गहलोत ने बताई सनातन में मकर संक्रांति की महत्ता, कहा, गीता में भी श्रीकृष्ण ने बताया है उत्तरायण का महत्व

 

mahendra india news, new delhi
सिरसा। आर्यसमाज बेगू रोड स्थित सिरसा के कार्यकारी प्रधान भूपसिंह गहलोत ने सनातनी परंपराओं में मकर संक्रांति पर्व की महत्ता पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला। अपने आवास पर हवन यज्ञ के आयोजन के दौरान भूप सिंह गहलोत ने कहा कि मकर संक्रांति एक भौगालिक घटना है। संक्रांति का अर्थ है सूर्यदेव का एक राशि से दूसरी राशि में आना।

इस दिन सूर्य भगवान धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं अत: वह राशि जिसमें सूर्य भगवान प्रवेश करते हैं, संक्रांति की संज्ञा से जानी जाती है। मकर संक्रांति के दिन सूर्यदेव दक्षिणायन से उत्तरायन गति करने लगते हैं।

मकर संक्रांति के दिन यज्ञ में दिए गए हव्य को ग्रहण करने के लिए देवता भी लालायित रहते हैं। यह समय आध्यात्मिक उन्नति और शुभकार्यों के लिए श्रेष्ठ है। योगीराज श्रीकृष्ण ने स्वयं गीता में भी वेदोनुसार उत्तरायण का महत्व बताते हुए कहा कि जब सूर्यदेव उत्तरायण में होते हैं और पृथ्वी प्रकाशमय होती है तो इस प्रकाशमय शरीर का परित्याग करने से व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता।

ऐसे लोग ब्रह्म को प्राप्त होते हैं, यानि मोक्ष की प्राप्ति करते हैं। इसके विपरीत दक्षिणायन में जो शरीर का परित्याग करते हैं, वे व्यक्ति पुनर्जन्म में आते हैं। महाभारत के युद्ध में भीष्म पितामह ने भी अर्जुन के बाणों से घायल शरशैय्या पर पड़े मोक्ष की प्राप्ति के लिए उत्तरायण की प्रतीक्षा की थी। हिंदु शास्त्रों के अनुसार मकर संक्रांति के दिन ही देवी गंगा भागीरथ के पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थी। इस अवसर पर अनेक आर्यजन मौजूद थे। अंत में शांतिपाठ व प्रसाद वितरण के साथ सभा का समापन किया गया।