भक्ति तो हर सांस के साथ होनी चाहिए, क्योंकि किसी को नहीं मालूम कि उसकी कौन-सी सांस अंतिम सांस है :  सतगुरु कँवर साहेब जी महाराज

Devotion should accompany every single breath, for no one knows which breath will be their last. — Satguru Kanwar Saheb Ji Maharaj
 

  Mahendra india news, new delhi
सत्संग की वास्तविक शोभा संगत से होती है और सच्चा सत्संग वही है, जिसमें मनुष्य का त्रिविध कल्याण हो—संतों के दर्शन हों, उनके अमृतमयी वचनों का श्रवण हो और अंतर्मन में प्रसन्नता एवं शांति का अनुभव हो। परमात्मा की भक्ति को समय की सीमा या गिनती में नहीं बांधा जा सकता। भक्ति तो हर सांस के साथ होनी चाहिए, क्योंकि किसी को नहीं मालूम कि उसकी कौन-सी सांस अंतिम सांस है।यह सत्संग वचन परमसंत सतगुरु कँवर साहेब जी महाराज ने चौपटा के पास रूपवास गांव में स्थित राधास्वामी आश्रम में फ़रमाये।

हजारो की संख्या में उमड़ी साध संगत को उच्च कोटि का अध्यात्म परोसते हुए परमसंत सतगुरु कंवर साहेब जी महाराज ने फरमाया किसंतों का सत्संग हमें यही चेतावनी देता है कि उठते-बैठते, सोते-जागते उस परमात्मा को याद रखो, जिसने हमें यह सुंदर जीवन प्रदान किया है। हर पल उसका शुक्राना करो। भक्ति करनी है तो कबीर साहेब, नामदेव, लक्खा माली, धन्ना भगत और मीराबाई जैसे भक्तों की राह पर चलो, जिन्होंने हाथ से कभी काम नहीं छोड़ा और हृदय से कभी राम को नहीं छोड़ा।हुजूर महाराज जी ने फरमाया कि जीव काल के नाच पर नाचता है। इसलिए जब भी मनुष्य सत्य के मार्ग पर चलना शुरू करता है, काल अपनी चाल चलनी शुरू कर देता है और कर्मों की फांस उसके लिए इकट्ठी होने लगती है। इसी काल के जाल से बचाने और सुख-दुख के घेरे से निकालने के लिए परमात्मा सतगुरु को देह रूप में इस संसार में भेजता है। संत सतगुरु ही मनुष्य को लोभ, मोह, माया, मद और अभिमान जैसे पांच चोरों से बचाते हैं। इनसे बच भी जाए तो ईर्ष्या और मन की अनियंत्रित कामनाएं जीव को विचलित करती रहती हैं।


हुजूर कंवर साहेब ने फरमाया कि ये पांचों चोर पांच कर्मेंद्रियों के माध्यम से ही जीव को लूटते हैं। यदि मनुष्य अपनी कर्मेंद्रियों को साध ले तो काल के फंदे से बचने का मार्ग खुल सकता है। यहीं सत्संग, सतनाम और सतगुरु की महत्ता सामने आती है। सतगुरु के मिल जाने से जीवन सधने लगता है और काल का लेखा भी निमटने लगता है।नशे के विषय में सामाजिक चेतना का संदेश देते हुए गुरु महाराज ने फरमाया कि लत हर चीज की बुरी होती है। नशा केवल मादक पदार्थों से ही नहीं होता।

धतूरे की तुलना में सोने में सौ गुना अधिक नशा या पागलपन पैदा करने की शक्ति बताई गई है। धतूरा खाने से इंसान पागल होता है, लेकिन सोना मिल जाने मात्र से व्यक्ति का दिमाग घमंड से फिर सकता है। किसी को रूप का नशा है, किसी को जवानी का, किसी को पद का तो किसी को ताकत का; लेकिन नशा कोई भी हो, वह अंततः मनुष्य को बर्बादी की ओर ले जाता है।परमसंत ने फरमाया कि केवल संत सतगुरु में ही वह शक्ति है जो कण को मन बना सकती है, कौवे को हंस बना सकती है और रंक को राजा बना सकती है। अपने गुरु को याद करते हुए भावविभोर गुरु महाराज ने कहा कि सतगुरु ने जीव पर ऐसा उपकार किया है, जिसका बदला कभी नहीं चुकाया जा सकता।

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गुरुमुखता और मनमुखता का स्पष्ट अंतर बताते हुए हुजूर महाराज जी ने फरमाया कि गुरुमुख कभी गुरु को दोष की दृष्टि से नहीं देखता। वह अपना सर्वस्व गुरु को सौंप देता है। गुरु कभी शिष्य को दूर नहीं करता, बल्कि शिष्य ही अपने स्वार्थ और मन की इच्छाओं के कारण गुरु से दूर हो जाता है। रामायण का प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने कहा कि भगवान राम ने कभी गुरु वशिष्ठ से यह नहीं पूछा कि जब आप मेरे राजतिलक का योग देख रहे थे तो फिर मुझे वनवास क्यों मिला। उन्होंने सदैव गुरु को सर्वोपरि रखा और गुरु की आज्ञा को स्वीकार किया।

संत महात्माओं के अवतरण का उद्देश्य बताते हुए परमसंत ने फरमाया कि संत उस समय धरा पर आते हैं जब धर्म और कर्म क्षीण होने लगते हैं। कबीर साहेब और राधास्वामी मत के अधिष्ठाता स्वामी जी महाराज के जीवन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि दोनों ने ऐसे समय और वातावरण में जन्म लिया, जब चारों ओर अज्ञान, कुरीतियां और जीव हिंसा का बोलबाला था। उन्होंने अपने मत और पंथ के माध्यम से असंख्य जीवों को सच्चाई, प्रेम और भक्ति का मार्ग दिखाया।सामाजिकता का पाठ पढ़ाते हुए हुजूर ने कहा कि नशा केवल एक व्यक्ति की बर्बादी नहीं है, बल्कि इससे पूरा घर, परिवार और आस-पड़ोस प्रभावित होता है। उन्होंने कहा कि भक्ति बाद में करना, पहले सामाजिक होना सीखो। समाज के प्रति भी मनुष्य के अनेक कर्तव्य हैं। माता-पिता के पास बच्चों से बात करने और उन्हें समझने का समय नहीं होता और जब संतान गलत राह पर चली जाती है तो वे पछताते हैं। उन्होंने आह्वान किया कि बच्चों को विकास के मार्ग पर लगाएं। आज हमारे ही आसपास कितने बच्चे खेल, ज्ञान, विज्ञान और कला के क्षेत्र में अपने इलाके का नाम रोशन कर रहे हैं। यदि एक बच्चा ऐसा कर सकता है तो हजारों बच्चे क्यों नहीं कर सकते।


परमसंत ने कहा कि मनुष्य को विचार करना चाहिए कि वह इस संसार में क्यों आया है। वह इसलिए नहीं आया कि जिस अवस्था में संसार में आया था, उससे भी नीचे गिरकर चला जाए। वह इसलिए आया है कि भक्ति की सुगंध लेकर इस संसार को और अधिक पवित्र, सुंदर और बेहतर बनाकर जाए। इतिहास में ऐसे अनेक महापुरुष हुए हैं, जिनके कार्यों के कारण आज दुनिया उनका गुणगान करती है। उन्होंने समाज को इसलिए बनाया क्योंकि उनके मन में पाप और अभिमान का स्थान नहीं था। परमात्मा किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करता, उसके लिए सभी समान हैं।


सदन कसाई का प्रसंग सुनाते हुए हुजूर महाराज जी ने फरमाया कि सदन जाति से कसाई था, लेकिन उसके हृदय में भगवान के प्रति अत्यंत सच्ची और निर्मल भक्ति थी। वह शालिग्राम की श्रद्धापूर्वक पूजा करता था और अपने काम के साथ-साथ हर समय प्रभु का स्मरण करता रहता था। उसकी भक्ति में कोई दिखावा नहीं था। लोगों ने उसकी जाति देखकर उसकी भक्ति पर प्रश्न उठाए, लेकिन भगवान ने उसकी निष्कपट श्रद्धा को स्वीकार किया। सदन की भक्ति यह प्रमाणित करती है कि परमात्मा के लिए मनुष्य की जाति या बाहरी पहचान नहीं, बल्कि उसके हृदय की पवित्रता, प्रेम और निष्कपट श्रद्धा महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि सच्ची श्रद्धा, प्रेम और निष्कपट भक्ति ही ईश्वर की प्राप्ति का सच्चा मार्ग है।गुरु महाराज जी ने कहा कि संकल्प उठाओ कि माँ बाप की सेवा करेंगे बड़े बुजुर्ग का आदर मान करेंगे। पर्यावरण और प्रकृति का संरक्षण करेंगे। अपने बच्चों को उत्तम सामाजिक शिक्षा देते हुए समाज को कुरीतियों और नशे से दूर रखेंगे।