HARYANA के गिरते लिंगानुपात के वास्तविक कारणों को समझना होगा
Mahendra india news, new delhi
डा.वीरेश भूषण, सेवानिवृत सिविल सर्जन सिरसा
एक बार फिर haryana में 4 वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारियों को अपने-अपने क्षेत्रों में गिरते लिंगानुपात को नियंत्रित करने में कथित विफलता के कारण निलंबित किया गया है। ऐसे कदम सुर्खियां तो बनाते हैं, लेकिन साथ ही एक अधिक गहरा और महत्वपूर्ण प्रश्न भी खड़ा करते हैं। क्या गिरते लिंगानुपात के लिए केवल प्रशासनिक स्वास्थ्य अधिकारियों को ही जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?
कन्या भ्रूण हत्या और अवैध लिंग जांच की समस्या केवल प्रशासनिक विफलता नहीं है। यह एक जटिल सामाजिक, कानूनी और संस्थागत चुनौती है, जिसके समाधान के लिए चयनात्मक दोषारोपण नहीं बल्कि सामूहिक जवाबदेही आवश्यक है।
पीसीपीएनडीटी प्रवर्तन व्यवस्था की संरचना
पीसीपीएनडीटी (प्री कंसेप्शन एंड प्री नेटल डायग्रोस्टिक टैक्रिनिक ) अधिनियम के अंतर्गत हरियाणा में एक राजपत्र अधिसूचना द्वारा तीन सदस्यीय जिला उपयुक्त प्राधिकरण (डिस्ट्रिक एप्रोप्रीएट अथोरिटी-डीडीए) का गठन किया गया। इसमें जिले के सिविल सर्जन अध्यक्ष होते हैं, जबकि जिला अटॉर्नी और महिला एवं बाल विकास विभाग के जिला कार्यक्रम अधिकारी इसके अन्य सदस्य होते हैं।
महत्वपूर्ण बात यह है कि पीसीपीएनडीटी अधिनियम के अंतर्गत कार्रवाई प्रारंभ करने का अधिकार केवल डीडीए को ही प्राप्त है। इस संरचना का उद्देश्य स्पष्ट रूप से जिम्मेदारियों का विभाजन करना था, स्वास्थ्य अधिकारी यह निर्धारित करते हैं कि अल्ट्रासोनोग्राफी के माध्यम से अवैध लिंग जांच हुई है या नहीं। जिला अटॉर्नी कानूनी प्रावधानों की व्याख्या और न्यायालय में प्रभावी अभियोजन सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार होते हैं। जिला कार्यक्रम अधिकारी लैंगिक भेदभाव के सामाजिक पहलुओं पर कार्य करते हुए जन-जागरूकता बढ़ाने का दायित्व निभाते हैं। स्पष्ट है कि इस अधिनियम का क्रियान्वयन चिकित्सा, कानूनी और सामाजिक संस्थाओं के संयुक्त प्रयास के रूप में परिकल्पित किया गया था। केवल स्वास्थ्य अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराना कानून की मूल भावना और संरचना दोनों की अनदेखी है।
डिकॉय ऑपरेशनों की जमीनी हकीकत
वर्ष 2014-15 से स्वास्थ्य विभाग ने अवैध लिंग जांच और भ्रूण लिंग चयन में संलिप्त लोगों को पकडऩे के लिए अनेक डिकॉय ऑपरेशन चलाए हैं। अपने कार्यकाल के दौरान अंतर-जिला और अंतर-राज्यीय छापेमारियों में मैंने एक चिंताजनक वास्तविकता देखी—70 प्रतिशत से अधिक मामलों में शामिल व्यक्ति पंजीकृत चिकित्सा व्यवसायी ही नहीं थे। अनेक लोगों के पास मान्यता प्राप्त चिकित्सा योग्यता नहीं थी, और कई मामलों में उपयोग किए जा रहे अल्ट्रासाउंड मशीन भी पंजीकृत नहीं थे। यह स्पष्ट करता है कि समस्या केवल लाइसेंसधारी चिकित्सकों तक सीमित नहीं है। अवैध नेटवर्क आज भी अपंजीकृत व्यक्तियों, कमजोर निगरानी व्यवस्था और अपर्याप्त प्रवर्तन के सहारे सक्रिय हैं।
कमजोर दोषसिद्धि दर: एक गंभीर चिंता
मेरे कार्यकाल के दौरान ऐसे 16 मामलों में कार्रवाई की गई, लेकिन अंतत: केवल एक मामले में ही दोषसिद्धि हो सकी।
यह अत्यंत कमजोर दोषसिद्धि दर एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है क्या पीसीपीएनडीटी अधिनियम के अंतर्गत दायर शिकायतों की अदालत में प्रस्तुत करने से पहले पर्याप्त कानूनी जांच की जाती है?कई मामले इसलिए नहीं विफल होते कि अपराध नहीं हुआ, बल्कि इसलिए कि जांच, दस्तावेजीकरण, प्रक्रियात्मक अनुपालन और अभियोजन अक्सर कमजोर होते हैं। कमजोर शिकायतें कानून के प्रवर्तन की विश्वसनीयता को कम करती हैं और अपराधियों का मनोबल बढ़ाती हैं।
पुलिस की भूमिका को लेकर अस्पष्टता
पीसीपीएनडीटी नियमों के अनुसार, अधिनियम के अंतर्गत जांच मुख्यत: उपयुक्त प्राधिकरण के दायरे में रहने का उद्देश्य रखती है। कानून में कहा गया है कि जहां तक संभव हो पुलिस की प्रत्यक्ष भागीदारी से बचा जाए, क्योंकि ऐसे मामलों को दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत शिकायत मामलों के रूप में माना जाता है। हालांकि जहां तक संभव हो जैसे शब्दों की व्याख्या अक्सर अलग-अलग ढंग से की जाती है। कुछ परिस्थितियों में पुलिस की भागीदारी अपरिहार्य हो जाती है, विशेषकर तब जब संगठित अंतर-राज्यीय गिरोहों या आदतन अपराधियों से निपटना हो। लेकिन उचित कानूनी समन्वय के बिना पुलिस पर अत्यधिक निर्भरता, अधिनियम के अंतर्गत सफल अभियोजन के लिए आवश्यक तकनीकी और प्रक्रियात्मक मजबूती को कमजोर भी कर सकती है।
संस्थागत जवाबदेही की आवश्यकता
गिरते लिंगानुपात की समस्या केवल चिकित्सा अधिकारियों के निलंबन से हल नहीं हो सकती। जवाबदेही प्रत्येक संबंधित पक्ष तक विस्तारित होनी चाहिए। कानूनी अधिकारी शिकायतों को अदालत में दायर करने से पहले गंभीरता से जांचें। जिला प्रशासन अल्ट्रासाउंड केंद्रों और उपकरणों की प्रभावी निगरानी सुनिश्चित करे। सामाजिक कल्याण विभाग समुदायों के बीच सक्रिय जागरूकता अभियान चलाएं और लैंगिक भेदभाव को चुनौती दें। कानून प्रवर्तन एजेंसियाँ संगठित अवैध गतिविधियों के मामलों में प्रभावी समन्वय स्थापित करें। चयनात्मक दंड भय तो पैदा कर सकता है, लेकिन स्थायी समाधान नहीं।
मूल समस्या सामाजिक है, केवल चिकित्सकीय नहीं
वास्तव में कन्या भ्रूण हत्या बेटियों के प्रति गहरे सामाजिक पूर्वाग्रह का परिणाम है। कोई भी कानून, चाहे कितना ही कठोर क्यों न हो, तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक समाज स्वयं नहीं बदलता। पीसीपीएनडीटी अधिनियम तकनीक के दुरुपयोग को नियंत्रित कर सकता है, लेकिन वह उस मानसिकता को समाप्त नहीं कर सकता जो लिंग चयन की मांग को जन्म देती है।
लिंगानुपात में वास्तविक सुधार के लिए आवश्यक है। जिसके तहत निरंतर जन-जागरूकता अभियान,गैर-सरकारी संगठनों और महिला समूहों की सक्रिय भागीदारी, धार्मिक एवं सामुदायिक नेताओं का सहयोग,विद्यालयों में लैंगिक संवेदनशीलता शिक्षा,महिलाओं का सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण,तथा मीडिया और सार्वजनिक विमर्श में बेटियों की सकारात्मक छवि।
गिरते लिंगानुपात के विरुद्ध संघर्ष को केवल कानूनी अभियान नहीं बल्कि सामाजिक आंदोलन बनाना होगा।
गिरता लिंगानुपात समाज, संस्थाओं और शासन व्यवस्था
सभी की सामूहिक विफलता का परिणाम है। केवल प्रशासनिक स्वास्थ्य अधिकारियों को दोषी ठहराना एक अत्यंत जटिल समस्या को अत्यधिक सरल बनाना है। पीसीपीएनडीटी अधिनियम को चिकित्सा, कानूनी और सामाजिक संस्थाओं के समन्वित प्रयास के रूप में बनाया गया था। जब तक सभी संबंधित पक्ष अपनी जिम्मेदारियाँ ईमानदारी से नहीं निभाते और समाज स्वयं लैंगिक भेदभाव को अस्वीकार नहीं करता, तब तक केवल निलंबन और छापेमारी से स्थायी परिवर्तन संभव नहीं होगा।लिंगानुपात में सुधार के लिए केवल कानून का कठोर प्रवर्तन ही नहीं, बल्कि सामाजिक सोच में परिवर्तन भी आवश्यक है। स्थायी और सार्थक प्रगति केवल सामूहिक जिम्मेदारी और जनभागीदारी से ही संभव है।
--डा.वीरेश भूषण, सेवानिवृत सिविल सर्जन सिरसा