सफेद झींगा मछली पालन कर बढ़ाएं आमदनी, 60 प्रतिशत तक अनुदान
mahendra india news, new delhi
आमतौर पर खारे पानी वाली भूमि पारंपरिक खेती के लिए उपयुक्त नहीं मानी जाती है, लेकिन विषय विशेषज्ञों के अनुसार इस भूमि का उपयोग सफेद झींगा पालन के लिए किया जा सकता है, जिससे किसानों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है। जिला के वे किसान जिनकी भूमि लवणीय है और भूजल खारा है, यदि सफेद झींगा पालन को अपनाते हैं तो कड़ी मेहनत के बलबूते वे प्रति हेक्टेयर 12 से 15 लाख रुपये तक की आय अर्जित कर सकते हैं। यह तकनीक राज्य के किसानों के लिए एक लाभकारी और वैकल्पिक कृषि मॉडल के रूप में उभर रही है। वर्तमान में सिरसा में 400 से ज्यादा किसान लगभग 600 हेक्टेयर क्षेत्र में झींगा पालन व्यवसाय कर रहे हैं और प्रत्येक मत्स्य किसान 2 से 3 लोगों को भी रोजगार दे रहे हैं।
समुद्री क्षेत्रों में पाई जाने वाली प्रजाति है झींगा
सफेद झींगा मूल रूप से प्रशांत महासागर क्षेत्र के देशों मैक्सिको, मध्य एवं दक्षिण अमेरिका से लेकर पेरू तक के समुद्री तटीय क्षेत्रों में पाई जाने वाली प्रजाति है। भारत में वर्ष 2009 से इसका पालन किया जा रहा है। इस झींगे का रंग पूर्णत: सफेद होता है और यह बहुत तेजी से बढ़ने वाली प्रजाति है। मादा झींगा नर की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ती है, जिसका अधिकतम वजन लगभग 120 ग्राम तक पाया गया है, जबकि नर झींगे का वजन सामान्यत: 60 से 80 ग्राम तक होता है। विशेषज्ञों के अनुसार सफेद झींगा 0.5 पीपीटी से लेकर 45 पीपीटी तक की खारे पानी की लवणता में पाला जा सकता है, हालांकि 10 से 30 पीपीटी के बीच इसकी वृद्धि सबसे बेहतर रहती है। यह झींगा 4 से 5 महीनों में 30 से 40 ग्राम तक का वजन प्राप्त कर लेता है। इसके अच्छे विकास के लिए तापमान 18 से 34 डिग्री सेल्सियस उपयुक्त माना गया है तथा आहार में प्रोटीन की मात्रा लगभग 20 से 35 प्रतिशत होनी चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय बाजारों में सफेद झींगा की बड़ी मांग
अंतरराष्ट्रीय बाजारों में सफेद झींगा की मांग काफी अच्छी है, जिसके चलते इसके विपणन में अधिक कठिनाई नहीं आती। उत्पादन की बात करें तो लगभग 2.5 एकड़ क्षेत्र में 50 से 70 क्विंटल तक सफेद झींगा उत्पादन संभव है। जिन क्षेत्रों में भूमि में लवणता अधिक है और भूजल खारा है, वहाँ विभागीय जांच के बाद मिट्टी और पानी की गुणवत्ता सुनिश्चित कर झींगा पालन किया जा सकता है। झींगा बीज सामान्यत: समुद्री तटीय क्षेत्रों से प्राप्त किया जाता है और इसका अनुशंसित संचय घनत्व लगभग 50 से 60 झींगा बीज प्रति वर्ग मीटर है। अधिक संचय घनत्व के कारण तालाबों में ऑक्सीजन की पर्याप्त आपूर्ति आवश्यक होती है, जिसके लिए एरेटर (जलवाहक) लगाना अनिवार्य है। साथ ही समय-समय पर पानी की गुणवत्ता की जांच की जानी चाहिए, जिसमें ऑक्सीजन स्तर, पीएच मान, लवणता, नाइट्रेट, फास्फेट, सल्फर, कैल्शियम, मैग्नीशियम एवं क्षारीयता जैसे मापदंड शामिल हैं।
PM मत्स्य संपदा योजना दे रही आर्थिक मजबूती
किसानों और मछली पालन का व्यवसाय करने वाले नागरिकों के लिए प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना आर्थिक स्थिति मजबूत करने में सहायक सिद्ध हो रही है। योजना के तहत 40 से 60 प्रतिशत वित्तीय सहायता का प्रावधान किया गया है। मछली पालन से किसानों की आय बढ़ रही है। सरकार द्वारा योजना के तहत अनुसूचित जाति व महिला वर्ग मछली पालकों को 60 प्रतिशत अनुदान तथा सामान्य वर्ग को मछली पालन पर 40 प्रतिशत अनुदान दिया जा रहा है। इस योजना के तहत प्रार्थी निजी भूमि में या पट्टे पर भूमि लेकर मछली फीड हैचरी व फीड मिल, तालाबों के निर्माण, बायोफ्लॉक, आरएएस, कोल्ड स्टोर आदि लगाने पर विभाग से वित्तीय एवं तकनीकी सहायता प्राप्त कर सकते हैं। रेतिली जमीन में पॉलिथिन लाइनिंग का प्रावधान अलग से है जिस पर अधिकतम कुल लागत आठ लाख रुपये पर अनुदान 25 प्रतिशत की दर से दिया जाता है।
यूनिट लगाने से पूर्व मिट्टी व पानी की टेस्टिंग जरूरी
जिला मत्स्य अधिकारी जगदीश चंद्र ने बताया कि विभाग द्वारा प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना तथा अन्य विभागीय योजनाओं के लिए किसानों को जागरूक करते हुए समय-समय पर विभाग द्वारा प्रशिक्षण भी दिया जाता है। यूनिट लगाने से पहले प्रशिक्षण अवश्य लें तथा मिट्टी व पानी की टेस्टिंग अवश्य रूप से करवाएं ताकि यूनिट कामयाब हो सके। इसके अलावा योजना के तहत चालू वित्त वर्ष में लाभार्थियों द्वारा 3 कोल्ड स्टोर व एक हाइटेक लैब का भी निर्माण किया जा चुका है। वातानुकूलित वैन भी है, इसके अलावा सिरसा जिले में एक्वा पार्क बनाया जाना भी प्रस्तावित है।
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