अधिक पढ़े लिखों का अंधविश्वासी होना, धर्म और विज्ञान दोनों का अपमान है, इस कायरता को छोड़ें।
mahendra india news, new delhi
लेखक
नरेंद्र यादव
नेशनल वाटर अवॉर्डी
यूथ एंपावरमेंट मेंटर
अंधविश्वासी होना और धार्मिक होने में बहुत अंतर है। अगर कोई अंधविश्वास पर चोट करें तो वो अधिक धार्मिक है, जो अंधविश्वास पर बोले, उन्हें धर्म की ज्यादा चिंता है, जो अंधविश्वास के विरुद्ध लड़ें वो धर्म को बचाने में खुद को खपा रहा है, जिन महापुरुषों ने पाखंड के खिलाफ युद्ध किया,उन्हें धर्म की अधिक चिंता थी। कुछ लोग ऐसे हो गए है कि वो तुरंत आप पर हमला करेंगे, अगर आपने पाखंड पर बोलना शुरू किया, इसका अर्थ सीधा सा है कि जो पाखंड के पक्ष में खड़े होते है या अंधविश्वास के पक्ष में खड़े होते है, भले ही वो पढ़े लिखे हो, उनका कुछ तो नुकसान हो रहा है, चाहे वो किसी भी प्रकार का हो,
चाहे वो धन का नुकसान है या फिर धंधे की हानि है, कुछ लोग ना तो अंधविश्वासी है ना ही पाखंडी है वो भी तर्कशीलता के पक्ष में खड़ा होने से इस लिए डरते है कि कुछ पाखंडी लोग, कुछ अधर्मी लोग या उनके समर्थक हमला कर देंगे, उनको गाली गलौच करेंगे, जो धर्म से अधिक अंधविश्वास पसंद करते है, क्योंकि उनको उससे लाभ है, इसे समझना जरूरी है। अरे युवा साथियों, तुम तो महर्षि स्वामी दयानंद जी सरस्वती के साथ खड़े होना सीखो, अरे युवाओं तुम महान दार्शनिक सुकरात के सत्य के साथ खड़ा होना सीखो, अरे युवाओं तुम तो स्वामी विवेकानंद की तर्कशीलता के साथ खड़े होने की हिम्मत करो, अरे हवा में उड़ने वाले युवाओं तुम तो शहीद भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव की वीरता के साथ खड़े होना सीखो, अरे युवाओं तुम तो शहीद चंद्रशेखर के बलिदान के साथ खड़ा होना सीखो, जिन्होंने सच्चाई के लिए अपना जीवन भी कुर्बान कर दिया। मैं यहां किसी भी प्रकार से धार्मिक धारा की खिलाफत की बात नहीं कर रहा हूं,
लेकिन मैं अंधविश्वास के विरुद्ध खड़े होने की बात कर रहा हूं, यहां धर्म और पाखंड में अंतर करना होगा, क्योंकि अधिकतर लोग पाखंड को ही धर्म मानते है और उन्हें लगता है कि कोई उनके धर्म पर हमला कर रहा है। मैं निर्भीकता की बात कर रहा हूँ। यहां अंधविश्वासी होने का अर्थ है कि हम कायरता को प्राप्त हो चुके है, हम भयभीत हो चुके है, हम अपने जीवन में डरपोक बन गए है, कि जीवन में किसी भी प्रकार का डर दिखाकर हमे ठग लिया जाता है। यहां पाखंड में घुसने का अर्थ है कि हम खुद को अधर्म के साथ खड़ा कर रहे है क्योंकि तर्कहीनता, भय, कायरता, असत्यता, अनाचार ये सभी तो अधर्म के लक्षण ही तो है। अगर धर्म के लक्षण जानने है तो अपने सनातन शास्त्रों का अध्ययन करना चाहिए। उन्हें लाल कपड़े में लपेट कर संदूकों में बंद नहीं करना है, उन्हें कपड़े में लपेट कर अपने सिर पर रखकर घूमना नहीं है, उन शास्त्रों से ज्ञान प्राप्त करना है। कुछ लोग, कुछ बाबा कुछ साधु संत, कुछ कथावाचक धर्म के नाम पर आमजन को भ्रमित कर रहे है, और अपना बिज़नेस चला रहे है। कोई चमत्कार कर रहे है, कोई गृह शांति के स्थान पर ग्रह शांति कराने में लगे है, कुछ लोग राहु केतु को ग्रह बता रहे है, कुछ लोग खुद को भगवान बता रहे है, कुछ लहसुन प्याज को कुत्ते के अंडकोष से पैदा हुआ पदार्थ बात रहे है,और कुछ कह रहे कि हमारी तो सभी भगवानों से बात होती है, कुछ लोग ऐसे जंजाल फैलाते है कि बेचारे लोग डर जाते है, और पाखंड में फंस जाते है। ये ऐसा ही है जैसे हम बचपन में जादू का खेल देखने जाते थे तो वो जादूगर ऐसे ऊटपटांग कृत्य करता था, जैसे डरावनी भाषा में कहता था कि कोई एक कदम भी मत सरकना, अपने हाथ मत बंधना, नहीं तो कुछ हो गया तो मेरी कोई जिम्मेदारी नहीं होगी, और हम बच्चे इससे डर जाते थे वा डर के मारे उसकी झोली में पैसा धड़ाधड़ डालते थे, वही कुछ अब पाखंड के नाम पर हो रहा है। मैं बहुत ही स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूं कि सभी प्रकार के पाखंड धर्म के विरुद्ध है। आपके सामने दो ही रास्ते है या तो धर्म को मानो और कर्म करो या फिर पाखंड करो और धर्म के विरुद्ध कर्मकांड करो। भगवान श्रीकृष्ण जी ने महाभारत के युद्ध के मैदान में अर्जुन को नियत कर्म करने के लिए प्रेरित किया था, कृष्ण जी ने अर्जुन को क्षत्रिय धर्म याद दिलाया था, उन्होंने अर्जुन को पैर में काला धागा बांधने के लिए नहीं कहा था, कृष्ण ने अर्जुन को अपने गांडीव में नींबू मिर्ची बांधने के लिए नहीं बोला था, कृष्ण ने अर्जुन को चौराहे पर टोना टोटका करने के लिए नहीं बोला था, कृष्ण जी महाराज ने अर्जुन को धूप बत्ती या चद्दर चढ़ाने के लिए नहीं बोला था,
कृष्ण ने अर्जुन को चीनी वाला दही खाने को नहीं बोला था, योगेश्वर श्रीकृष्ण ने अर्जुन के क्षत्रिय धर्म को निभाने के लिए युद्ध करने के लिए तैयार किया था,अर्जुन को मोह से छुटकारे के लिए मोटिवेट किया था, ये आत्मा अमर है यह ना मरती है ना ही इसका क्षरण होता है, यही तो कहा था। हे पार्थ, अगर तुमने युद्ध नहीं किया तो तुम्हे इस धरती पर इतिहास माफ नहीं करेगा। अगर हम पाखंड या अंधविश्वास में घुसते हैं तो फिर श्रीमद्भगवद् गीता के कर्म सिद्धांत की अवहेलना करेंगे, हम श्रीकृष्ण के उपदेशों की अवहेलना करेंगे। छोटे छोटे कर्मकांडो से कोई बड़ा लक्ष्य प्राप्त नहीं किया जा सकता है, इसे समझने का प्रयत्न करों। मैं यहां एक विशेष बात और कहना चाहता हूं कि अगर किसी भी कार्य का मुहूर्त इतना ही महत्वपूर्ण होता तो महाभारत के युद्ध से पहले श्रीकृष्ण अर्जुन को इसके लिए शुभ दिन वा पल पूछने के लिए कहते, लेकिन श्रीकृष्ण ने ऐसा कुछ ना कहकर केवल जीवन के मर्म को समझाते हुए अर्जुन को उसके नियत कर्म का ध्यान कराया था। हमारे यहां पाखंड फैलने या फैलाने का एक बहुत कारण यह भी है कि आम लोगों को संस्कृत भाषा का ज्ञान नहीं है और उसी का लाभ कुछ उठाते है। यहां कुछ ऐसे भी है जो अपनी सुविधानुसार व्याख्या कर लेते है वा अर्थ का अनर्थ कर देते है, क्योंकि संस्कृत भाषा की व्याख्या करना और कहे गए शब्दों के भाव समझना भी तो हरेक के वश की बात नहीं है। कुछ विद्वानों ने शास्त्रीय ज्ञान को सिंबॉलिक विज्ञान से समझाने के लिए कुछ कहानियां, कुछ कर्मकांड, वा कुछ प्रतीकों से समझाने के प्रयास किए थे, लेकिन व्याख्या करने वालों ने प्रतीकों को ही, कहानियों को ही पूजनीय मान लिया, उन्ही को करतार मान लिया, इसी लिए ये अंधविश्वास फैलता गया।
वर्तमान की समस्या यह है कि अगर कोई विद्वान इन्हें ठीक समझाने की कोशिश करें, और गलत को सही करने के लिए ज्ञान प्रसारित करते है तो कुछ महापाखंडी ऐसे है जिन्होंने इस पाखंड को अपना व्यवसाय बना लिया है वो धर्म की बात करने वालों को ही उल्टा धर्म विरोधी बता कर हमला बोल देते है जिससे धर्म और पाखंड में अंतर समझ में ही नहीं आता है, जबकि ऐसा नहीं है कि हम श्रीमद्भगवद् गीता को समझ नहीं सकते है, या हम वेदों को पढ़ नहीं सकते है परंतु जिन्हें हम विद्वान समझते है वो ही घाल मेल कर दे तो आम जन क्या ही कर पाएंगे। श्रीमद्भगवद् गीता मानव विकास का ग्रन्थ है अगर कोई भी पढ़ ले तो निश्चित ही उनके जीवन में परिवर्तन होगा। भगवान श्रीकृष्ण जी ने श्रीमद्भगवद् गीता के तीसरे अध्याय के तीसरे श्लोक में कहा है कि " लोकेअस्मिन द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मया अनघ। ज्ञानयोगेन संख्यानाम कर्मयोगयेन योगिनाम"।।
अर्थात भगवान श्रीकृष्ण जी कहते है कि मैने दो प्रकार की ज्ञान की निष्ठा बनाई है, जो ज्ञानियों के लिए ज्ञान योग और नियत कर्म के लिए कर्मयोग निर्धारिय किया है, इन्हीं के द्वारा ही जीवन चलेगा। अगर किसी को भी कोई शक हो तो उन्हें श्रीमद्भगवद् गीता का तीसरा अध्याय कर्मयोग जरूर पढ़ना चाहिए, जिसमें कर्म का महत्व बताया गया है, उससे हमारे भीतर बैठे पाखंड या अंधविश्वास का नाश किया जा सकेगा। वैसे भी हमारे दो दर्शनों जैसे संख्य दर्शन वा योग दर्शन का भी अध्ययन किया जा सकता है। अंधविश्वास और पाखंड भय का एक बड़ा खेल है, उसे समझने की आवश्यकता है। कर्म करो, ज्ञान के अनुसार और वह कर्म ही हमे जीवन रूपी भव सागर अर्थात जीवन की गहमा गहमी से पार करेगा। धर्म ज्ञान का विषय है, पाखंड वा अंधविश्वास का नहीं है।
जय हिंद, वंदे मातरम