मौन साधना का मूल उद्देश्य बाहरी शोर से हटकर भीतर की शांति को खोजना है: डा. इंदर गोयल
Mahendra india news, new delhi
अखिल भारतीय सेवा संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं प्रख्यात आध्यात्मिक साधक, लेखक एवं भारतीय जीवन बीमा निगम के सेवानिवृत्त विकास अधिकारी डा. इंदर गोयल द्वारा चल रही नौ दिवसीय पूर्ण मौन साधना के पांचवें दिवस के दौरान आज एक अत्यंत सूक्ष्म एवं अद्वितीय आध्यात्मिक अनुभव प्राप्त हुआ, जिसे उन्होंने निराकार में साकार का दर्शन तथा अद्वैत में द्वैत की अनुभूति के रूप में व्यक्त किया। डा. गोयल पिछले कई वर्षों से ध्यान, मौन एवं वेद-उपनिषदों के अध्ययन के माध्यम से आत्मचिंतन की यात्रा पर अग्रसर हैं।
उनकी साधना का मूल उद्देश्य बाहरी शोर से हटकर भीतर की शांति को खोजना है। मौन के इसी गहन अभ्यास में आज उन्होंने अनुभव किया कि जिस परम सत्ता को निराकार, निर्गुण और असीम माना जाता है, वही चेतना साकार रूप में सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त है। उन्होंने बताया कि जब मन पूर्णत: शांत हो जाता है, विचारों की तरंगें थम जाती हैं और मैं का अहंकार विलीन होने लगता है, तब साधक को यह अनुभूति होती है कि देखने वाला और दिखने वाला अलग नहीं हैं। यही अद्वैत है, जहां द्वैत केवल एक खेल बनकर रह जाता है। उनके शब्दों में जब भीतर का मौन गहरा हुआ, तब लगा कि ईश्वर कहीं बाहर नहीं, हर कण में धडक़ रहा है। निराकार ही साकार बनकर मेरे सामने था, मैं भी वही, जगत भी वही।
डा. गोयल का मानना है कि मौन केवल बोलना बंद करना नहीं, बल्कि मन की चंचलता को शांत करना है। जब मन रुकता है, तब सत्य प्रकट होता है। यही अवस्था आत्मबोध की दिशा में पहला साक्षात्कार है। ज्ञात हो कि डा. इंदर गोयल अब तक जीवन जीने की कला, जीवन बीमा क्यों, 1919 कीज ऑफ लाइफ एवं मौन साधना: एक अद्वितीय अनुभव जैसी पुस्तकों के लेखक हैं तथा समाज में ध्यान, मौन और आत्मजागरण का संदेश निरंतर दे रहे हैं।
उनके मार्गदर्शन में अनेक साधक मौन साधना से जुडक़र मानसिक शांति एवं आध्यात्मिक संतुलन प्राप्त कर रहे हैं। उनका यह अनुभव न केवल व्यक्तिगत साधना की उपलब्धि है, बल्कि समाज के लिए यह संदेश भी है कि सच्ची शांति बाहर नहींए भीतर के मौन में छिपी है। श्जब हम निराकार को खोजते हैं, तब साकार मिटता है, जब साकार को स्वीकारते हैं, तब वही निराकार प्रकट होता है, अंतत: दोनों एक ही सत्य के दो रूप हैं।