भाषा बता देती है किसी भी व्यक्ति की परिभाषा, युवाओं को अपने शब्दों पर ध्यान देना चाहिए

 

लेखक
नरेंद्र यादव
नेशनल वाटर अवॉर्डी
यूथ एंपावरमेंट मेंटर
हमारे देश का राष्ट्रीय वाक्य "सत्यमेव जयते" है ये तो सभी जानते ही होंगे, अगर नहीं भी जानते है तो जानने की आवश्यकता है। इसका अर्थ सत्य की विजय होती है। इस वाक्य हो मुण्डकउपनिषद से लिया गया है जिसके एक सर्वज्ञात मंत्र में लिखा गया है कि " सत्यमेव जयते, सत्येंन पंथ: विततो देवयान""। सत्य ही ईश्वर की ओर ले जाता है। मनुष्य की पहचान उनके मुंह से निकले हुए शब्दों से ही तो होती है। सत्यमेव जयते हमारे राष्ट्रीय प्रतीक के ठीक नीचे लिखी हुई लाइन है। बोलना ही तो हमारी सबसे पहली पहचान बनती है।

युवाओं के व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण पहलू उनके बोल का लहजा भी है। कोई व्यक्ति बोलता क्या है और कैसे बोलता है, उसी से उनकी परिभाषा तय होती है। जीवन का मोल बहुमूल्य बनाने में उनके शब्दों का  ही तो वजन होता है। एक व्यक्ति के बोल ही तो प्रशंसा दिलाते है तथा उसके शब्द ही उसकी भर्त्सना कराते है। किसी भी व्यक्ति की ताकत उसकी भाषा से तय होती है। किसी भी मनुष्य की परिभाषा या डेफिनेशन जाननी है तो जो वह बोलता है उस पर ध्यान देना चाहिए। भाषा ही तो व्यक्ति की परिभाषा होती है। हमारे शास्त्रों में सत्य को ईश्वर बताया गया है। अगर धन से महापुरुषों की पहचान होती तो फिर महर्षि स्वामी दयानंद, स्वामी विवेकानंद जी, कबीर, रविदास जी, मीरा, सूरदास को कोई भी याद नहीं करते परंतु हमारी संस्कृति इन्हीं महापुरुषों पर टिकी हुई है। भगवान श्रीकृष्ण जी ने भी धर्म अधर्म के युद्ध में पांडवों का साथ इस लिए दिया था कि वो धर्म के पक्ष में खड़े थे। यहां चर्चा मानवता के उत्थान की हो रही है क्योंकि जीवन उत्थान से चलता है पतन से नहीं। हमारे विचार तथा उनका मुंह से बाहर आने पर जो प्रदर्शन करते है उन्ही से ही तो पतन वा उत्थान होता है। मनुष्य के जीवन का आधार उनके द्वारा बोले गए एक एक शब्द ही तो होते है। हमारी भारतीय संस्कृति में धार्मिक स्थलों को महत्व भी तो यही रहा है कि हम धर्म को अपनाए तथा उससे अपने जीवन को उच्चस्तरीय बनाने का प्रयास करें,

अन्यथा पशु में और मनुष्य में कोई बहुत बड़ा अंतर नहीं है। बहुत पहले हम सुनते थे, देखते थे कि किसी भी व्यक्ति के सत्य या झूठ को परखने के लिए धार्मिक स्थल पर खड़ा किया जाता था कि अब अपनी बात कहो। इसका मतलब सिर्फ इतना ही होता था कि हमारी भारतीय संस्कृति में एक स्थल था जहां कोई भी झूठ नहीं बोलते थे। वर्तमान समय में तो सत्य बोलना ऐसे हो गया है जैसे यह अपराध है, सत्य बोलना बहुत ही निर्भीकता का कार्य बन गया क्योंकि अधिकतर लोग झूठ के सहारे जीवन को पार लगाना चाहते है। युवा दोस्तों, आपकी परिभाषा अपके मुंह से निकलने वाले सत्य से ही होगी। झूठ कभी की किसी को महान नहीं बना सकता है, धन कभी किसी को महान नहीं बना सकता है। अरे हम जो करते है या बोलते है उसी पर अडिग भी तो रहने का साहस करो, सत्य को सत्य तथा गलत को गलत कहने की हिम्मत भी तो रखो। हम झूठ बोलकर किसी को बहका तो सकते है लेकिन सत्य कभी छुप नहीं सकता है और वो सत्य सामने आने पर फिर आपके व्यक्तित्व को बहुत बड़ा डेंट लगता है। हमारे सनातन में एक श्लोक आता है कि " सत्यम बुरयात प्रियम बुरयात, न बुरयात सत्यम अप्रियम। प्रियम च नानरतम बुरयात, एश धर्म सनातनम।। अर्थात सत्य बोलना चाहिए, प्रिय बोलना चाहिए। असत्य प्रिय भी नहीं बोलना चाहिए, यही तो सनातन धर्म है।

हमने बड़े बड़े धार्मिक कर्मकांडी देखें है लेकिन उनके जीवन में सत्य का नाम मात्र भी अंश नहीं होता है। हम जीवन में बहुत सी छोटी बड़ी घटनाओं से सीखते है, कुछ तो हमारे जीवन में आमूलचूल परिवर्तन भी कर जाती है और कुछ महानुभावों के लिए झूठ बोलना एक प्रकार की जीवनशैली ही बन जाती है, जिसका कोई मोल नहीं होता। हम अक्सर धार्मिक बनने का दिखावा तो कर लेते है परंतु हम धर्म के लिए जरूरी लक्षणों का पालन नहीं करते है। ऐसे में हम खुद को ही धोखा देते है। मेरा ऐसा मानना है कि जिंदगी में जो भी करो, परंतु उसे न्यायोचित ठहराने की हिम्मत भी रखो। झूठ की हांडी अधिक समय तक नहीं चल सकती है। मनुष्य का चरित्र भी बड़ा ही विस्मय से भरा होता है। कई बार तो हम आश्चर्य चकित हो जाते है कि कोई अपनी भाषा के साथ इतना भी कॉम्प्रोमाइज कर सकते है। कुछ महानुभाव झूठ वा अविश्वसनीयता की पराकाष्ठा से गुजर जाते है, फिर भी उनको आत्मग्लानि नहीं होती है। भगवान श्रीकृष्ण जी महाराज गीता में कहते है कि जब कोई व्यक्ति किसी के साथ गलत करता है तो उनके मन में गलत के प्रति ग्लानि जिस दिन उत्पन्न हो जाएगी उसी दिन मैं उनके हृदय में उतर जाऊंगा। इसके विपरित कुछ महानुभावों को तो ये भी ज्ञान नहीं होता है कि उन्होंने कितने झूठ बोले है, कितने लोगों को ठगा है, कितने लोगों के साथ अन्याय किया है, जहां झूठ की जरूरत नहीं है वहां भी असत्य का उपयोग करते है, उनके तो कहने ही क्या हैं।

वर्तमान समय में नशे के गर्त की ओर दौड़ रही युवा पीढ़ी को तो यही संदेश है कि वो अपने व्यक्तित्व को सशक्त करने के लिए अपने भीतर झांके और सुधार करें। हमे यहां अपनी युवा पीढ़ी को मजबूत करने के लिए कुछ  महत्वपूर्ण बातों पर गौर करने की जरूरत है, जैसे;
1. बोलने से पहले विचार जरूर कर लें ताकि विचारों में शुद्धि आ सकें।
2. भाषाई ज्ञान जरूर होना चाहिए, शब्दों के उपयोग पर ध्यान दें।
3. कभी भी आवेश में ना बोलें,सोच समझकर ही अपना मुंह खोले, ताकि सत्य का पालन किया जा सकें, असत्य से सर्वदा बचें।


4. अपना कोई भी निर्णय लेने में उचित समय लें, उसी के अनुसार शब्दों का उपयोग करे, ताकि बाद में पछताना न पड़ें।
5. बोलने से पहले सुनने की कला विकसित करें, ताकि ऊर्जा का बेकार उपयोग ना हो। किसी के बीच में टीका टोकी ना करें।
6. किसी के बहकावे में ना आवे, अपना बोलना तभी सुनिश्चित करें, जब जरूरी हो।
7. वैज्ञानिक सोच विकसित करें, क्योंकि उसी से बेहतर शब्दों का संग्रह हम एकत्रित कर पाते हैं तथा हम पाखंडी बनने से बच पाते है।


8. किसी के प्रति भी गाली गलौच का उपयोग ना करें, क्योंकि सभी तो अपने है। शब्दों के बाण तीर तलवार से भी गहरे घाव करते है, जिन्हें भुलाना बहुत मुश्किल हो जाता है।
9. कभी भी स्वाभिमान पर समझौता ना करें, क्योंकि यही जीवन को सशक्त बनाता है।
10. अपने शब्दों में विनम्रता तथा शालीनता का भाव रखें, बोलते वक्त अपने क्रोध, आवेश तथा भावनाओं पर काबू रखने का अभ्यास होना चाहिए।
11. हमारे शब्द मिमियाने वाले नहीं होने चाहिए। विनम्रता तथा संवेदना वा सच्चाई तो हो, लेकिन कमजोरी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि बकरी सदैव शेर का खाजा बनती है।
12. किसी के भड़काने का शिकार ना बने, हर बात को सुनकर समझकर ही अपने शब्द मुंह से बाहर निकालें।
13. नशे में कभी भी किसी से बात ना करें, क्योंकि सभी बुराइयों वा बीमारियों की जननी तो नशा ही है
भाषा किसी भी व्यक्ति की यू एस पी होती है, हमारी शोकेशिंग है, हमारे व्यक्तित्व की प्रेजेंटेशन है। कोई एक शब्द भी बोलने से पहले उसके द्वारा होने वाले प्रभाव व असर का आंकलन जरूर कर लें ताकि हमारा बोलना बेकार ना जाए। खुद के शब्दों को तरासे तथा अपनी भाषा को प्रभावशाली बनाएं।
जय हिंद, वंदे मातरम