सरकारी सुविधाओं को खराब कर, विकास में बाधाएं कौन डालता है: सरकार या जनता?

 

MAHENDRA INDIA NEWS, NEW DELHI
ठाकुर दलीप सिंघ
सरकार कोई एक व्यक्ति नहीं, सरकार कोई एक मशीन नहीं। सरकार तो कुछ व्यक्तियों का एक समूह है। विशेष रूप में लोकतांत्रिक सरकार; हम में से ही चुने हुए व्यक्तियों का एक समूह है। सरकार में कार्य कर रहे व्यक्ति; हमारे ही सज्जन, मित्र, रिश्तेदार होते हैं और उन्हें हम ने ही वोट डाल कर जितवाया होता है। मीडिया द्वारा कई बार, बिना कारण सरकार पर दोष लगा कर आलोचना की जाती है; परंतु जनता द्वारा की गई गलतियां देख कर भी, मीडिया द्वारा जनता की कोई आलोचना नहीं की जाती। हम जनता, बहुत-सी गलतियां जान-बूझ कर करते हैं, जिन के कारण सरकारी सुविधाएँ उजड़ जाती हैं,

खराब होती हैं एवं विकास में बाधाएं आती हैं। यदि सरकार कुछ अच्छा कर भी रही होती है, तो कई बार हम आलोचना करने वाले, उस के अच्छे कार्यों में दोष निकाल कर बाधाएं डालते हैं। मीडिया को आलोचना करते समय यह सोचने की आवश्यकता है कि क्या गलतियां केवल सरकार ही करती है, क्या जनता नहीं करती? मीडिया को चाहिए कि सरकारी अधिकारियों एवं ठेकेदारों से मिल कर, उन के साथ विकास के कार्यों में आ रही बाधाओं के बारे में चर्चा करे। उन से उन की समस्याओं, बाधाओं को समझें तथा सरकारी अधिकारियों के पक्ष को भी लोगों के समक्ष प्रस्तुत करें, ताकि जनता भी सरकारी अधिकारियों एवं ठेकेदारों का पक्ष जान सके। जो समस्याएं एवं बाधाएं विकास कार्यों में आ रही हैं, वह दूर हो कर, सही समय पर, अच्छी तरह से, लोगों की सुविधाओं के लिए विकास कार्य होते रहें।

किसी भी सरकार की आलोचना करने का अधिकार लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। विशेष रूप से मीडिया द्वारा सरकार की आलोचना करके सरकार को जगाना, मीडिया का कर्तव्य बनता है। जब सरकार कोई गलत योजना बनाती है, जिस से लोगों को कठिनाई आती है या सरकारी अधिकारियों द्वारा किए गए किसी कार्य में कमी रह जाती है; तो उस ओर ध्यान दिलाना और रचनात्मक ढंग से आलोचना करना बिल्कुल आवश्यक है। परंतु, हर समय सरकार की केवल कमियां ढूंढ़ कर आलोचना करते रहना, या सरकार द्वारा किए जा रहे अच्छे कार्यों की भी आलोचना कर बाधाएं डालना, या सरकार के अच्छे कार्यों को भी गलत रूप में प्रस्तुत करना, किसी भी प्रकार से उचित नहीं। सरकार की आलोचना करने वालों को पहले यह समझने की आवश्यकता है कि हम अपने घर के चार सदस्यों के परिवार को हर बात में खुश नहीं कर पाते, हमारा घर-गृहस्थी 100 प्रतिशत सही नहीं चल रहा, परंतु हम आशा करते हैं कि सरकार करोड़ों लोगों की भिन्न-भिन्न आवश्यकताओं, आकांक्षाओं को पूरा करे तथा समस्याओं का हर समय, पूरी तरह समाधान करे। सोचने की आवश्यकता है: करोड़ों लोगों का प्रबंध करने वाली सरकार, सब कुछ सही ढंग से चला कर, कैसे सभी लोगों को खुश कर सकती है? बहुत बार जनता अज्ञानतावश या अपने किसी कारण से, अड़चन बन कर, सरकार के रचनात्मक एवं विकास के कार्यों में बाधा डाल देती है; परंतु मीडिया जनता की गलतियों को बहुत कम उछालता है। उदाहरण स्वरूप, सरकार किसी शहर या गांव में नई सड़क बनाने, सड़क चौड़ी करने, पार्क बनाने, ड्रेनेज (पानी की निकासी) या कोई अन्य सार्वजनिक कार्य शुरू करती है।

सड़क बनने से हजारों लोगों को सुविधा मिलनी है। परंतु जब कार्य आरंभ होता है तो कुछ लोग अपनी व्यक्तिगत मांगें जैसे, घर-दुकानों के आगे जगह, रास्ते की दिशा या अन्य कारणों से; सामूहिक भलाई के उस अच्छे कार्य में बाधाएं डालने लग जाते हैं। लोग सरकारी जमीन या सड़क की जगह पर किए अपने नाजायज कब्जे हटाने के कारण सरकार का विरोध करते हैं, स्टे आॅर्डर ले लेते हैं। बाद में जब सड़क निर्माण कार्य में देरी होती है, या सड़क पर्याप्त चौड़ी नहीं होती तथा विकास का कार्य देरी से होता है, तो दोष सरकार के सिर मढ़ दिया जाता है। कई बार बाढ़, भूचाल आदि प्राकृतिक आपदाओं के कारण भी सड़कें आदि टूट जाती हैं; उस का दोष भी सरकार पर लगा दिया जाता है, जो कि उचित नहीं। सड़क बनाते समय उस पर सीमेंट, बजरी, लुक इस मात्रा में डाली जाती है कि सड़क पर निर्धारित भार वाले वाहन ही चल सकेंगे। कई बार ट्रक वाले, ट्रॉली वाले, काँटे वालों को पैसे दे कर, कम भार की पर्ची बनवा लेते हैं तथा सड़क की क्षमता से कई गुना अधिक वजन भर कर सड़क पर चलाते हैं। जब सड़क पर निर्धारित क्विंटलों से अधिक वजन वाले वाहन चलते हैं; तो उस से सड़क टूटती है। सड़क तोड़ने का दोष, अधिक भार वाले वाहन चालकों पर न लगा कर, मीडिया तथा लोगों द्वारा सरकार एवं ठेकेदारों के सिर मढ़ दिया जाता है। यदि ठेकेदार ने घटिया सामग्री का उपयोग किया है, या अधिकारी ने निगरानी में लापरवाही की है; तो नि:संदेह उसे दोषी ठहराया जाना चाहिए।

परंतु यदि सड़क टूटने में ओवरलोड (अधिक वजन वाले) वाहनों का बड़ा योगदान है, तो मीडिया द्वारा उस सच्चाई को सामने लाना भी आवश्यक है। इसी प्रकार, ट्रैक्टर से खेती करने वाले साधनों को जब किसान सड़क पर ले कर चलते हैं, तो उस से सड़क टूटती है। परंतु मीडिया द्वारा दोष किसानों को नहीं दिया जाता, इस के विपरीत ठेकेदार एवं सरकार पर दोष मढ़ दिया जाता है। किसान जिस औजार को अपनी जमीन में उपयोग करता है, वह उस के लिए आवश्यक है; परंतु जब वही औजार सार्वजनिक सड़क को नुकसान पहुंचाता है तो इस का नुकसान पूरे समाज को उठाना पड़ता है। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान न पहुंचाना भी हमारी अपनी जिम्मेदारी है।
सरकार लोगों के लिए पार्क बनाती है। लोगों को सैर करने तथा बच्चों को खेलने के लिए सुविधा मिलती है। परंतु यदि हम उसी पार्क में कचरा फेंकें, पौधे तोड़ें, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाए और साफ-सफाई पर ध्यान न दें, तो पार्क कुछ ही समय में अपनी सुंदरता खो देती है। फिर तस्वीरें दिखा कर कहा जाता है सरकार पार्कों की संभाल नहीं करती। सरकार पार्क बनाए, कर्मचारी सफाई करें और हम उसे फिर गंदा करते रहें, क्या हमारी जनता की जिम्मेदारी केवल पार्कों का आनंद लेना है? जब पार्क को गंदा करते और उजाड़ते हम हैं, फिर गंदे, उजड़े, खराब हालत वाले पार्क की जिम्मेदारी सरकार के सिर मढ़ना गलत है। इसी प्रकार सरकार स्कूल, अस्पताल, बस अड्डे, शौचालय आदि बनवा कर, लोगों को सुविधाएं प्रदान करती है। परंतु यदि जनता इन का उपयोग करते समय स्वच्छता का ध्यान न रखें, बसों-रेलगाड़ियों में सीटों के ऊपर की गद्दियां फाड़ दें, शीशे तोड़ दें या सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाएं,

तो क्या उस में गलती सरकार की है, या जनता की? सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, आग लगाने, ट्रेनों को रोकने, सड़कों को रोक कर, सभी बाजारों को बंद करवा कर, जनता द्वारा सार्वजनिक सुविधाओं को स्वयं नुकसान पहुंचाया जाता है; जिस से विकास में बाधा आती है तथा हो चुका विकास वापिस चला जाता है। परंतु अंतत: लोगों एवं मीडिया द्वारा सरकार को दोषी ठहराया जाता है, विकास में बाधा डालने वालों को आम तौर पर दोषी नहीं ठहराया जाता। ऐसे एक-दो नहीं, सैकड़ों उदाहरण हमें मिल जाएंगे, किस प्रकार हम विकास के कार्यों में बाधाएं डाल कर, फिर दोष सरकार को ही देते हैं। एक अन्य उदाहरण बारिश के पानी में निकासी की रुकावट का है। बारिश होती है, सड़कों पर पानी भर जाता है और तुरंत दोष सरकार के सिर मढ़ दिया जाता है कि सरकार ने जल निकासी प्रबंधन नहीं किया। जबकि हम नालियों में एवं गटरों के पास पॉलीथीन, घरेलू कचरा और अन्य गंदगी फेंकते हैं। गटर, पानी वाली नालियां हम स्वयं बंद करते हैं। बारिश आती है तो पानी आगे नहीं बहता, सड़क पर खड़ा हो जाता है और घरों में घुस जाता है। यदि सड़क पर और नालियों में कूड़ा हम ने स्वयं फेंका है, पानी निकलने वाली नालियां, गटर हम ने बंद किए, तो इस समस्या के लिए गलती सरकार की कैसे हो गई? यदि सरकार ने जल निकासी की व्यवस्था बढ़िया नहीं की, नालियां नहीं बनाईं या सफाई नहीं करवाई, तो सरकार की जवाबदेही बिल्कुल बनती है। परंतु हमें यह भी देखना चाहिए कि कहीं हम स्वयं नालियों और निकासी वाली जगहों को कचरे से तो नहीं भर रहे? सरकार की जिम्मेदारी है कि सड़कों, नालियों की सफाई करवाए, परंतु लोगों की भी जिम्मेदारी है कि उन्हें कूड़ेदान बना कर बंद न करे। जब सफाई कर्मचारी, सड़कों, पार्कों, नालियों की सफाई ठीक ढंग से नहीं करते तो हम जनता; उन्हें प्रेम सहित प्रेरित नहीं करते कि आप सफाई सही ढंग से करें, अपना कर्तव्य निभाएं। यहां तक कि हम सरकार को शिकायत भी नहीं करते कि सफाई कर्मचारी सही ढंग से कार्य नहीं कर रहे, परंतु मीडिया एवं सोशल मीडिया में सरकार के विरुद्ध प्रचार अवश्य कर देते हैं।

जब सफाई कर्मचारी अपना वेतन बढ़ाने के लिए हड़ताल करते हैं, तब भी हम उन के समर्थन में सोशल मीडिया पर प्रचार अवश्य कर देते हैं। परंतु जब वह अपना कर्तव्य नहीं निभाते, तब हम उन के विरुद्ध सोशल मीडिया पर प्रचार नहीं करते। इस प्रकार स्कूल, अस्पताल, पार्क, जल की निकासी या अन्य सार्वजनिक कार्यों में अपने व्यक्तिगत हितों के कारण, कई बार लोग बाधा उत्पन्न करते हैं। परंतु मीडिया आम तौर पर लोगों को दोष नहीं देता, सरकार के सिर ही दोष मढ़ा जाता है। सरकारी अधिकारियों की कभी-कभी, बिना कारण ही बहुत ज्यादा आलोचना की जाती है। मीडिया द्वारा ऐसी आलोचना करना अनुचित है। केवल सरकार की आलोचना करना ही पत्रकारिता नहीं होती। पत्रकारिता का अर्थ है सरकार द्वारा किए जा रहे, या किए गए अच्छे कार्यों की शोभा की जाए तथा बुरे कार्यों की रचनात्मक ढंग से आलोचना की जाए। आलोचना करते समय सरकार की मजबूरियां भी समझी जाएं तथा लोगों को समझाई जाएं। इसी प्रकार, यदि किसी सरकारी योजना या विकास कार्य में लोगों द्वारा बाधाएं उत्पन्न की जा रही हैं, तो उस सच्चाई को भी सामने लाना चाहिए।

जनता द्वारा डाली जा रही बाधाओं को भी जनता के समक्ष लाना, जनता की भी आलोचना करना, यही वास्तविक पत्रकारिता है। हमें यह कड़वी सच्चाई स्वीकार कर लेनी चाहिए कि कोई भी मनुष्य संपूर्ण नहीं होता। इस लिए कुछ मनुष्यों का समूह, जो किसी भी संस्था या सरकार के नाम से जाना जाता है, वह भी संपूर्ण नहीं, क्योंकि जब एक मनुष्य ही संपूर्ण नहीं, तो अपूर्ण मनुष्यों का समूह, संपूर्ण कैसे हो सकता है? इस लिए हर मनुष्य, हर संगठन कुछ गलतियां करते हैं, कुछ गलतियां सरकार/संगठन से भूल वश हो जाती हैं। अंतिम बात: कुछ गलतियां जो संगठन ने की ही नहीं होतीं, उन के अच्छे कार्यों को भी गलत तरीके से प्रस्तुत कर के गलतियां बना दिया जाता है। फिर कई लोग एवं पत्रकार उस संगठन की आलोचना करने का आनंद उठाते हैं तथा उस आलोचना के कारण मीडिया में अपना नाम भी चमकाते हैं। कभी-कभी इस प्रकार की आलोचनात्मक खबरों से मीडिया को बहुत बड़ा लाभ होता है। इस के अतिरिक्त, अपने द्वारा चुने हुए सरकारी व्यक्तियों की व्यक्तिगत रूप में आलोचना करना, या सरकार कह कर उन की आलोचना करना, इन दोनों बातों में भी बहुत बड़ा अंतर होता है।

वास्तव में सरकार की आलोचना करना बहुत आसान है, परंतु करोड़ों लोगों का अच्छा प्रबंध करके उन सभी को संतुष्ट करना, खुश करना, अत्यंत कठिन कार्य है। इस लिए हमें, मुख्य रूप से पत्रकारों को; आलोचना के साथ-साथ सरकार के अच्छे रचनात्मक कार्यों की प्रशंसा भी अवश्य करनी चाहिए, ताकि सरकार को और अच्छे कार्य करने का उत्साह मिले। सरकार की आलोचना यदि करनी भी हो, तो आलोचना रचनात्मक शब्दों में अच्छे ढंग से करनी चाहिए, ताकि सरकार अपनी गलतियां सुधार कर आगे से बढ़िया ढंग से कार्य कर सके। जिन्होंने सरकार या किसी भी संस्था की आलोचना करनी हो, उनके अंदर अपनी आलोचना सुनने की सहनशक्ति भी होनी चाहिए। किसी की गलतियां निकालना, किसी की आलोचना करना अत्यंत आसान कार्य है। परंतु, अपनी गलतियां किसी से खुले मन से सुनना और अपनी आलोचना सुनना, फिर शांत रहना, यह अत्यंत कठिन कार्य है।