केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान में छठे सम्मेलन का आयोजन; कपास उत्पादकता मिशन 2026-31 के प्रभावी क्रियान्वयन पर हुई चर्चा
MAHENDRA INDIA NEWS, NEW DELHI
केंद्रीय कपास अनुसंधान संस्थान के क्षेत्रीय केंद्र सिरसा में उत्तर भारत में जलवायु-अनुकूल कपास उत्पादन: उत्पादकता बढ़ाने और कीटों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करने पर समन्वय बैठक का आयोजन किया गया। बैठक की अध्यक्षता भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद नई दिल्ली के उप-महानिदेशक (फसल विज्ञान) डॉ. डीके यादव ने की। वहीं परिषद के उप-महानिदेशक (कृषि प्रसार) डॉ. राजबीर सिंह, चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार के कुलगुरु डॉ. बीआर कम्बोज, आईसीएआर क्षेत्रीय केंद्र, सीआईसीआर के निदेशक डॉ. वीएन वाघमारे उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शुरुआत में सिरसा केंद्र के अध्यक्ष व प्रधान वैज्ञानिक डॉ. एस.के. वर्मा ने उत्तरी भारत में कपास की वर्तमान फसल स्थिति और उत्पादन के दौरान सामने आ रही प्रमुख चुनौतियों पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम में तीनों राज्यों के कृषि विभागों के अधिकारी तथा निजी क्षेत्र के प्रतिनिधि भी बैठक में उपस्थित रहे।
डॉ. डी.के. यादव ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि कपास की अधिक पैदावार प्राप्त करने के लिए नई तकनीकों का विकास करना और उन्हें किसानों तक पहुंचाना जरूरी है। उन्होंने कपास उत्पादकता मिशन 2026-31 के तहत अधिक उत्पादन देने वाली किस्मों, कीटों एवं बीमारियों के प्रति प्रतिरोधी किस्मों, सूक्ष्म सिंचाई, सघन खेती, मशीनीकरण और आधुनिक तकनीकों को अपनाने पर जोर दिया। उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से फसल की निगरानी, वैल्यू चेन के विकास तथा किसानों के खेतों पर विभिन्न तकनीकों के प्रदर्शन को भी महत्वपूर्ण बताया। साथ ही, नकली खाद और बीज की रोकथाम के लिए किए जा रहे प्रयासों की जानकारी साझा की।
एच.ए.यू. हिसार के कुलगुरु डॉ. बी.आर. कम्बोज ने वैज्ञानिकों और अधिकारियों से कपास की उत्पादकता बढ़ाने तथा भविष्य में संभावित कीटों एवं रोगों के नियंत्रण के लिए नई तकनीकों और अनुसंधान को विकसित करने पर जोर दिया। उन्होंने निर्देश दिए कि वैज्ञानिकों द्वारा विकसित तकनीकों को कृषि प्रसार अधिकारियों के माध्यम से किसानों के खेतों तक पहुंचाया जाए, ताकि किसान समय पर जानकारी प्राप्त कर सकें और उत्पादन बढ़ा सकें।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के उप-महानिदशक डॉ. राजबीर सिंह ने भारत सरकार द्वारा किसानों के हित में संचालित विभिन्न कार्यक्रमों की जानकारी देते हुए कहा कि वैज्ञानिकों द्वारा विकसित तकनीकों का लाभ किसानों तक पहुंचाना आवश्यक है। इससे किसानों को समय पर मार्गदर्शन मिलेगा और कपास की उत्पादकता बढ़ाने में मदद मिलेगी।
डॉ. वी.एन. वाघमारे ने उत्तरी भारत में कपास उत्पादन के दौरान आने वाली समस्याओं, कपास के क्षेत्रफल और प्रति एकड़ उत्पादकता बढ़ाने के उपायों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने संस्थान द्वारा विकसित नई तकनीकों, भारत सरकार के कपास उत्पादकता मिशन 2026-31 तथा कपास की खेती में मशीनीकरण की भूमिका के बारे में जानकारी दी।
सी.आई.सी.आर. सिरसा के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. ऋषि कुमार ने उत्तरी भारत में कपास की फसल पर कीटों एवं रोगों के प्रकोप, उनके नियंत्रण, वर्तमान चुनौतियों और जलवायु-अनुकूल उत्पादन तकनीकों के बारे में विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने कपास की उत्पादकता बढ़ाने, कीट एवं रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने और भविष्य में किए जाने वाले अनुसंधान कार्यों के बारे में भी बताया।
कार्यक्रम में प्रधान वैज्ञानिक डॉ. सतीश कुमार सैन, डॉ. अमरप्रीत सिंह डॉ. सुभाष चंद्र और डा. ओ.डब्ल्यू सिंह, कपास अनुभाग हिसार से प्रभारी डॉ. करमल सिंह, पी.ए.यू. लुधियाना से निदेशक अनुसंधान ए.एस. दत्त, एस.के.आर.ए.यू. बीकानेर निदेशक-अनुसंधान डॉ. एन.के. शर्मा, ने कपास उत्पादन बढ़ाने के लिए चलाए जा रहे विभिन्न प्रचार-प्रसार कार्यक्रमों और अनुसंधान गतिविधियों के बारे में जानकारी साझा की।
गुलाबी सुंडी पर नियंत्रण के लिए वैज्ञानिक सलाह और फसल अवशेष प्रबंधन जरूरी: डॉ. डी.के. यादव
बैठक से पूर्व पत्रकारों से बातचीत करते हुए उप-महानिदेशक (फसल विज्ञान) डॉ. डी.के. यादव ने बताया कि इस बैठक का मुख्य उद्देश्य ‘क्लाइमेट स्मार्ट कॉटन प्रोडक्शन’ को बढ़ावा देना और उत्तर भारत के राज्यों हरियाणा, पंजाब व राजस्थान—के लिए कपास उत्पादन की ठोस रणनीति तैयार करना है। उन्होंने कहा कि कपास के क्षेत्रफल में बढौतरी व उत्पादन बढाने के लिए बेहतर योजना बनाने और इस वर्ष अपनाई गई रणनीतियों के प्रभाव का विश्लेषण करने के लिए यह विस्तृत मंथन किया जा रहा है।
डॉ. यादव ने जानकारी दी कि केंद्र सरकार द्वारा कपास की उत्पादकता बढ़ाने के उद्देश्य से साढे पाच हजार करोड़ रुपये की लागत से ‘नेशनल मिशन ऑन कॉटन प्रोडक्टिविटी’ शुरू किया गया है, जिसमें उत्तर भारत के तीनों राज्य अहम भूमिका निभा रहे हैं। इस मिशन के तहत 14 राज्यों के 140 जिलों को शामिल किया गया है, जहां 23.71 लाख प्रदर्शन (डेमोंस्ट्रेशन) और 28,000 किसान प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाना प्रस्तावित है। उन्होंने बताया कि किसानों तक नई तकनीक और बेहतर कृषि पद्धतियाँ पहुँचाने के लिए ब्लॉक व जिला स्तर पर विशेष जागरूकता और प्रशिक्षण सत्र आयोजित किए जाएंगे।
गुलाबी सुंडी (पिंक बॉलवर्म) और कीट प्रबंधन पर पूछे गए सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक सलाह और फसल अवशेष (स्ट्रॉ) के उचित प्रबंधन से इसे काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वर्ष 2002 में बी.टी. कॉटन आने के बाद देश में लिंट की उत्पादकता लगभग 290-300 किग्रा प्रति हेक्टेयर से बढक़र वर्ष 2016-17 में लगभग 540-550 किग्रा प्रति हेक्टेयर तक पहुंची।