इस नदी में 49 साल बाद फिर से आएगा पानी, कभी वर्ष भर बहती थी राजस्थान की ये नदी
नदी के पानी से कभी लोग की प्यास बुझती थी। हर वर्ष इसमें पानी बहता था। इसके बाद इस नदी में पानी आना बंद हो गया।
सारे साल बहने वाली और आसपास के गांवों की जीवनरेखा रही साबी नदी अब अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। सालों से सूखी पड़ी नदी को पुनर्जीवित करने का कदम शुरू होने से कई जिलों में जल संकट कम होने की उम्मीद जगी है। इस पहल से कोटपूतली-बहरोड़ सहित राजस्थान के कई जिलों में जल संकट कम होगा। बता दें कि जल संरक्षण विभाग पारंपरिक नालों, जोहड़ों और वर्षाजल बहाव मार्गों को फिर से सक्रिय कर उन्हें साबी नदी से जोडऩे की योजना तैयार कर रहा है। इतिहासकारों के अनुसार मुगल सम्राट अकबर ने नदी को नियंत्रित करने और बांध निर्माण का प्रयास किया था, लेकिन सफलता नहीं मिली। इससे जुड़ी लोककथा आज भी क्षेत्र में प्रचलित है। वर्ष 1923 में अलवर नरेश का बांध निर्माण प्रयास भी अधूरा रह गया था।
इस स्कीम के लागू होने पर क्षेत्र में जल संरक्षण को मजबूती मिलने के साथ सिंचाई व्यवस्था में भी सुधार हो सकेगा। एक वक्त ऐसा था जब बारिश में साबी नदी का बहाव इतना तेज होता था कि कई बार यातायात प्रभावित हो जाता था और ग्रामीणों को पैदल नदी पार करना पड़ता था। इस नदी के पानी से खेतों की सिंचाई, पशुपालन और पेयजल के लिए भी पानी उपयोग में लिया जाता था। पिछले 30 दशकों में नदी क्षेत्र में अतिक्रमण, अवैध मिट्टी दोहन और विभिन्न संरचनात्मक बदलावों से नदी का प्रवाह लगातार कमजोर होता गया।
जल संरक्षण विभाग ने नदी के पुनर्जीवन के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार की है। प्रारूप के अध्ययन के बाद अंतिम रिपोर्ट तैयार होगी। योजना के तहत पारंपरिक जल स्रोतों, जोहड़ों और प्राकृतिक जल बहाव मार्गों की क्षमता बढ़ाकर उन्हें नदी तंत्र से जोड़ा जाएगा, जिससे वर्षाजल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण बढ़ सके।
नदी में सारे साल बहता था पानी
बुजुर्गों के ने बताया कि साल 1988 से पहले साबी नदी में पूरे वर्ष पानी बहता था। बारिश के मौसम में नदी उफान पर रहती थी और कई गांवों के बीच सम्पर्क टूट जाता था। नदी किनारे बसे गांवों में लोग 'साबी माता' की पूजा-अर्चना करते थे, लेकिन जल प्रवाह समाप्त होने के साथ यह परम्परा धीरे-धीरे खत्म हो गई। बताया जा रहा है कि अगस्त 1977 में साबी नदी के विकराल रूप ने आसपास के गांवों में भारी तबाही मचाई थी। आज भी ग्रामीण उस बाढ़ को याद करते हैं। साबी नदी का उद्गम शाहपुरा तहसील के अजीतगढ़ और अमरसर क्षेत्र की पहाडय़िों से माना जाता है। यहां से निकलकर यह हरियाणा की ओर बढ़ती है और आगे यमुना नदी तंत्र से जुड़ती है।
हंसराज पटेल, विधायक कोटपूतली ने कहा कि साबी नदी को पुनर्जीवित करने के लिए डीपीआर पर कार्य शुरू हो गया है। योजना सफल होने पर नदी से जुड़े क्षेत्रों में भूजल स्तर बढ़ेगा और किसानों को सिंचाई के बेहतर संसाधन मिल सकेंगे।