दुर्गा अष्टमी पर कन्या जिमाने वाला समाज बालिकाओं की रक्षा करने का संकल्प क्यों नहीं ले पाता है
Mahendra india news, new delhi
लेखक
नरेंद्र यादव
नेशनल वाटर अवॉर्डी
यूथ एंपावरमेंट मेंटर
हम वर्षों से दुर्गा अष्टमी का त्यौहार मनाते आ रहे है, अष्टमी के दिन कन्याओं को भोजन कराने, उनके पैर छूकर उन्हें दान देकर आदर करने की प्रथा लगभग सभी के यहां है। या तो दुर्गा अष्टमी के दिन या फिर राम नवमी के दिन हम सभी साल में दो बार कन्या जिमाते है, उन्हें भोजन कराते है, यह पुनीत कार्य सभी परिवारों में होता है, परंतु आज स्थिति ये हो गई है कि उन पवित्र दिनों में भी हमे जिमाने के लिए बेटियां घरों में मिलती ही नहीं है, क्योंकि बेटियों की संख्या कम है।
आज का दिन हम राष्ट्रीय बालिका दिवस के रूप में मना रहे है। ये विषय तो बहुत गंभीर है कि जो समाज प्रतीक के रूप में कन्याओं को भोजन कराकर उनके चरण छूकर आशीर्वाद लेने की प्रक्रिया करता हो, वो अपने खुद के घर में बेटियों को क्यों नहीं पैदा करना चाहते है? भारतीय संस्कृति इतनी मजबूत है, इतनी शिक्षाप्रद है कि हमे अपनी हर रीति रिवाज से सीखने को मिलता है, मानव बनने का अवसर मिलता है, लेकिन हमने इन सभी प्रतीकों को पाखंड के रूप में विकसित तो कर लिया है
लेकिन हमारे व्यवहार में ये विकसित नहीं हो पाता है। हमने कन्या को जिमाने का अर्थ कभी अपनी नौजवान पीढ़ी को समझाया ही नहीं, हमने कन्याओं के पैर छूने का अर्थ कभी समझा ही नहीं है? अरे जिस देश की परंपराएं इतनी गहरी हो, इतनी उज्ज्वल हो, इतनी विस्तारित हो, जो ज्ञान देने वाली हो, जो वसुधैव कुटुंबकम् का विमर्श रखती हो तो फिर हम उनसे खुद क्यों नहीं सीखना चाहते है। क्या सभी मातापिताओं को कन्या जिमाने का मतलब समझ में नहीं आता है? क्या हर घर में बुजुर्ग नहीं है जो इनका मतलब समझा सके?
क्या कभी किसी मातापिता ने या बुजुर्ग ने अपने बेटों को कन्या जिमाने का अर्थ समझाया? क्या बेटियों के बिना यह समाज संतुलित बन सकता है? क्या बेटियों के बैगर ये मानव नस्ल आगे बढ़ सकती है? क्या हमे अपनी बेटियों की व्यथा नहीं पता है? क्या बेटियां बेटों से कम है? क्या बेटियां इस राष्ट्र को मान सम्मान नहीं दिला रही है, इन सभी प्रश्नों के जवाब में मै यही कहना चाहता हूँ कि सब कुछ का ज्ञान तो सभी को है, बेटियों का महत्व भी समझ में आता है, लेकिन अपने व्यवहार में बदलाव नहीं करना चाहते है। ह्यूमन बीइंग के मन में छुपे अहंकार को समझना मुश्किल है, वह अहंकार सभी के जीवन को प्रभावित करता है, यह मानव बनने ही नहीं देता है।
हम पीढ़ियों से मां सरस्वती, माता लक्ष्मी व माता दुर्गा को बेटियों के रूप में ही तो पूजते आ रहे है, हम शीतला माता की पूजा भी तो माता के रूप में ही करते है, हम माता मंशादेवी की पूजा भी तो मां बहन बेटियों को आदर सम्मान देने के लिए ही करते है, इसी तरह माता ज्वाला देवी जी की पूजा भी हम अपनी बहन बेटियों के सम्मान के लिए करते है, लेकिन ये सब हमारे लिए केवल क्रियाएं ही रह गई है, ये केवल प्रतीक बनकर रह गई है। अगर समझना हो तो ये सभी त्यौहार हमारे लिए शिक्षा के लिए ही है।
यहां हमे एक बात विशेष रूप से समझनी होगी कि ये सभी त्यौहार, उपवास, उत्सव मानव के उत्थान के लिए ही मनाएं जाते है लेकिन हमने खुद के निर्माण को तो छोड़ दिया है और सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, कण कण में विराजमान तत्व के उत्थान की ही कोशिश करने लगे है। कैसी विडंबना है कि हमने ईश्वर तत्व को भी इंसानी रूप में खड़ा करने का प्रयास किया है, हम जो सर्वशक्तिमान है जो इस ब्रह्माण्ड के कण कण में बसे हुए है उसे ही मानव के रूप में देखना शुरू कर दिया है, उस देवरूपी शक्ति को ही रुग्ण करना शुरू कर दिया है, जो शक्ति इंसान को मानव बनाने के लिए थी, हम उसे ही अपने अनुसार चलाने लगे है, ये विमर्श श्रीमद्भगवद् गीता तथा हमारे विभिन्न शास्त्रों के न केवल विरुद्ध है बल्कि उस सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, कण कण में विराजमान ईश्वर को छोटा करने के बराबर है।
जहां एक ओर इंसान को संकीर्णता छोड़नी थी, जहां एक ओर इंसान को अपना विराट रूप व विचार को विस्तार देना था, उसके विपरीत हमने उस विराट रूप को ही इंसान बनाना शुरू कर दिया है। सभी का कल्याण तभी होगा, जब हम मानव बनेंगे, जब हम मानव मूल्यों के अनुसार जीवन जिएंगे, हम मानव मूल्यों की रक्षा करेंगे, जब हम नैतिक मूल्यों के राह पर चलेंगे। युवा दोस्तों, मै और तो किसी से क्या कहूं लेकिन आप शक्तिशाली हो, आप विचारवान हो, आप अपने व्यक्तित्व को बदलने की सामर्थ्य रखते हो, इसलिए हमारे शास्त्रों के इन प्रतीकों को समझने का जतन करो, इन प्रतीकों से सिंबल ऑफ साइंस को समझने का यत्न करो, तभी हम अपने जीवन को श्रेय मार्गी बना पाएंगे। जो मानव निर्माण की शिक्षा हमारे चारों वेदों में दी गई है उन्ही को थोड़ा सरल करके कथाओं तथा प्रतीकों के रूप में लाकर इंसान को उस ज्ञान रूपी परंपरा को समझाने की कोशिश की गई है,
उसे समझने की जरूरत है। कन्या जिमाने का सीधा सा अर्थ है कि हम बेटियों का सम्मान करें
कि हम बहन बेटियों को शिक्षित बनाएं, सशक्त बनाएं।
कि हम मां बहन बेटियों का हर घर में आदर सत्कार करें।
कि हम कन्या भ्रूण हत्या ना करें।
कि हम बेटियों को सुरक्षा देने के लिए अपने विचारों को विस्तार दें।
कि बहन बेटियों को बुरी नजर से न देखें।
कि बहन बेटियों को भी पौष्टिक भोजन कराएं।
कि बहन बेटियों को भी सभी स्नेह करें, तथा उनका भी आदर करें।
कि बेटियों को सुरक्षित रखने के लिए अपने सभी प्रकार के संकीर्ण विचार त्याग दें।
कि हर घर के बेटे सभी बेटियों को अपनी बहन बेटी मानकर सुरक्षा की जिम्मेदारी लें।
कि सभी घरों में दुर्गा अष्टमी या राम नवमी के दिन कन्या जिमाने के साथ साथ अपने परिवार के बेटों को इसका मतलब बताएं कि यह पर्व बेटियों की रक्षा सुरक्षा के लिए है, बाकी इसका यही अर्थ समझना होगा।
कि छोटी बेटी मां सरस्वती, मां लक्ष्मी, मां दुर्गा का रूप है, इसे पूरी उम्र अपने व्यवहार में सजों कर रखना है।
कि किसी भी बहन बेटी को किसी भी प्रकार से प्रताड़ित नहीं करना है, यह कन्या जिमाते वक्त ध्यान में लेना है।
कि शादी विवाह में दहेज न लेने का संकल्प लेना होगा।
कि बहन बेटियों को उनके हिस्से की शिक्षा, सम्मान, पौष्टिक आहार, सुरक्षा देने का प्रण लेना होगा।
बालिका दिवस के इस पावन अवसर पर हम सभी को संकल्प लेना है कि अपने व्यवहार में बदलाव करेंगे और कन्या बैठाने, कन्या जिमाने के असली अर्थ को समझकर बेटियों की सुरक्षा के लिए सदैव कृत संकल्प रहेंगे, वो इस समाज राष्ट्र की शक्ति है।
जय हिंद, वंदे मातरम