महालक्ष्मी व्रत आज से, 16 दिनों तक क्यों रखा जाता है महालक्ष्मी व्रत? जानें पौराणिक महत्व और पांडवों से जुड़ा रहस्य
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हर घर में मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है। हिंदू धर्म में मां लक्ष्मी को धन और वैभव की देवी माना गया है, माता लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए व्रत का खास महत्व है. यह व्रत पूरे 16 दिनों तक चलता है.
ज्योतिषचार्य पंडित नीरज शर्मा ने बताया कि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो व्यक्ति पूरे नियम और निष्ठा के साथ यह व्रत रखता है, उसके घर से कंगाली दूर हो जाती है. साथ ही पैसों से जुड़ी तमाम समस्याएं भी धीरे-धीरे खत्म होने लगती हैं.
भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से इस पावन व्रत की शुरुआत होती है. आइए जानते हैं कि इस साल यह व्रत कब से शुरू हो रहा है और इसके पीछे की पौराणिक कहानी क्या है.
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ये महालक्ष्मी व्रत 2026 की सही तिथियां
इस साल भाद्रपद शुक्ल अष्टमी तिथि की शुरुआत 18 सितंबर को दोपहर 1 बजे से हो रही है. यह तिथि आज शनिवार यानी 19 सितंबर को दोपहर 3 बजकर 26 मिनट पर समाप्त होगी.
उदया तिथि के नियमों के अनुसार महालक्ष्मी व्रत की शुरुआत आज शनिवार को 19 सितंबर 2026 से होगी. इस 16 दिवसीय व्रत का समापन आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी यानी 3 अक्टूबर को होगा. इन 16 दिनों में मां लक्ष्मी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है.
16 दिनों का महालक्ष्मी व्रत?
ज्योतिषचार्य पंडित नीरज शर्मा ने बताया कि पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस व्रत को रखने से जीवन में कभी धन-धान्य की कमी नहीं होती. भविष्य पुराण और स्कंद पुराण में भी इस व्रत के महत्व का डिटेल से उल्लेख मिलता है.
माना जाता है कि जो लोग इस दौरान सच्चे मन से देवी लक्ष्मी की साधना करते हैं, उनके घर में सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है. व्यापार और नौकरी में आ रही रुकावटें दूर होती हैं. परिवार के सदस्यों की तरक्की के नए रास्ते खुलने लगते हैं.
गरीब ब्राह्मण और भगवान विष्णु की पौराणिक कथा
महालक्ष्मी व्रत की शुरुआत के पीछे एक बहुत ही दिलचस्प पौराणिक कथा जुड़ी हुई है. प्राचीन काल में एक गांव में एक गरीब ब्राह्मण रहता था.
वो भगवान विष्णु का बहुत बड़ा भक्त था और रोज नियम से उनकी पूजा करता था. उसकी निस्वार्थ भक्ति देखकर भगवान विष्णु प्रकट हुए और उससे मनचाहा वरदान मांगने को कहा.
ब्राह्मण ने हाथ जोडक़र प्रार्थना की कि उसके घर में मां लक्ष्मी का स्थायी वास हो जाए, ताकि उसकी दरिद्रता मिट सके.
उपले थापने वाली महिला और मां लक्ष्मी का रहस्य
भगवान विष्णु ने ब्राह्मण को एक उपाय बताया. उन्होंने कहा कि मंदिर के सामने रोज एक स्त्री आती है जो कंडे यानी उपले थापती है. वही साक्षात धन की देवी लक्ष्मी हैं.
तुम जाकर उनसे अपने घर आने का आग्रह करो. जब देवी तुम्हारे घर कदम रखेंगी, तो तुम्हारा घर धन-दौलत से भर जाएगा.
अगले दिन जब वह स्त्री वहां आई, तो ब्राह्मण ने उन्हें सम्मानपूर्वक अपने घर आमंत्रित किया. देवी लक्ष्मी तुरंत समझ गईं कि यह सुझाव भगवान विष्णु का ही है.
16 दिनों के व्रत से प्रसन्न हुईं धन की देवी
मां लक्ष्मी ने ब्राह्मण को बताया कि अगर वह लगातार 16 दिनों तक महालक्ष्मी व्रत रखेगा, तो उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी. ब्राह्मण ने देवी के बताए अनुसार पूरी श्रद्धा के साथ 16 दिनों तक कठिन व्रत और नियमपूर्वक पूजा की.
उसकी निष्ठा से प्रसन्न होकर मां लक्ष्मी ने उसके घर में वास किया और उसकी गरीबी हमेशा के लिए दूर कर दी. तभी से सनातन धर्म में 16 दिनों के महालक्ष्मी व्रत रखने की परंपरा चली आ रही है.
जब युधिष्ठिर ने खो दिया था राजपाठ
पौराणिक कथा के अनुसार महाभारत काल में जब पांडव जुआ में अपना पूरा राज्य, धन-दौलत और महल हार गए थे, तब वे वन-वन भटकने को मजबूर हो गए थे.
पांडवों की ये दयनीय स्थिति देखकर ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिर बहुत दुखी और चिंतित रहने लगे. वे लगातार अपने खोए हुए राज्य और सम्मान को वापस पाने का मार्ग तलाश रहे थे.
पांडवों का दुख दूर करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें एक मार्ग सुझाया, जिससे उनका खोया हुआ वैभव फिर से प्राप्त हो सके.
भगवान श्रीकृष्ण की सलाह और महालक्ष्मी व्रत का विधान
भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को महालक्ष्मी व्रत का महत्व बताया. उन्होंने कहा कि यदि पांडव पूरे विधि-विधान से 16 दिनों का यह महालक्ष्मी व्रत रखें और 16 गांठों वाला डोरा धारण करें, तो देवी लक्ष्मी की कृपा से उन्हें उनका खोया हुआ राजपाठ वापस मिल जाएगा.
श्रीकृष्ण के मार्गदर्शन में माता कुंती और द्रोपदी सहित सभी पांडवों ने जंगल में ही 16 दिनों तक अत्यंत नियमपूर्वक महालक्ष्मी का ये कठिन व्रत संपन्न किया.
इस व्रत के प्रभाव से पांडवों को दिव्य शक्ति और खोया हुआ वैभव वापस पाने का वरदान प्राप्त हुआ.
नोट= इस समाचार को लिखने के लिए पौराणिक मान्यताओं, महाभारत की कथाओं और धार्मिक ग्रंथों पर आधारित एक विवरणात्मक रिपोर्ट है। हमारा केवल उद्देश्य पाठकों तक केवल सांस्कृतिक और पौराणिक जानकारियां देना है किसी भी व्रत या पूजा-अनुष्ठान का पालन अपनी आस्था और धर्मशास्त्रियों की सलाह लेकर करें। धन्यवाद