सांसारिक मोह-माया और बंधनों से मुक्ति का मार्ग है सिमरन: संत बिरेन्द्र सिंह
Mahendra india news, new delhi
सिरसा।डेरा जगमालवाली में भव्य सत्संग का आयोजन किया गया। इस पावन अवसर पर संत बिरेन्द्र सिंह ने श्रद्धालुओं को अध्यात्म, कर्म और जीवन के गूढ़ रहस्यों का उपदेश दिया। इस सत्संग में देश के कई राज्यों से आए हजारों श्रद्धालुओं ने भाग लिया और संत जी के वचनों का लाभ उठाया। संत बिरेन्द्र सिंह ने अपने प्रवचन में समझाया कि संतों का इस दुनिया में आगमन इसलिए होता है,
क्योंकि जो ज्ञान हमें सामान्य माध्यमों, भूत-प्रेत या देवी-देवताओं से प्राप्त नहीं होता, उसे वे सरल भाषा में समझाते हैं। सतगुरु संतों का चोला धारण करके हमारे बीच आते हैं और हमें प्रेम से जीवन का सही मार्ग दिखाते हैं। वे हमें हमारे असली घर (परम धाम) की याद दिलाते हैं और इस सांसारिक दुनिया के मोह-माया के जाल व 84 लाख योनियों (जन्म-मरण के बंधनों) से छुटकारा दिलाते हैं। संत जी ने जीवन में विचारों की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हम जैसा सोचते हैं और जिधर हमारा ध्यान जाता है,
हमारा जीवन वैसा ही बन जाता है। यदि हमारा ध्यान अंधकार की ओर जाएगा तो हमें भीतर से भी अंधेरा महसूस होगा, और यदि कांटों (नकारात्मकता) की तरफ जाएगा तो चुभन होगी। इसलिए, हमें सांसारिक कूड़ पदार्थों में नहीं फंसना चाहिए। हमें हमेशा ऐसे कर्म करने चाहिए, जिससे सतगुरु प्रसन्न हों, न कि वे कार्य जो उन्हें नाराज करें। संत जी ने संबोधित करते हुए कहा कि सतगुरु बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर ही विराजमान हैं। हमें बाहर की ओर नहीं भागना है, बल्कि अंतर्मन की यात्रा करनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि जहां हमारी मन और बुद्धि समाप्त होती है, वहीं से रूहानियत (आध्यात्मिकता) का रास्ता शुरू होता है। अंत में संत बिरेन्द्र सिंह ने श्रद्धालुओं को चेतावनी और सीख देते हुए कहा कि केवल सत्संग सुनना पर्याप्त नहीं है। जब तक हम सत्संग सुनकर अपने आचरण और जीवन में सकारात्मक बदलाव नहीं लाते, तब तक सत्संग में आने का पूरा लाभ नहीं मिल पाता।