नंगे पैर धरती के संपर्क में आने देते है। ऐसे अवसर पर जब हरियाणा योग आयोग सूर्य नमस्कार पर्व माह मना रहा है तो निश्चित रूप से ये हमारे लिए लाभदायक उत्सव ही है।

सूर्य नमस्कार की हर क्रिया नियमित व नियंत्रित ही तो है, उसी से हमारा जीवन भी मर्यादित बनेगा। अगर वर्तमान में लोगों को दवाइयों के चंगुल से निकलना है तो सूर्य नमस्कार के माध्यम से सूर्य स्नान करने की भी आवश्यकता है। अगर हम सूर्य नमस्कार की क्रिया को बंद कमरे के अंदर, या अंधेरे में करेंगे, या रात में करेंगे तो सूर्य नमस्कार तो नहीं होगा, सूर्य की आराधना तो नहीं हो पाएगी, हां वह एक व्यायाम के रूप में जरूर हो सकता है।

सूर्य नमस्कार तो सूर्य के सामने विभिन्न मुद्राओं में की जाने वाली सूर्य उपासना है, जो हमे शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक तथा सांसों के सही उपयोग से जोड़ कर लाभ देती है। जीवन में हर प्रकार के व्यायाम केवल व्यायाम की तरह नहीं किए जा सकते है, उनमें सांसों की पूरक , कुंभक व रेचन क्रिया का भी ध्यान रखना पड़ता है और जब हम सूर्य नमस्कार के रूप में सूर्य भगवान की अर्चना कर रहे है तो सूरज के प्रकाश का होना, हमारी बहुत सी शारीरिक जरूरतों को पूरा करता है। इसलिए सूर्य नमस्कार सूर्य उदय के आस पास या प्रकाश में करनी चाहिए, जिससे अधिक लाभ हो सकें।
जय हिंद, वंदे मातरम