सीडीएलयू सिरसा में हालिया अस्थायी भर्तियों का विवाद पहुंचा हाईकोर्ट, भर्तियों में आरक्षण नीति का पालन न करने पर हाईकोर्ट ने अपनाया सख्त रूप
mahendra india news, new delhi
सिरसा। चौधरी देवी लाल विश्वविद्यालय (CDLU SIRSA), सिरसा द्वारा एडजंक्ट फैकल्टी एवं प्रोफेसर आॅफ प्रैक्टिस के संविदा पदों पर भर्ती में आरक्षण नीति का पालन न किए जाने का मामला अब पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ तक पहुंच गया है। न्यायमूर्ति हरप्रीत सिंह बराड़ की पीठ ने शुक्रवार,10 जुलाई 2026 को महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश पारित किया है। उच्च न्यायालय ने सीडब्ल्यूपी संख्या 20654- 2026, कमल कुमार एवं अन्य बनाम हरियाणा राज्य एवं अन्य मामले में सुनवाई करते हुए विश्वविद्यालय प्रशासन को निर्देश दिया है कि संविदा नियुक्तियों में हरियाणा सरकार की आरक्षण नीति तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के निर्देशों का पालन सुनिश्चित किया जाए।
याचिकाकर्ताओं की ओर से एडवोकेट परमेन्द्र सिंह ने प्रभावशाली ढंग से न्यायालय के समक्ष यह तर्क रखा कि विश्वविद्यालय द्वारा 26.06.2026 एवं 30.06.2026 को जारी विज्ञापनों में आरक्षित वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान नहीं किया गया तथा रिक्तियों की संख्या भी स्पष्ट नहीं की गई, जो हरियाणा सरकार की आरक्षण नीति एवं यूजीसी के दिशा-निदेर्शों के विपरीत है। माननीय न्यायालय ने अपने अंतरिम आदेश में 10 जुलाई 2026 में स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं के मामलों पर हरियाणा सरकार की अधिसूचनाओं 27.10.2017, 06.02.2018 एवं 10.05.2019 तथा यूजीसी के 16.02.2026 के निर्देशों के अनुसार आरक्षित नीति का पालन किया जाए। उच्च न्यायालय ने विश्वविद्यालय के कुलपति एवं कुलसचिव को याचिका में उठाए गए तथ्यों के संबंध में अपना लिखित जवाब न्यायालय के समक्ष दाखिल करने के निर्देश प्रदान किए हैं।
साथ ही मामले में नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई 25, अगस्त 2026 निर्धारित की गई है। उल्लेखनीय है कि हरियाणा सरकार तथा यूजीसी दोनों ने यह स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि 45 दिनों या उससे अधिक अवधि की अस्थायी/संविदा नियुक्तियों में भी आरक्षण नीति का पालन अनिवार्य होगा। विश्वविद्यालयों सहित सभी सरकारी संस्थानों को इन निदेर्शों का अक्षरश: पालन करना आवश्यक है। इस न्यायिक आदेश के बाद अब चौधरी देवी लाल विश्वविद्यालय, सिरसा के कुलपति एवं विश्वविद्यालय प्रशासन पर यह कानूनी जिम्मेदारी है कि एडजंक्ट फैकल्टी एवं प्रोफेसर आॅफ प्रैक्टिस की संविदा भर्ती में आरक्षण नीति का पूर्ण पालन करें।
गौरतलब है कि अब विश्वविद्यालय प्रशासन को विश्वविद्यालय के सभी विभागों में आरक्षण नीति को ध्यान में रखते हुए ही भर्तियां करनी होंगी। यदि विश्वविद्यालय प्रशासन उच्च न्यायालय के आदेशों एवं लागू सरकारी निर्देशों की अवहेलना करते हुए आरक्षण नीति लागू नहीं करता है, तो यह न्यायालय के आदेशों की अवमानना का विषय बन सकता है और ऐसी स्थिति में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 215 के अंतर्गत अवमानना कार्यवाही प्रारम्भ किए जाने का प्रश्न उत्पन्न हो सकता है। यह निर्णय अनुसूचित जाति, पिछड़ा वर्ग, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग तथा अन्य आरक्षित वर्गों के पात्र अभ्यर्थियों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे भविष्य में विश्वविद्यालयों एवं अन्य शैक्षणिक संस्थानों में होने वाली संविदा नियुक्तियों में पारदर्शिता, समान अवसर तथा आरक्षण नीति के प्रभावी क्रियान्वयन को बल मिलेगा।