युवाओं को अपनी समझ को विकसित करने की जरूरत है, ताकि उनका जीवन सार्थक बने

 

mahendra india news, new delhi
लेखक
नरेंद्र यादव
नेशनल वाटर अवॉर्डी
यूथ एंपावरमेंट मेंटर

कुछ लोग है जो दुनिया को यह सिखा रहे है कि हर इंसान अपना जीवन अपनी मर्जी से जीएं, केवल अपनी खुशी के लिए जिएं, केवल अ+पनी स्वतंत्रता के अनुसार जीएं, केवल खुद के लिए जीएं। शायद वो लोग जो ऐसा करते है वो ये भूल जाते है कि युवाओं को ऐसा सिखाने से पहले उन्हें स्वतंत्रता, खुशी, मर्जी की परिभाषा भी बतानी चाहिए, उन्हें यह भी बताना चाहिए कि किसी का भी जीवन स्वतंत्र नहीं है, हां हमारे पास विचार, समझ, तथा विमर्श की स्वतंत्रता अवश्य होती है, लेकिन जीवन सदैव एक दूसरे से जुड़ा होता है।

इतनी समझ तो सभी में होनी चाहिए कि एक व्यक्ति की जो भी जरूरतें होती है वो किसी दूसरे की मेहनत से पूरी होती है, भोजन हमे किसानों की मेहनत से मिलता है, पानी हमे बड़े चैनलों के माध्यम से मिलता है, शिक्षा हमे सरकार द्वारा संचालित या दूसरों के बनाए हुए शिक्षण संस्थानों से मिलती है, यहां तक कि जन्म भी मातापिता से मिलता है, चलना हम दूसरों की मदद से सीखते है, हमारी अधिकतर सुविधाएं दूसरों के कारण आती है,

+फिर कोई भी युवा इतना अहंकारी कैसे हो सकता है, वो इतना एरोगेंट कैसे हो सकता है कि ये कहने की हिम्मत करें कि ये जीवन मेरा है, मै इसे जैसे चाहूं वैसे जिऊंगा, मै इसे अपने अनुसार व्यतीत करूंगा, यहां तक कि वह अपने मातापिता को भी इग्नोर कर देते है। कितनी बड़ी अज्ञान पूर्ण बात है कि ये मेरा जीवन है, ये मेरी मर्जी है,ये मेरी आजादी है, ये मेरी स्वतंत्रता है, अरे कैसी स्वतंत्रता है जो एक कदम भी किसी दूसरे के बिना नहीं चल सकती है। युवा साथियों हमारा जीवन एक जाल है, जिसे हम नेट भी कह सकते है,

जिसके हर छोटे स्क्वेयर पर एक गांठ है जो दूसरों से जुड़ी हुई है, हम सभी इस ब्रह्माण्ड के हिस्से है, जो पांच महाभूतों से बना हुआ है वही शरीर तो हमारी भौतिक पहचान है, हमे भोजन इस धरती से मिलता है, सांसे हमे पेड़ों द्वारा दी गई ऑक्सीजन से मिलती है, लेकिन फिर भी हम इस जीवन को अपने अनुसार जीना चाहते है, दूसरों का हिस्सा भी हथियाना चाहते है, मातापिता को कष्ट देकर अपनी इगो को शांत करना चाहते है। यहां संसार में सभी एक दूसरे से कनेक्ट है, जिसे कोई चाह कर भी अलग नहीं कर सकता है। यहां हमे एक बात बहुत स्पष्ट रूप में समझ लेनी चाहिए कि स्वतंत्रता का अर्थ विचारों में, विमर्श में विस्तार्ण होना चाहिए। जब हम कहते है कि मेरी मर्जी है, इसका अर्थ यह है कि हम संपूर्णता से अलग होकर जीना चाहते है,

जब कोई भी युवा कहता है कि ये मेरा जीवन है तो वो कहना चाहता है कि मैं इस ब्रह्माण्ड का अंश नहीं हूँ, ये तो ऐसा ही हुआ न कि पानी की एक बूंद समुद्र से अलग होकर कहे कि मैं अलग हूँ, मेरी मर्जी मै जैसे भी रहूं, लेकिन ये तो हम सब जानते है कि अगर कोई बूंद समुद्र से अलग होकर जीना चाहे तो थोड़ी ही देर में सूख जाएगी और खत्म हो जाएगी। अगर कोई पेड़ का पत्ता कहे कि मैं अलग होकर जीवन जीना चाहता हूँ तो पेड़ के बिना पत्ते का कोई अस्तित्व नहीं है, उसे यह समझ विकसित करने की आवश्यकता है। यहां किसी का भी जीवन स्वतंत्र नहीं है, हां विचार अवश्य स्वतंत्र होते है, जिसका अर्थ  केवल संकीर्णता से ऊपर उठना है।  भगवान श्रीकृष्ण जी महाराज ने श्रीमद्भगवद् गीता में छठे अध्याय के पांचवें श्लोक में अर्जुन को उपदेश देते हुए कहा है कि " उधरेदा आत्मनमात्मानम न आत्मनाम अवसादयेत। आत्मैव ह्यआत्मनो बंधुरआत्मैव रिपुतमन:।।"

अर्थात आप अपने मन की शक्ति से अपना उद्धार करें, इसका पतन न होने दें। मन ही हमारा मित्र है और मन ही हमारा शत्रु भी है जिसके द्वारा हमारा उत्थान भी हो सकता है, व पतन भी हो सकता है। इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण जी अर्जुन को कह रहे है कि अर्जुन तुम आत्मिक रूप से सशक्त बनने की ओर बढ़ें। हम जब युवाओं के मन की बात करते है तो यही तो युवाओं का मित्र है अगर यह सकारात्मक दिशा में जाता है और अगर यही मन नेगेटिव ऊर्जा के साथ बढ़ता है तो यही सबसे बड़ा शत्रु है। यहां जब हम एक इंसान की समझ को विकसित करने की बात करते है तो ये वही मन है जिसे नियंत्रित कर तर्कशीलता की ओर लेकर जाने की जरूरत है। पॉजिटिव व नेगेटिव रूपी बार का बीच का प्वाइंट समझ कहलाता है,

मध्यम मार्ग ही समझ है, निष्पक्ष रहना ही समझ है, न्याय के साथ खड़े रहना ही समझ है, इसी स्थिति को डेवलप करने के लिए युवाओं को अपने मन को श्रेय मार्ग पर लेकर जाने की जरूरत है। समझ या अंडरस्टैंडिंग या विजडम केवल ज्ञान नहीं है, यह ज्ञान का व्यवहारिक उपयोग है, वह ज्ञान जिसे अनुभव या तर्कशीलता की कसौटी पर कस कर उपयोग किया जाने वाला है, समझ वह है जहां वृद्धता है। समझ कोई किताबों से नहीं मिलती है, समझ कहीं पुस्तकों में नहीं पढ़ी जा सकती है, यह कोई इंटेलिजेंस नहीं है, यह जीवन का मध्यम मार्ग है, जिससे व्यक्ति अपने भीतर वास्तविकता को देखने की क्षमता विकसित कर पाता है, वह यथार्थ को देखने की ताकत खुद के अंदर विकसित करता है, वह निष्पक्षता विकसित करता है,

वह न्याय के साथ निर्णय लेने की क्षमता अपने भीतर पैदा करता है, समझ किसी उम्र की मोहताज नहीं है, वह कम आयु में भी विकसित की जा सकती है, ज्ञान को जब हम व्यवहार की लैब में परखते है, स्थिति परिस्थिति के अनुसार परखते है, उसी से समझ विकसित होती है। समझ समग्र में है, समझ विशालता में है, समझ विराटता में है, समझ निष्पक्षता में है, समझ न्याय में है। संकीर्णता में समझ विकसित नहीं हो सकती है, वहां केवल स्वार्थ, द्वेष, जलन, पक्षपात पैदा होता है। युवाओं को चाहिए कि अपने ज्ञान को समझ बनने तक विकसित करें, इसके लिए वो " नेति नेति का सिद्धांत" अपना सकते है, वही हमारे व्यक्तित्व को विकसित करेगी, जिससे स्वयं, समाज व राष्ट्र का भला होगा।
जय हिंद, वंदे मातरम