जीवन के प्रति जागरूकता ही हमे सभी बीमारियों से बचाने की कारगर स्किल है
mahendra india news, new delhi
लेखक
नरेंद्र यादव
नेशनल वाटर अवॉर्डी
यूथ एंपावरमेंट मेंटर
हमारा बड़ा लक्ष्य जीवन को सूक्ष्म तरीके से जानना है, इसी वास्ते हम सभी चाहे वो सरकार के रूप में हो, किसी संस्था के रूप में हो, किसी व्यक्ति विशेष के रूप में प्रयास हो, सभी लाइफ को बहुत करीब से जानने के लिए ही होते है। हम राष्ट्रीय स्तर पर, या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत से दिवसों का आयोजन करते है, ऐसा लगता है वर्ष का हर दिन किसी न किसी महत्वपूर्ण दिवस के रूप में मनाया ही जाता है, जैसे एक दिसंबर विश्व एड्स दिवस के रूप में आयोजित किया जाता है,
पूरा संसार एड्स के प्रति जागरूकता के लिए कार्यक्रम आयोजित करता है और ये वर्षों से हो रहा है, लेकिन हम ने जीवन को सूक्ष्मता से जानने का कभी संकल्प ही नहीं लिया है। विभिन्न विषयों को लेकर आए दिन कार्यक्रम का आयोजन होते है और पब्लिक का बहुत सा धन इन्हीं अवेयरनेस के कार्यक्रमों में झोंका जा रहा है, परंतु रिजल्ट में कोई बदलाव नहीं आता है।
अपने जीवन के प्रति जागरूक होना क्या ये हम सभी की अपनी जिम्मेदारी नहीं है? क्या शरीर को स्वस्थ रखना हमारी सभी की जिम्मेदारी नहीं है? हमारा जीवन कैसे रोगमुक्त होगा, इसको जानने की जवाबदेही किसकी है, हमारी ही तो है, लेकिन मनुष्य हर कार्य को समय देने के लिए भागदौड़ करता है परंतु अपने स्वास्थ्य के प्रति वो बिल्कुल ध्यान नहीं रखता है। चाहे एड्स दिवस हो, चाहे स्वास्थ्य दिवस हो, चाहे हृदय दिवस हो, चाहे मलेरिया दिवस हो, चाहे मधुमेह दिवस हो, अरे ऐसे तो सभी बीमारियों के लिए दिवसों का आयोजन होता है और पूरा सिस्टम इससे जूझता हुआ नजर आता है। लेकिन एक मनुष्य ही है जिसे अपने स्वास्थ्य की कोई चिंता नहीं है। जब हम पशु पक्षियों को देखते है तो उनकी भी एक दिनचर्या है, अरे कभी किसी पक्षी को रात में दाना चुगते हुए देखा है,
किसी पशु को रात में चारा के लिए रंभाते देखा है, कभी किसी पक्षी को रात में विचरण करते हुए देखा है, एक दो प्रकार है जैसे चमगादड़ या उल्लू ही रात के कुछ समय अपने भोजन की तलाश में इस लिए निकलते है क्योंकि उन्हें दिन की रौशनी में देखने में परेशानी होती है। एक इंसान ही है जिसे ना तो अपने शरीर की चिंता है, न अपने स्वास्थ्य की चिंता है, न समाज की चिंता है, न देश की चिंता है, न ही राष्ट्र के धन की बर्बादी की चिंता है, और न ही राष्ट्र के विकास की चिंता है, बस यह मनुष्य रूपी जीव जिसे हरेक जीव में सबसे बुद्धिमान जीव माना जाता है लेकिन इस जीव ने धरती माता का जितना चीर हरण किया है उतना तो शायद किसी भी जीव ने नहीं किया है। सारे प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करके भी तसल्ली नहीं है। ये ऐसा जीव है जो रात के बारह बजे भी कुछ खाने को मिल जाए तो खाने से नहीं चूकेगा, अगर रात के दो बजे भी शराब पीने को मिल जाए तो उसका भी सेवन करने से नहीं चूकेगा। इंसान के जन्म के लिए कहा जाता है कि यह जन्म चौरासी लाख योनियों के बाद मिलता है,
वर्तमान इंसान में तो पशुओं से कोई अधिक भिन्नता नहीं दिखती है। वही सभी आदतें मनुष्यों में है जिनके लिए पशु जीवन जीते है अर्थात भोजन, पानी , नींद, और मैथुन। बस यही तो अधिकतर मनुष्य भी चाहते है, उन्हें अच्छा खाने को मिल जाए, फ्री की शराब मिल जाए तो नालियों में गिरने में भी आनंद की अनुभूति करते है, अगर बेईमानी से पैसा मिल जाए तो उसी में आनंद और गर्व करते है, अगर कही झूठ बोलने से कुछ लाभ हो जाए तो उसी में अपने को गौरांवित समझते है, सोने के लिए अच्छे बिस्तर मिल जाए तो समझते है जैसे बहुत ही भाग्यशाली हो गए, और मैथुन के लिए तो सारे सामाजिक नियम ताक पर रख देते है, सारी मर्यादाएं त्याग देते है। अरे इन इंसानों से अच्छे तो पशु है पक्षी है, जो कभी झूठ नहीं बोलते, जो कभी षडयंत्र नहीं रचते है,
जो कभी धोखा नहीं देते है, जो कभी अपनी दिनचर्या के विरुद्ध नहीं जाते है, कभी विरुद्ध भोजन नहीं करते है, लेकिन इंसान ऐसा है चाहे राष्ट्र को कितना भी नुकसान हो जाए, परंतु उनको खुद को थोड़ा भी लाभ हो तो वो सारी मर्यादाओं को तोड़कर ऐसे कार्य कर सकते है जिसके बारे में एक ह्यूमन बीइंग से तो कभी भी अपेक्षा नहीं की जा सकती है। हम सभी को शरीर के तुष्टिकरण से ऊपर उठने की आवश्यकता है, थोड़ा चित्त बुद्धि की ओर जाने की भी जरूरत है। ये शरीर, ये सेहत हमारी ही है,
इसका ख्याल करना भी हम सभी की जिम्मेदारी है, जो केवल विवेक जगाने से ही संभव है, हम इंसान होकर पशुओं जैसा व्यवहार करते है, हमारे पास बुद्धि होते हुए भी मूर्खो जैसा व्यवहार करते है, झूठ बोलते, चोरी करते है, हिंसा करते है, बहन बेटियों को गलत नजर से देखते है, गलत व्यवहार करते है, अपनी भाषा की मर्यादा को भी लांघ जाते है, अपशब्दों का इस्तेमाल करते है, पूरा दिन मन में दूसरों की संपति हड़पने के विचार चलते है, फिर तो इंसान इन पशुओं तथा पक्षियों से भी निम्न स्तर पर जीने वाले प्राणी हुए। अपने जीवन में सबसे पहली जरूरत है कि हमारी काया स्वस्थ हो, उसके लिए पहली जरूरत है कि हमारा भोजन पौष्टिक हो,
उसके लिए पहली जरूरत है कि हमे अपने भोजन में उपलब्ध तत्वों का ज्ञान हो, उसके लिए पहली जरूरत है कि वो खाद्य पदार्थ कौन कौन से है, उसके लिए पहली जरूरत है कि वो कहां से मिलेंगे, और उसके लिए पहली जरूरत है कि हम उन तत्वों को अपने भोजन में शामिल कैसे करें। उसके बाद इस प्रक्रिया में अड़चन कौन कौन सी है, उसे जानने के लिए पहली जरूरत हैं कि अपने भोजन में विरुद्ध तत्वों का ज्ञान होना चाहिए, इसे जानने के लिए पहली जरूरत है कि भोजन को थाली में डालने से पहले इन विशेष तत्वों को जानने का संकल्प ले ताकि हमारा भोजन हमारी तासीर से भिन्न न हो, इसके लिए पहली जरूरत है कि अपने शरीर की तासीर को समझे, जाने, अपने शरीर के वात पित कफ की प्रकृति को जाने और उसी अनुरूप भोजन अपनी थाली में डाले, तभी हम अपने शरीर को स्वस्थ रख पाएंगे। हमारा शरीर ही पहले दृश्य में हमारा जीवन है,
उसे स्वस्थ रखना सबसे बड़ी जिम्मेदारी है और ये जिम्मेदारी हमारी खुद की है किसी और की नहीं है। खुद के शरीर के स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता के उपरांत आता है बाहरी थ्रेट अर्थात बाहर से आने वाले संक्रमण के प्रति भी जागरूक रहे, उसे अपने शरीर के भीतर जाने से रोकने के लिए संकल्पशील रहने की आवश्यकता है,चाहे वो किसी भी प्रकार का संक्रमण हो, उससे दूर रहने की जरूरत है, और ये भी हमारी खुद की ज़िम्मेदारी है, इसके बचाव के लिए योग , प्राणायाम तथा आयुर्वेद का सहारा लिया जा सकता है। अरे भाई पशु पक्षियों के लिए तो उनके जीवन के संरक्षण के लिए कार्यक्रम चलाए जाए तो समझ सकते है कि उनमें विवेक नहीं है, वो उन सभी संसाधनों से दूर है जो उन्हें चाहिए, परंतु फिर भी वो अपने स्वास्थ्य के प्रति इतने जागरूक है कि क्या खाना है,
क्या नहीं खाना है, कब खाना है, कितना खाना है, ये सभी ज्ञान हर पशु पक्षियों में है लेकिन ये तो मनुष्य ही है जिनका जन्म 84 लाख योनियों में भटकने के बाद होने के बावजूद भी उन्हें ये ज्ञान नहीं है कि हमे क्या क्या खाना है, क्या नहीं खाना है, कब खाना है, कब नहीं खाना है, किन किन खाद्य पदार्थों का परहेज करना है। मनुष्यों के मामले में केवल अर्थ की प्रधानता का ख्याल किया जाता है कि ये पदार्थ पैसे से मिल रहा है या फ्री में मिल रहा है, उससे ही उसकी उपभोग्यता तय होती है, अगर मुफ्त मिल रही है तो फिर खुद की सेहत को भी ताक पर रखा जा सकता है और अगर खुद के पैसे लग रहे है तो भले ही वो उनकी सेहत के लिए लाभकारी हो, उसे भी छोड़ देंगे। अगर शादी विवाह में देखो तो लोग ये सारी सीमाएं तोड़ देते है, जलेबियां, मिठाइयां, रसमलाई तक कूड़ेदान में फेंकने से नहीं चूकते है।
हम सभी को जागरूक होने की आवश्यकत है, यह न तो किसी दिवस के आयोजन से आती है और ना ही रोज रोज धन व्यर्थ करने से आती है, इसके लिए विवेक जगाने की जरूरत होती है। जो अपने जीवन के प्रति जो जागरूक है वो ही इंसान कहलाने के काबिल है अन्यथा वो पशु के समान ही माना जाता है। बहुत आयोजन हो चुके, सार्वजनिक कार्यक्रमों का किसी पर असर नहीं पड़ता है, इसे हमारी शिक्षा पाठ्यक्रमों में शामिल करने की जरूरत है। आओ मिलकर सरकारी धन को बचाने के लिए अपने जीवन के प्रति जागरूक बनने की जिम्मेदारी खुद उठाएं। एड्स के प्रति जागरूक होने के लिए जीवन को संयमित करने की जरूरत है,
जीवन को अनुशासित करने की आवश्यकता है, जीवन को मर्यादित करने की जरूरत है। अब तो सभी जागरूकता कार्यक्रम मनोरंजन के माध्यम बन कर रह गए है क्योंकि उनके आयोजन के पीछे के ध्येय वाक्य को हमने बहुत पीछे छोड़ दिया है। किसी भी कार्यक्रम के आयोजन में उसके ध्येय वाक्य पर ध्यान देने की बजाय अधिक समय व धन तो उसमें आने वाले मुख्य अतिथियों के आतिथ्य में ही खर्च हो जाता है, कार्यक्रम के ध्येय वाक्य को छोड़ अन्यत्र ही बढ़ते जाते है। इन सभी से बचने की आवश्यकता है, किसी भी कार्यक्रम को मनोरंजक इवेंट बनने से रोकने की जरूरत है।
जय हिंद, वंदे मातरम