राष्ट्र में विलन होना सीखना ही सबसे बड़ी देशभक्ति है, इसे विद्यार्थी आत्मसात करें
mahendra india news, new delhi
हम जब भारतीय संस्कृति या सनातन संस्कृति की बात करते है तो हमारे सामने ज्ञान के भंडार खुल जाते है, हमारे सामने हमारे वेद शास्त्र, उपनिषद्, श्रीमद्भगवद् गीता, ब्रह्मसूत्र आदि महान ग्रंथों का बड़ा ज्ञान है, जो किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व को हिमालय से ऊंचा बनाने की क्षमता रखते है, बशर्ते कि हम उन्हें पढ़े, आत्मसात करे, आत्म मंथन करें, और अपने व्यवहार में उतारने के लिए आगे बढ़े।
मानव जीवन की तर्कशीलता हमे आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है, परंतु फिर भी हम ह्यूमन होने के बाद भी क्यों पाखंड व अंधविश्वास में उलझ जाते है, यही विमर्श का विषय है। इतने ज्ञान के सागर के बाद भी दिखावा, छलावा, पाखंड हमारे जीवन में क्यों है? जीवन जीने के सटीक सूत्र जो वेद में दिए गए है शायद ही दुनिया में किसी और ग्रन्थ में मिलेंगे,
श्रीमद्भगवद् गीता जैसे श्लोक या उन्हें आधुनिक काल में युवाओं को प्रेरित करने के लिए फॉर्मूला कहे, वो कहीं और नहीं मिलेंगे, ब्रह्मसूत्र जैसा ग्रंथ, जो मानव के भीतर के सारे कचरे को बाहर निकालने की क्षमता रखता है, ऐसा ग्रंथ दुनिया के किसी कोने ने नहीं मिलेगा। इतना होते हुए भी आज की युवा पीढ़ी, आज के विद्यार्थी भ्रमित है, भटक रहे है, चिंता ग्रस्त है, पश्चिमी संस्कृति के पीछे अंधों की तरह भाग रहे है, सेक्स और नशे की गतिविधियों के पीछे दौड़ रहे है,यही सबसे बड़ी विडंबना है, यही सबसे बड़ी चिंता है। ऐसा देखकर, युवाओं की गतिविधियों को देखकर,
उनके जीवन के स्तर को देखकर मेरे मन में तीन प्रश्न कौंधते है, जो मंथन करने पर मजबूर करते है, जिसमें पहला प्रश्न है;
1. क्या युवा विद्यार्थियों को हमने अपना शुद्ध भारतीय ज्ञान देने में कोई कमी की है? या दिया ही नहीं?
2. क्या जो ज्ञान हमारे ग्रंथों में विद्यमान है, उनकी व्याख्या आज के विद्वान कहे जाने वाले महानुभाव सही से नहीं कर पाएं है?
3. क्या आज की युवा पीढ़ी ने उस ज्ञान को समझने में या समझाने में भूल की है?
ये तीन प्रश्न युवाओं के सारे हालात का सही सही उल्लेख करते है। एक कार्यक्रम के माध्यम से मुझे कुछ विद्यार्थियों से चर्चा करने का अवसर मिला तो उन्होंने कहा कि श्रीमद्भगवद् गीता में कौन सा ज्ञान है? जिससे उनके जीवन में बड़ा बदलाव आ सकें। तब मुझे लगा कि वर्तमान युवाओं को, विद्यार्थियों को हमारे भारतीय ज्ञान परम्परा से जुड़े ग्रंथों के बारे में कोई जानकारी नहीं है। गलती विद्यार्थियों की नहीं है, गलती हमारे शिक्षकों की है, गलती हमारे विद्वानों की है, गलती हमारे शास्त्रों को विद्यार्थियों तक न ले जा पाने वालों की है, और गलती हमारे ग्रंथों को केवल निवृत्ति मार्गी बनाने वालों की है, जिन्होंने हमारे ज्ञान के सारे भंडार को केवल और केवल साधु संतों के लिए रख दिया,
जबकि यह विशाल ज्ञान का खजाना तो आम जन के लिए होना चाहिए था। जब हम संन्यास और वैराग्य की बात करते है तो उसमें भी हमने संसार छोड़ने पर ही बल दिया, जब हमने अपने चारों आश्रमों में वानप्रस्थ व संन्यास को समझा तो भी अपना घर बार छोड़कर जंगलों में जाना समझा, बस यहीं सबसे बड़ी भूल हमने कर दी, जब हमने संन्यास व वानप्रस्थ तक पहुंचने वाले महान अनुभव रखने वाले महानुभावों को ब्रह्मचर्य व गृहस्थ आश्रम से काटने का कार्य किया। जो लोग संसार को अपने अनुभवों व ज्ञान के प्रकाश से नई पीढ़ियों को रास्ते दिखाने का काम करते, वो तो सब जंगल पहाड़ों में चले गए और यही पद्धति निरंतर हमारे यहां चलती आ रही है।
इसके चलते हमारी नई पीढ़ियों का रुख ज्ञान के अभाव में पश्चिमी संस्कृति की ओर हुआ, जिसने विद्यार्थियों व युवाओं की बुद्धि को हर लिया है। संन्यास का अर्थ है न्यासदार बनना अर्थात ट्रस्टी बनना था, अपना जीवन केवल संरक्षक की भूमिका में रखने को संन्यास कहा जाता है, ताकि अपने गहन अनुभव के आधार पर वो नई पीढ़ियों को राह दिखाने का कार्य करें, भारतीय संपति चाहे वो बौद्धिक हो, या फिर भौतिक हो, उसे सहेजकर रखने में मदद करना है।
सन्यासी होने का अर्थ है न्यासदार होना, अपनी ज्ञान परम्परा, अपनी संस्कृति, अपने ग्रंथ तथा अपने ज्ञान के भंडारों को आमजन तक पहुंचाने के कार्य की देखभाल करना, परंतु हमने संन्यास को संसार छोड़ने वाला समझा, और इससे भी बड़ी गलती यह की, कि हम वानप्रस्थ को भी उसी राह पर जाने का एक अभ्यास मानते है। अरे भले मनुष्यों, कम से कम इनका अर्थ तो सही समझ लेते है, अरे अगर परिवार के वृद्ध अपने वर्षों के अनुभव को अपने साथ लेकर जंगलों में चले जाएंगे तो आने वाली पीढ़ियों का संरक्षण कौन करेगा, इस भटकती हुई दौड़ में कौन अपनी नई जेनरेशन को रास्ता दिखाएगा, बस इतनी सी बात हमारी समझ में नहीं है। हमने न ही अपने गूढ़ प्रतीकों को समझने की कभी चेष्टा की, न ही अपने ग्रंथों के ज्ञान को डिकोड करने का प्रयास किया।
वैराग्य शब्द जीवन का आधार है, जिससे हर इंसान अपनी व्यर्थ की चिंताओं, व्यर्थ की अवसादों से दूर रह सकता है, लेकिन वैराग्य भी दुनिया छोड़ने तक सीमित कर लिया हमने। वैराग्य शब्द संस्कृत की रंज धातु से बना है, जिसमें वि उपसर्ग तथा ग़ै प्रत्यय जोड़ने से बना है, इससे विराग शब्द बनता है और इससे वैराग्य शब्द उत्पन्न होता है, जिसका अर्थ है, अनासक्ति अर्थात जीवन को अनासक्त होकर जीना, किसी भी प्रकार के मोह से दूर रहना, जिसे हमने संसार छोड़ने के अर्थ में ले लिया, बल्कि इसे अनासक्ति के साथ संसार में रहकर जीना था, यही सबसे बड़ी गलती हमने की। वैराग्य खुद को समाज व राष्ट्र में विलीन करना है। जीवन में जब कोई चाहत नहीं रहती है, न्यासदार बन जाते है, अनासक्ति जीवन में आ जाती है तो व्यक्ति की अकेले में कोई पहचान नहीं रहती है, उसकी पहचान समाज व राष्ट्र में विलीन हो जाती है अर्थात एक व्यक्ति खुद के लिए नहीं बल्कि राष्ट्र के लिए जीवन जीता है, यही हमारे सभी ग्रंथों का ज्ञान है,
जिसे हम आज भी समझने में अक्षम है। वानप्रस्थ या संन्यास की अवस्था में पहुंचने के बाद भी खुद के लिए जीना, अपनी इच्छाओं को सर्वोपरि रखना, अपनी सुविधाओं का ही ख्याल रखना, केवल अपने नाम के लिए जीना, राष्ट्र व समाज के सभी संसाधन केवल स्वयं की पहचान के लिए खपा देना,बस यही आसक्ति है जो भारतीय संस्कृति या सनातन संस्कृति के विरुद्ध है और राष्ट्रभक्ति के भी विरुद्ध है। जब हम वानप्रस्थ या संन्यास में कदम रखते है तो हमे समाज या राष्ट्र के साथ विलीन होना होता है ताकि राष्ट्र हमारी ऊर्जा से और आगे बढ़ सकें। यहां संन्यास या वानप्रस्थ का अर्थ विलीन होना है, जंगल में जाना नहीं है, समाज छोड़ना नहीं, अपना अलग आश्रम बनाना नहीं है,
अगर आश्रम भी हो तो वो केवल प्रशिक्षण शिविर के रूप में होना चाहिए और निरंतर समाज व आश्रम में आना जाना रहना चाहिए। अंततः हमारा लक्ष्य तो राष्ट्र में विलीन होना है, समाज में विलीन होना है, लेकिन देखा ऐसा जाता है कि लोग खुद को दिखाने के चक्कर में आने वाली पीढ़ियों के संसाधनों का भी खुद के लिए ही उपयोग करना चाहते है, खुद की पहचान के लिए समाज को भी खंडित कर देते है, खुद के नाम के लिए नई पीढ़ी को तैयार करने से भी चूक जाते है। युवा साथियों, इस लेख के माध्यम से हम यही विमर्श करना चाहते है कि भारतीय ज्ञान की परम्परा से हम विद्यार्थी हो या युवा अवस्था में हो, अपने जीवन को राष्ट्र उपयोगी बना सकते है, अपने जीवन को ज्ञानवान बना सकते है, हम अपने जीवन को परिश्रमी बना सकते है, अपने जीवन को राष्ट्र समाज के लिए न्यौछावर करना सिखा सकते है।
हमारे ज्ञान के सभी ग्रन्थ सभी के जीवन को बदलने की क्षमता रखते है, अगर उन्हें पढ़ा जाये, उन्हें अपने जीवन में आत्मसात किया जाए तथा उनके सही अर्थ को समझकर आगे बढ़ा जाएं, तो वो हर इंसान को पंच कोशीय विकास देते है, जिससे विज्ञान को समझने, अपने सभी कार्यों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण के द्वारा करने में सक्षम बनते है। युवा साथियों, अपनी संस्कृति को और उज्ज्वल बनाने के लिए अपने ज्ञान को उत्कृष्ट करने के लिए जिज्ञासा पैदा करो, जानो, और अंधविश्वास के इस मकड़जाल को तोड़ने का प्रयत्न करो। जीवन तुम्हारा है, इसे ज्ञान की रौशनी में भी जीया जा सकता है और अंधकार में भी बिना ज्ञान के प्रकाश के भी जीया जा सकता है, निर्णय आपका है, हम वानप्रस्थि व सन्यासी आपके साथ है।
जय हिंद, वंदे मातरम
लेखक
नरेंद्र यादव
नेशनल वाटर अवॉर्डी
यूथ एंपावरमेंट मेंटर