CDLU सिरसा में रोजगारपरक कौशल विकास पर तीन दिवसीय कार्यशाला शुरू, RPL पर मंथन
MAHENDRA INDIA NEWS, NEW DELHI
हरियाणा राज्य उच्चतर शिक्षा परिषद के सहयोग से चौधरी देवीलाल विश्वविद्यालय, सिरसा तथा स्किल्स डेवलपमेंट नेटवर्क द्वारा रोजगारपरक कौशल सुविधा प्रदाता विकास कार्यक्रम (Employability Skills Facilitator Development Programme) एवं पूर्व अर्जित कौशलों की पहचान (Recognition of Prior Learning—RPL) पर तीन दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है।
कार्यशाला के उद्धघाटन सत्र में मुख्य अतिथि एवं हरियाणा राज्य उच्चतर शिक्षा परिषद के अध्यक्ष प्रो. कैलाश चंद्र शर्मा ने कहा कि वाधवानी फाउंडेशन के सहयोग से आयोजित यह तीन दिवसीय कार्यशाला पूर्व अर्जित कौशलों की पहचान और रोजगारपरक कौशल विकास की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। उन्होंने भारतीय शिक्षा परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि प्राचीन गुरुकुलों और विश्वविद्यालयों में शिक्षा को केवल कक्षा और पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रखा जाता था, बल्कि विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास पर ध्यान दिया जाता था।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भी समग्र शिक्षा की इसी भावना को आगे बढ़ाती है। शिक्षा का उद्देश्य विद्यार्थियों के शारीरिक, प्राणिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक विकास को प्रोत्साहित करना होना चाहिए, ताकि वे अपनी क्षमताओं का पूर्ण उपयोग कर सकें। उन्होंने विद्यार्थियों की व्यक्तिगत प्रतिभा और रुचि के अनुसार विषयों के चयन, कौशल विकास तथा व्यावहारिक ज्ञान उपलब्ध करवाने की आवश्यकता पर बल दिया।
प्रो. के.सी. शर्मा ने कहा कि आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में विद्यार्थियों को निर्धारित विषयों तक सीमित रखने के बजाय उन्हें अपनी रुचि के अनुसार विभिन्न विषयों और कौशलों को चुनने के अवसर मिलने चाहिए। जिस स्तर पर विद्यार्थी अध्ययन कर रहा है, उसी के अनुरूप उसे रोजगार से जुड़े कौशलों का प्रशिक्षण भी दिया जाना चाहिए। पूर्व अर्जित कौशलों की पहचान इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, क्योंकि इससे कार्य अनुभव और व्यावहारिक दक्षताओं को शैक्षणिक एवं रोजगार के अवसरों से जोड़ने में मदद मिलती है।
सीडीएलयू के कुलगुरु प्रो. विजय कुमार ने मुख्य अतिथि तथा प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम की रूपरेखा और उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में उच्च शिक्षा को रोजगार की बदलती जरूरतों के अनुरूप बनाना आवश्यक है। विद्यार्थियों में विषयगत ज्ञान के साथ-साथ व्यावहारिक दक्षताओं, संचार कौशल और कार्यस्थल पर उपयोगी क्षमताओं का विकास किया जाना चाहिए। पूर्व अर्जित कौशलों की पहचान के माध्यम से औपचारिक शिक्षा से बाहर प्राप्त अनुभवों और दक्षताओं को भी उचित मान्यता मिल सकती है।
प्रो. विजय कुमार ने कहा कि रिकग्निशन ऑफ प्रायर लर्निंग की पहचान औपचारिक, अनौपचारिक और गैर-औपचारिक माध्यमों से प्राप्त दक्षताओं को मान्यता देने का प्रभावी माध्यम है। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को उनकी रुचि, प्रतिभा और शैक्षणिक स्तर के अनुरूप कौशल विकास के अवसर उपलब्ध करवाना समय की आवश्यकता है।
चौधरी बंसी लाल विश्वविद्यालय भिवानी की कुलगुरु प्रो. दीप्ति धर्माणी ने अपने संबोधन में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 को उच्च शिक्षा के क्षेत्र में परिवर्तनकारी पहल बताया। उन्होंने कहा कि इस नीति में लचीलापन, बहु-विषयक शिक्षा तथा विद्यार्थियों के लिए प्रवेश और निकास के अनेक विकल्प उपलब्ध कराने पर विशेष बल दिया गया है। आज केवल रोजगार और बेरोजगारी पर चर्चा करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि युवाओं की रोजगारपरकता (Employability) बढ़ाना भी एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है।उन्होंने कहा कि देश के लगभग 80 से 90 प्रतिशत कामगारों के असंगठित क्षेत्र में कार्यरत होने के संदर्भ में उनके कौशलों की पहचान, मूल्यांकन और मान्यता अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। उच्च शिक्षा संस्थानों को संख्या के बजाय गुणवत्ता पर ध्यान देना चाहिए। शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री प्रदान करना नहीं, बल्कि आजीवन सीखने की प्रवृत्ति विकसित करना होना चाहिए जिससे आजीवन सीखने की प्रक्रिया को आजीविका अर्जित करने के अवसरों से जोड़ा जा सके।
कार्यशाला में सीडीएलयू के डीन एकेडमिक अफेयर्स प्रो. सुशील कुमार, डीन स्टूडेंट्स वेलफेयर प्रो. सुरेंद्र सिंह, कैरियर काउंसलिंग इंटर्नशिप एंड इंडस्ट्री सेल के निदेशक प्रो. कपिल चौधरी, एसडीएन से आर एस राठौड़, वाधवानी फाउंडेशन से प्रियंका, एसवीएसयू पलवल से डॉ संजय सिंह, एमडीयू रोहतक के आईक्यूएसी के निदेशक प्रो. नरसिम्हा बी, विभिन्न महाविद्यालयो के प्राध्यापक, प्रदेशभर के विश्वविद्यालयों के डीन एकेडमिक अफेयर्स, आरपीएल समन्वयक तथा फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम के प्रतिभागी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का मंच संचालन डॉ. टिम्सी और डॉ. चनप्रीत ने किया। कार्यशाला के माध्यम से उच्च शिक्षा संस्थानों में रोजगारपरक कौशलों के विकास, पूर्व अर्जित दक्षताओं की पहचान तथा शिक्षा और रोजगार के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने पर विचार-विमर्श किया जा रहा है।