पंचकूला स्कूल घटना पर अध्यापक संघ ने जताई चिंता, निलंबित जेबीटी अध्यापिकाओं और प्रिंसिपल की बहाली की मांग
MAHENDRA INDIA NEWS, NEW DELHI
हरियाणा विद्यालय अध्यापक संघ ने पंचकूला के राजकीय विद्यालय में एक बच्ची पर हुए जानलेवा हमले की घटना पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के लिए केवल शिक्षकों को जिम्मेदार ठहराना और जांच पूरी होने से पहले ही अध्यापिकाओं एवं प्रिंसिपल को निलंबित करना न्यायसंगत नहीं है। संघ ने निलंबित दोनों जेबीटी अध्यापिकाओं एवं प्रिंसिपल की तुरंत बहाली की मांग की है।
संघ के राज्य प्रधान प्रभु सिंह, महासचिव रामपाल, कोषाध्यक्ष संजीव सिंगला, उप महासचिव कृष्ण नैन, प्रेस सचिव निशा तथा वरिष्ठ उप प्रधान गुरमीत सिंह ने संयुक्त बयान में कहा कि पंचकूला की घटना को केवल एक स्कूल, कुछ शिक्षकों अथवा किसी एक व्यक्ति की लापरवाही के रूप में देखना वास्तविक परिस्थितियों से आंखें मूंदने के समान है। यह घटना सरकारी स्कूलों में लगातार बढ़ते शिक्षक अभाव, शिक्षकों पर गैर-शैक्षणिक कार्यों के बोझ, बच्चों की निगरानी एवं सुरक्षा के लिए पर्याप्त व्यवस्था न होने और समाज में बढ़ती हिंसक प्रवृत्तियों के व्यापक संदर्भ में समझने की जरूरत है।
लगभग 800 बच्चों के लिए 28 की जगह मात्र 20 शिक्षक, उस दिन केवल 12 उपस्थित
संघ ने संबंधित विद्यालय की परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए बताया कि जिस राजकीय विद्यालय (GMSPS सेक्टर-20) में यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना हुई, वह डबल शिफ्ट विद्यालय है। इसमें प्राथमिक विद्यालय दोपहर बाद संचालित होता है। विद्यालय में लगभग 800 बच्चे अध्ययनरत हैं, जबकि विद्यार्थी संख्या के अनुपात में लगभग 28 शिक्षक होने चाहिए। इसके बावजूद विद्यालय में केवल 20 शिक्षक कार्यरत हैं।
घटना वाले दिन इनमें से केवल 12 शिक्षक ही उपस्थित थे। पांच शिक्षकों की ट्रेनिंग लगाई गई थी, एक अध्यापिका चाइल्ड केयर लीव (CCL) पर तथा दो अध्यापिकाएं कैजुअल लीव (CL) पर थीं। इस प्रकार उस दिन स्वीकृत आवश्यकता के मुकाबले लगभग 43 प्रतिशत शिक्षक ही उपस्थित थे।
आधे से अधिक शिक्षकों के पास अपनी कक्षा के अतिरिक्त एक और कक्षा की जिम्मेदारी थी। बालवाटिका के 125 बच्चों की जिम्मेदारी मात्र एक अध्यापिका पर थी, जबकि शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात के अनुसार वहां पांच शिक्षक होने चाहिए थे। अन्य कक्षाओं की स्थिति भी लगभग ऐसी ही थी।
संघ ने सवाल उठाया कि जब सरकार स्वयं पर्याप्त शिक्षकों की नियुक्ति नहीं करती, उपलब्ध शिक्षकों को विभिन्न गैर-शैक्षणिक कार्यों और ट्रेनिंग में लगाती है तथा विद्यालयों में बच्चों की सुरक्षा एवं निगरानी के लिए आवश्यक व्यवस्था नहीं करती, तो ऐसी परिस्थितियों में होने वाली घटनाओं की जिम्मेदारी केवल शिक्षकों पर कैसे डाली जा सकती है?
शिक्षा के अधिकार कानून के अनुसार पर्याप्त शिक्षकों की व्यवस्था सरकार की जिम्मेदारी
संघ ने कहा कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के अंतर्गत कक्षा 1 से 8 तक निर्धारित शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात तथा शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है। यदि किसी विद्यालय में बच्चों को निर्धारित मानकों के अनुसार शिक्षक उपलब्ध नहीं होते, तो इसकी जवाबदेही मुख्यमंत्री, शिक्षामंत्री, अतिरिक्त मुख्य सचिव, शिक्षा विभाग के निदेशकों तथा संबंधित अधिकारियों की भी बनती है।
संघ ने कहा कि सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विद्यालयों में स्वीकृत एवं आवश्यक पदों के अनुरूप शिक्षक उपलब्ध हों और किसी भी कक्षा में पढ़ाई बाधित न हो। शिक्षक उपलब्ध करवाना सरकार का दायित्व है, न कि शिक्षकों पर अतिरिक्त बोझ डालकर व्यवस्था चलाने का विकल्प।
पढ़ाई के वास्तविक समय में लगातार हो रही कटौती
संघ नेताओं ने कहा कि सरकार शिक्षकों से अध्यापन के अतिरिक्त दर्जनों गैर-शैक्षणिक कार्य ले रही है। शिक्षकों का पढ़ाई के लिए वास्तविक समय लगातार घटता जा रहा है। विशेषकर जेबीटी शिक्षकों के पास पूरे दिन कोई खाली पीरियड नहीं होता और न ही कोई रिलीवर उपलब्ध होता है।
उन्हें निर्धारित कक्षा समय में बच्चों की जिम्मेदारी निभाने के साथ-साथ ऑनलाइन हाजिरी, ऑनलाइन डायरी, दाखिले, यू-डाइस, हेल्थ कार्ड, निपुण कार्यक्रम तथा अन्य ऑनलाइन कार्य भी करने पड़ते हैं। इसके अतिरिक्त जनगणना, SIR/BLO ड्यूटी, रामलीला, विभिन्न ट्रेनिंग एवं अन्य सरकारी कार्यों में शिक्षकों को लगाया जाता है।
इसका परिणाम यह है कि शिक्षकों को बच्चों की पढ़ाई, व्यक्तिगत जरूरतों और अन्य सरकारी कार्यों के बीच लगातार संतुलन बनाना पड़ता है। पानी पीने, चाय लेने, खाना खाने तथा शौचालय जाने जैसी सामान्य मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी कई बार कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं होती।
संघ ने कहा कि यह समस्या केवल पंचकूला के संबंधित विद्यालय तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रदेश के अधिकांश सरकारी स्कूलों में पूरे शैक्षणिक सत्र के दौरान ऐसी परिस्थितियां बनी रहती हैं। साल में शायद ही कोई ऐसा दिन आता हो, जब सभी शिक्षक विद्यालय में उपस्थित हों और उनसे पढ़ाई के अतिरिक्त कोई दूसरा काम न लिया जा रहा हो।
224 व्यक्तियों का काम 96 से लेने जैसी स्थिति
संघ ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी कारखाने में 224 व्यक्तियों का काम केवल 96 व्यक्तियों से लिया जाएगा, तो उसकी उत्पादन क्षमता, कर्मचारियों की मानसिक एवं शारीरिक स्थिति और कार्य की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।
विद्यालयों की परिस्थितियां इससे भी अधिक संवेदनशील हैं। कारखाने में पूर्व निर्धारित यंत्रवत कार्य करना होता है, जबकि विद्यालयों में हर पल बदलते हालात, बच्चों के बाल मनोविज्ञान और उनकी अलग-अलग आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए शिक्षकों को लगातार निर्णय एवं शिक्षण के तरीके बदलने पड़ते हैं।
इसी कारण शिक्षाविदों ने बालवाटिका में 1:10 तथा प्राथमिक कक्षाओं में 1:25 शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात की सिफारिश की है। ऐसे में सरकारी स्कूलों में शिक्षकों से किस प्रकार काम लिया जा रहा है और बच्चों की सुरक्षा एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर इसका क्या प्रभाव पड़ रहा है, इसका सहज अंदाजा लगाया जा सकता है।
घटना के घटनाक्रम में शिक्षकों की तत्परता और संवेदनशीलता भी सामने आई
संघ ने घटना के उपलब्ध विवरण का उल्लेख करते हुए कहा कि पीड़ित बच्ची बालवाटिका की छात्रा है तथा हमला करने वाला छात्र तीसरी कक्षा में पढ़ता है। छोटे बच्चों की छुट्टी अन्य कक्षाओं से पहले होती है। उस दिन भी बालवाटिका की छुट्टी लगभग 3:30 बजे हो गई थी।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, छुट्टी के तुरंत बाद छात्र बच्ची को ऊपर के कमरों में ले गया और उस पर जानलेवा हमला किया। वायरल वीडियो में घटना की बेरहमी सामने आई है। संबंधित भवन में प्राथमिक कक्षाएं नहीं लगतीं तथा वहां उच्च कक्षाओं का संचालन होता है, इसलिए उस समय किसी शिक्षक का ध्यान उस तरफ नहीं गया।
जब बच्चों को घर ले जाने वाला ऑटो आया और बच्ची की तलाश शुरू हुई, तो हमलावर छात्र ने ही बच्ची के पिता को बताया कि उनकी लड़की ऊपर घायल अवस्था में पड़ी है।
संघ ने कहा कि जैसे ही बच्ची के पिता और शिक्षकों को घटना का पता चला, सभी तुरंत घटनास्थल पर पहुंचे और घायल बच्ची को उठाकर पंचकूला के एक प्रतिष्ठित निजी अस्पताल में दाखिल करवाया।
बच्ची को अस्पताल ले जाने वाली महिला अध्यापिका ने अपनी जेब से 25 हजार रुपये जमा करवाकर तत्काल उपचार शुरू करवाया। बाद में खर्च अधिक होने के कारण बच्ची को पंचकूला के सरकारी अस्पताल तथा PGI में रेफर किया गया। समय पर प्राथमिक उपचार मिलने से बच्ची की जान बचाने में महत्वपूर्ण मदद मिली। फिलहाल बच्ची खतरे से बाहर है और उसके स्वास्थ्य में सुधार है।
संघ ने कहा कि जिस अध्यापिका ने मानवीय संवेदनशीलता, तत्परता और अपने आर्थिक संसाधनों का उपयोग करके बच्ची के उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उसी अध्यापिका को निलंबित कर दिया गया। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और निराशाजनक है।
संघ ने यह भी बताया कि बच्ची को पहले से किडनी संबंधी समस्या रही है तथा उसके अभिभावकों ने स्कूल को लिखित अनुरोध दिया था कि बच्ची को बार-बार बाथरूम जाने की आवश्यकता होती है, इसलिए उसे यूरिनल जाने से न रोका जाए।
बच्चों में हिंसक प्रवृत्तियों के पीछे व्यापक राजनीतिक - सामाजिक कारण
संघ ने कहा कि अभिभावकों की रिपोर्ट के अनुसार, हमला करने वाले छात्र की हिंसक प्रवृत्ति रही है। वह मोबाइल का अधिक उपयोग करता है, हिंसक ऑनलाइन गेम खेलता है तथा अपने से बड़ी उम्र के बच्चों के साथ रहता है और उनकी लड़ाइयों में भी शामिल होता रहा है। उसके द्वारा पहले भी मारपीट की घटनाएं किए जाने की जानकारी सामने आई है।
संघ ने कहा कि वर्तमान समय में बच्चों के हाथों में पूरे दिन मोबाइल रहना, हिंसक ऑनलाइन गेम, मारधाड़ एवं गाली-गलौज वाली फिल्मों और सीरीज का प्रचार, अश्लील वीडियो तथा सोशल मीडिया पर हिंसक सामग्री की उपलब्धता, अभिभावकों द्वारा बच्चों की गतिविधियों पर पर्याप्त निगरानी न रखना, बच्चों की संगति तथा आसपास का सामाजिक वातावरण मिलकर ऐसी घटनाओं की पृष्ठभूमि तैयार करते हैं।
संघ ने कहा कि किसी एक व्यक्ति को दोषी ठहराकर पूरे मामले से पल्ला झाड़ लेना समाधान नहीं है। ऐसी घटनाओं के पीछे व्यक्ति, परिवार, समाज, सरकार और व्यवस्था की विभिन्न भूमिकाएं होती हैं। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह बच्चों की सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक वातावरण तथा विद्यालयों में आवश्यक संसाधनों की व्यवस्था सुनिश्चित करे।
संघ ने यह भी कहा कि पूर्व अनुभव बताते हैं कि कई बार जांच कमेटियां वास्तविक व्यवस्थागत सुधार करने की बजाय शासन-प्रशासन को जवाबदेही से बचाने का माध्यम बन जाती हैं। इसलिए इस घटना की जांच का उद्देश्य केवल कुछ कर्मचारियों को दंडित करना नहीं, बल्कि वास्तविक कारणों की पहचान करके स्थायी सुधार सुनिश्चित करना होना चाहिए।
हर विद्यालय में पर्याप्त शिक्षक, अतिरिक्त शिक्षक पूल और गैर-शैक्षणिक कार्यों से मुक्ति की मांग
हरियाणा विद्यालय अध्यापक संघ ने सरकार से निम्नलिखित मांगें एवं सुझाव प्रस्तुत किए हैं—
1. सभी सरकारी विद्यालयों में रिक्त पड़े हजारों शिक्षक पदों पर स्थायी भर्ती की जाए। विशेष रूप से वर्ष 2012 के बाद जेबीटी रोह (ROH) कैडर में कोई नियमित भर्ती नहीं निकाली गई है। लंबे समय से शिक्षक भर्ती एवं स्थानांतरण प्रक्रिया बाधित रहने का खामियाजा विद्यार्थियों और शिक्षकों को भुगतना पड़ रहा है।
प्रत्येक विद्यालय में आवश्यक संख्या में शिक्षक उपलब्ध करवाए जाएं। यह सुनिश्चित किया जाए कि सभी कक्षाओं में निर्धारित समय पर शिक्षक उपस्थित हों और एक भी कक्षा एक भी घंटा खाली न रहे।
2. शिक्षकों से गैर-शैक्षणिक कार्य लेना बंद किया जाए। अध्यापकों को केवल शिक्षण एवं विद्यालय से संबंधित शैक्षणिक कार्यों तक सीमित रखा जाए, ताकि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके।
3. बालवाटिका में 1:10 तथा प्राथमिक कक्षाओं में 1:25 शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात सुनिश्चित किया जाए। बच्चों की संख्या एवं शैक्षणिक आवश्यकताओं के अनुसार पर्याप्त शिक्षक नियुक्त किए जाएं।
4. स्वीकृत पदों से 10 प्रतिशत अधिक शिक्षकों की भर्ती करके अतिरिक्त शिक्षक पूल बनाया जाए। इस पूल से उन विद्यालयों में शिक्षकों की व्यवस्था की जाए, जहां शिक्षक CCL, अन्य छुट्टियों, ट्रेनिंग, जनगणना, SIR/BLO ड्यूटी अथवा अन्य सरकारी कार्यों पर लगाए जाते हैं। इससे किसी भी कक्षा की पढ़ाई बाधित नहीं होगी।
5. सभी विद्यालयों में बच्चों की सुरक्षा एवं निगरानी के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए। विद्यालयों के संवेदनशील स्थानों, छुट्टी के समय तथा बच्चों की आवाजाही के दौरान पर्याप्त निगरानी सुनिश्चित की जाए।
6. बच्चों में बढ़ती हिंसक प्रवृत्तियों को रोकने के लिए सरकार प्रभावी कदम उठाए। हिंसक ऑनलाइन गेम, मारधाड़ एवं हिंसा को सामान्य बनाने वाली सामग्री, अश्लील वीडियो तथा बच्चों के लिए हानिकारक सोशल मीडिया कंटेंट पर प्रभावी नियंत्रण किया जाए। हिंसा और बलात्कार जैसी घटनाओं का सामान्यीकरण रोकने के लिए व्यापक सामाजिक एवं शैक्षणिक अभियान चलाया जाए।
7. सभी विद्यालयों में सप्ताह में कम से कम एक दिन विशेषज्ञों द्वारा बच्चों की काउंसलिंग करवाई जाए। बाल मनोविज्ञान एवं बच्चों के व्यवहार को ध्यान में रखते हुए मनोवैज्ञानिकों और संबंधित विशेषज्ञों की सेवाएं उपलब्ध करवाई जाएं।
8. अभिभावकों एवं स्कूल मैनेजमेंट कमेटियों (SMC) की नियमित ट्रेनिंग आयोजित की जाए। इसमें बाल मनोविज्ञान, बच्चों की गतिविधियों पर निगरानी, मोबाइल एवं ऑनलाइन गेम के प्रभाव, हिंसक व्यवहार की पहचान तथा बच्चों के सुरक्षित एवं स्वस्थ विकास जैसे विषय शामिल किए जाएं।
विद्यालयों में शिक्षक, अभिभावक और समाज के बीच बेहतर समन्वय स्थापित किया जाए। बच्चों की सुरक्षा, व्यवहार एवं मानसिक विकास को सामूहिक जिम्मेदारी के रूप में लिया जाए।
जांच पूरी होने से पहले अध्यापिकाओं एवं प्रिंसिपल को निलंबित करना अन्यायपूर्ण
संघ नेताओं ने कहा कि संबंधित कमेटी ने जांच बाद में शुरू की, जबकि दो जेबीटी अध्यापिकाओं तथा प्रिंसिपल को निलंबित करने की कार्रवाई पहले ही कर दी गई। बिना जांच पूरी किए, बिना आरोप सिद्ध हुए किसी को दोषी ठहराना और उससे भी आगे बढ़कर सजा देना न्यायसंगत नहीं है।
संघ ने बताया कि निलंबित जेबीटी अध्यापिकाओं में से एक तलाकशुदा महिला है, जो अपने दो बच्चों का किसी तरह पालन-पोषण कर रही है। प्रिंसिपल महोदया भी सेवानिवृत्ति के नजदीक हैं। ऐसी परिस्थितियों में बिना जांच पूरी किए की गई कार्रवाई उनके सामाजिक, आर्थिक एवं मानसिक जीवन पर गंभीर प्रभाव डालती है।
संघ ने कहा कि विद्यालयों में शिक्षक अभाव, गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ, बच्चों की निगरानी के लिए पर्याप्त व्यवस्था न होना तथा समाज में बढ़ती हिंसक प्रवृत्तियों जैसी परिस्थितियों को नजरअंदाज करके केवल शिक्षकों को जिम्मेदार ठहराना वास्तविक समस्या से ध्यान हटाने का प्रयास है।
संघ ने स्पष्ट किया कि यदि किसी शिक्षक की वास्तविक लापरवाही जांच में प्रमाणित होती है, तो नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है। लेकिन बिना निष्पक्ष जांच, बिना आरोप सिद्ध किए और बिना संबंधित कर्मचारियों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिए निलंबन जैसी कार्रवाई करना बिल्कुल अनुचित है।