स्मार्ट वर्क की, हार्डवर्क से कोई तुलना नहीं है, बल्कि हार्डवर्क ही सफलता का स्मार्ट पैमाना
mahendra india news, new delhi
लेखक
नरेंद्र यादव
नेशनल वाटर अवॉर्डी
यूथ एंपावरमेंट मेंटर
भारतीय शास्त्रों के अनुसार ब्रह्मचर्य आश्रम केवल ह्यूमन डेवलपमेंट के लिए ही है, जीवन के किसी भी में बिल्कुल अनजान छोटे बच्चों से लेकर 25 वर्ष की आयु तक के युवाओं को किस प्रकार शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, आध्यात्मिक तथा बौद्धिक रूप सशक्त करना है यह ब्रह्मचर्य आश्रम सिखाता है।
हमारे शास्त्र कहते है कि विद्यार्थी जीवन ब्रह्मचर्य का पालन करने, तथा परिश्रम के माध्यम से शिक्षा ग्रहण करने के लिए है, यह आश्रम मानव उत्थान के आश्रम के रूप में माना जाता है। हमारे यहां विद्यार्थियों को यही सिखाया जाता रहा है कि बच्चें खूब शारीरिक व्यायाम करें, खूब पढ़े, मेहनत करें,अनुशासन में रहना सीखें, अपनी ऊर्जा को सही दिशा में रूपांतरित करें, तथा जीवन को अगले तीनो आश्रमों के लिए तैयार करें, यानी गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम के लिए इंसान को तैयार किया जाता है।
ब्रह्मचर्य आश्रम का आधार कर्मठता ही है, अपनी बुद्धि को विकसित करना है। इसी बीच हाल ही के कुछ वर्षों में हमारे यहां कुछ मोटीवेटर स्पीकर आये और युवाओं को, विद्यार्थियों को खूब मोटिवेट किया गया और कहा गया कि हार्डवर्क करना बेवकूफी है, हमे तो स्मार्ट वर्क करना चाहिए,
युवाओं को हार्डवर्क छोड़कर स्मार्ट वर्क करने की जरूरत है। हार्ड वर्क करने वाले तो गधे की तरह होते है, स्मार्टली कार्य करने वाले सबसे आगे बढ़ते है, ये मोटिवेशन खूब हमारे स्कूल्स, कॉलेजेस व विश्वविद्यालयों में चला। हर बार हार्ड वर्क तथा स्मार्ट वर्क की तुलना करने का कार्य किया गया। हमने कभी इस कथन पर ध्यान नहीं दिया गया कि ये गलत प्रचार क्यों किया जा रहा है। हार्ड वर्क तथा स्मार्ट वर्क की तुलना हो ही नहीं सकती है क्योंकि दोनों का अर्थ अलग है, दोनों शब्द अलग अलग तरीके से इस्तेमाल किये जाते है, ये दोनों शब्द या तरीके पैरलल नहीं है, बल्कि स्मार्ट शब्द, हार्ड वर्क का एक अंश है।
कुछ लोग बिना सोचें समझे, बिना स्पष्ट लक्ष्य, बिना स्पष्ट दिशा, बिना तथ्य जाने मेहनत करते है और कुछ लोग तय लक्ष्य, तय दिशा तथा तय तथ्य के साथ कार्य करते है, मेहनत करते है, बस यही फर्क है इन दोनों शब्दों में, जिसे कुछ मोटीवेटर बिना कुछ सोचे समझे हमारी युवा पीढ़ी के सामने परोसते है, जिसे वो अपरिपक्व बच्चें समझ ही नहीं पाते है, उनके लिए एक नया और आकर्षक शब्द जीवन में आ जाता है, जिसे साकार करने के लिए हमारे विद्यार्थी हार्डवर्क छोड़कर स्मार्ट शब्द को ज्यादा अधिक बढ़ाने का कार्य करते है, क्योंकि सभी आसान की तरफ दौड़ते है,
जिससे मेहनत से पीछा छुड़ाने का बच्चों को अवसर मिल जाता है। स्मार्ट वर्ड तो हार्ड वर्क का एक पैरामीटर होता है, हार्डवर्क का विकल्प नहीं होता है। यहां बार बार यही कहा जाता है कि बुद्धि होना जरूरी है, बौद्धिक विकास करना आवश्यक है परंतु उसे व्यवहार में लेकर भी आना होता है, उसी ज्ञान को जिसे हम स्मार्टनेस बोलते है, उसी को व्यवहार में उतारने के लिए व्यवहारिक मेहनत करनी पड़ती है इन दोनों में ही परिश्रम लगता है।
जब हम स्मार्ट वर्क की बात करते है, उसे हमारे विद्यार्थी चालाकी समझते है, होशियारी समझते है, जिसे अधिकतर समय कनिंगनेस से लेते है, झूठ फरेब के साधन अपनाने से होता है। बौद्धिक रूप से सशक्त होना अच्छी बात है लेकिन यह किसी भी कार्य को सम्पन्न करने के लिए काफी नहीं है, इसके लिए मेहनत के द्वारा उस बौद्धिक ज्ञान को व्यवहार में उतारने की जरूरत होती है, इसी लिए हमारे शास्त्रों में कहा गया है कि ज्ञान बौद्धिक नहीं प्रत्यक्ष होना चाहिए। हां मेहनत को अंधेरे में या अज्ञान के वशीभूत होकर नहीं करना है, उसे ज्ञान के प्रकाश में रहकर करना है। अब हम उस शब्द की बात करते है जिसे आजकल अधिकतर सुनने में मिलता है और वो है स्मार्ट वर्क।
कोई भी वर्क स्मार्ट नहीं होता है, कोई भी मेहनत स्मार्ट नहीं होती है, कोई भी परिश्रम चालाकी पूर्ण नहीं हो सकता है, हां परिश्रम बुद्धि से करने की जरूरत जरूर होती है। स्मार्ट शब्द को केवल बुद्धि से जोड़ा जाता है, इसी लिए हम हार्ड वर्क को बुद्धि के साथ करने की बात करते है। कुछ लोगों ने स्मार्ट शब्द को अल्फाबेट के अनुसार विस्तार देने की कोशिश की है, जैसे स्मार्ट शब्द में पांच अल्फाबेट है, जिसे इस प्रकार अर्थ दिया गया है कि एस का अर्थ स्पेसिफिक अर्थात हम जो कार्य करें वो स्पेसिफिक होना चाहिए। एम का अर्थ है मेजरेबल यानी जिसे मापा जा सके, ए का अर्थ है अचीवेबल यानि जिसे प्राप्त किया जा सकें, आर का अर्थ रेलेवेंट यानी उचित हो, संबंधित हो और आखिरी अल्फाबेट टी का अर्थ है टाइम बाउंड है अर्थात जो कार्य किया जाए वो परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए टाइम बाउंड होना चाहिए।
ये स्मार्ट शब्द अपने पांचों अल्फाबेट के अर्थ से बताता है कि हम कोई भी कार्य करें तो उसे स्मार्ट पैरामीटर के अनुसार करेंगे तो विद्यार्थियों के हार्डवर्क सही परिणाम लेकर आयेंगे, लेकिन अगर हम स्मार्ट को हार्ड वर्क के स्थान पर रखने की कोशिश करेंगे तो हमारे युवा न केवल मेहनत से भटकेंगे, बल्कि किसी नतीजे पर भी नहीं पहुंच पाएंगे और केवल दिखावा ही करने के भ्रम में फंसे रहेंगे, कि हम बहुत मेहनत कर रहे है, परंतु कोई परिणाम नहीं आयेंगे। इसे बहुत स्पष्टता के साथ समझने की आवश्यकता है। स्मार्टनेस एक पैरामीटर तो हो सकता है, यह हार्डवर्क का विकल्प नहीं बन सकता है। हमे अपनी मेहनत अपने तय लक्ष्य तथा उसके अनुरूप ही बुद्धि के अनुसार मेहनत करनी चाहिए, जिससे सकारात्मक परिणाम आ सकें। विद्यार्थियों को यह समझ लेना चाहिए कि ऐसी कोई स्मार्टनेस नहीं है जिसमें उन्हें दस घंटे बैठने का अभ्यास हो सकें, जिससे विद्यार्थी अनुशासन में रहना सीख जाएं, कोई ऐसा स्मार्ट वर्क नहीं है, जो विद्यार्थियों को पसीना बहाना सिखा सकें, इंद्रियों को संयमित करना सिखा सकें, हां स्मार्टनेस विद्यार्थियों को दिखावा करना अवश्य सिखा देगी, झूठ बोलना सिखा देगी, अच्छे कपड़े पहनना सिखा देगी, चालाकी भी सिखा देगी, बस वह जो नहीं सिखाती है वो मेहनत है।
सभी विद्यार्थियों को ये अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि मेहनत का कोई विकल्प नहीं है, स्मार्टनेस थोड़ा अट्रैक्टिव एंड अटेंटिव जरूर हो सकता है, लेकिन परिश्रम का स्थान नहीं ले सकती है। इसलिए विद्यार्थियों को चाहिए कि वो स्मार्टनेस के चक्कर में या शॉर्टकट के चक्कर में अपनी मेहनत को न छोड़ें, केवल दिखावे की बुद्धिमानी के चक्कर में अपनी कर्मठता को न छोड़ें, अपनी अनुशासित दिनचर्या को न त्यागे, क्योंकि हर कार्य के लिए मेहनत ही करनी होती है, केवल दिखावा करने से काम नहीं चलता है। अगर राष्ट्र को, समाज को सशक्त बनाना है तो हर नागरिक ईमानदारी से मेहनत करें, दूसरों को इंप्रेस करने के चक्कर में अपना ही समय व पैसे को बर्बाद न करें, क्योंकि वही समय है जिसका एक एक क्षण आपके भविष्य को गढ़ने में काम आयेगा।
जय हिंद, वंदे मातरम