डेरा जगमालवाली में मैनेजर साहिब का जन्मदिन श्रद्धा से मनाया, संत बिरेन्द्र सिंह ने दिया सिमरन और सेवा का संदेश
The managers birthday was celebrated with devotion at Dera Jagmalwali; Sant Birendra Singh delivered a message on simran meditative remembrance and seva selfless servicemahendra india news, new delhi
डेरा जगमालवाली में मैनेजर साहिब का जन्मदिन भंडारा व विशाल सत्संग कार्यक्रम पूरी श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इस पावन अवसर पर बड़ी संख्या में पहुंची साधसंगत को संबोधित करते हुए संत बिरेन्द्र सिंह ने मैनेजर साहिब के जीवन और सिद्धांतों से सीख लेने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि हम सांसारिक रूप से एक-दूसरे को जन्मदिन पर कई तरह के उपहार देते हैं, लेकिन संतों के जन्मदिन पर हमारी तरफ से असली भेंट 'सिमरन' है। संत भौतिक चीजों से नहीं, बल्कि भजन-सिमरन करने से खुश होते हैं।
सत्संग फरमाते हुए संत ने कहा कि जैसे हम अन्य सांसारिक कार्यों के लिए समय निकालते हैं, वैसे ही हमें सिमरन के लिए भी समय निकालना होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि संत हमारे सिमरन से सांसारिक सफलता की गारंटी नहीं लेते, बल्कि आत्मिक सुख की गारंटी लेते हैं। जीवन में दुख और परेशानियां तो आएंगी, लेकिन सिमरन करने से आत्मा इतनी बलवान हो जाती है कि इंसान में हर दुख-तकलीफ को सहने की क्षमता आ जाती है और उसे इन परेशानियों से कोई फर्क नहीं पड़ता।
जीवन की सच्चाई बयां करते हुए संत बिरेन्द्र सिंह ने कहा कि इंसान एक-एक दिन करके अपनी मौत और अंतिम मंजिल के करीब पहुंच रहा है। हर साल जन्मदिन पर केक काटने और खुशियां मनाने के बजाय इंसान को यह विचार करना चाहिए कि पूरा साल बीतने पर उसने भजन-सिमरन या निष्काम सेवा के क्षेत्र में कौन-सा मुकाम हासिल किया। इंसान मिट्टी का पुतला है, जिसकी कोई मियाद नहीं। मूली उखाड़ने में तो फिर भी वक्त लगता है, लेकिन इंसान को इस दुनिया से जाने में एक पल भी नहीं लगता। माटी ही ओढ़ना है और माटी ही बिछौना, अंत में सब माटी में ही मिल जाना है, फिर भी इंसान का अहंकार सातवें आसमान पर है। महाभारत के यक्ष-युधिष्ठिर संवाद का जिक्र करते हुए संत ने कहा कि दुनिया का सबसे बड़ा अजूबा यही है कि सबको पता है एक दिन मरना है, फिर भी कोई इसे याद नहीं रखता। हम सब यहां मुसाफिर हैं, जिनका बुलावा कभी भी आ सकता है।
इंसान सारी उम्र परिवार और रिश्तेदारों को खुश करने में लगा रहता है, लेकिन जिसने मानव चोला दिया, उस सतगुरु को भूल बैठा है। अंत समय में याद आएगा कि जिस चौरासी के चक्र से आजाद होने आए थे, वह काम तो किया ही नहीं। उन्होंने बताया कि परमात्मा किसी पहाड़ या जंगल में नहीं, बल्कि इंसान के अपने शरीर रूपी मंदिर के भीतर बैठा है। संतों का उद्देश्य धर्मों के झगड़े करवाना नहीं, बल्कि सोई हुई आत्मा को जगाना है। संत पूरी मानवता को एक नूर से उपजा हुआ मानते हैं और कबीर साहिब जैसे संतों के अनुसार केवल ध्यान व सिमरन से ही परमात्मा को पाया जा सकता है।
संत ने जीवन जीने का मूल मंत्र देते हुए कहा कि इंसान को ईमानदारी और मेहनत की कमाई करनी चाहिए। जीवन में शांति चाहिए तो दूसरों को माफ करना सीखो। बदले की भावना विनाश की ओर ले जाती है, जबकि दयालुता और क्षमा आत्मा का विकास करती है। अंत में उन्होंने फरमाया कि जैसे बीमारी के इलाज के लिए 'मौके के डॉक्टर' की जरूरत होती है, वैसे ही रूहानी सफर और चौरासी लाख योनियों से मुक्ति के लिए 'वक्त के गुरु' (जीवित गुरु) की शरण में जाना अत्यंत आवश्यक है।