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HARYANA के गांव से कोलकाता तक का सफर दीनदयाल गुप्ता ने एक सिलाई मशीन से बनाई 1700 करोड़ की अंडरवियर कंपनी, गुप्ता का निधन

 
Deendayal Gupta's journey from a village in Haryana to Kolkata, using a sewing machine to build an underwear company worth Rs 1700 crore, Gupta passes away
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mahendra india news, new delhi

हरियाणा के भिवानी जिले के मानहेरू गांव में एक साधारण परिवार में जन्मे दीनदयाल ने अपनी देशभर में अलग से पहचान बनाई। आज हमारे बीच में दीनदयाल नहीं रहे हैं। होजरी और इनरवियर क्षेत्र की दिग्गज कंपनी डॉलर इंडस्ट्रीज लिमिटेड के फाउंडर और मानद चेयरमैन दीनदयाल गुप्ता का इसी 2 मई 2026 को आयु  संबंधी बीमारी के चलते निधन हो गया। गुप्ता जी 88 वर्ष के थे। आज उनका परिवार डॉलर इंडस्ट्रीज का 1,700 करोड़ रुपये से अधिक का व्यवसाय संभाल रहा है।


गुप्ता जी अपने पीछे पत्नी, 4 बेटे और पोते-पोतियों का भरा-पूरा परिवार छोड़ गये दीनदयाल गुप्ता की कहानी सिर्फ एक बिज़नेस की नहीं, बल्कि शून्य से शिखर तक पहुंचने की एक बेहद प्रेरणादायक दास्तान है। 

गांव से कोलकाता का सफर 
 हरियाणा के भिवानी जिले के मानहेरू गांव में 13 सितंबर, 1937 को एक साधारण परिवार में जन्मे दीनदयाल गुप्ता 1962 में अवसरों की तलाश में कोलकाता पहुंचे। उन्होंने इस शहर के होजरी उद्योग में एक दशक बिताया और मैन्युफैक्चरिंग, डिस्ट्रीब्यूशन और कपड़ा व्यापार की बारीकियां सीख गए। उपभोक्ताओं की जरूरतों को करीबन से समझने के बाद, 1972 में उन्होंने सीमित पूंजी और पारिवारिक मदद के साथ 'भवानी टेक्सटाइल्स' के नाम से एक छोटी सी होजरी निर्माण इकाई की नींव रखी।


साम्राज्य में कैसे बदली डॉलर?
बताया जा रहा है कि शुरुआती दशकों में कंपनी ने काफी बड़ा संघर्ष किया। 1986 में जब उनके बेटे विनय कुमार गुप्ता महज 18 वर्ष की आयु में व्यवसाय में शामिल हुए, तब कंपनी का सालाना राजस्व सिर्फ 30 लाख रुपये था और रूपा व लक्स जैसे स्थापित दिग्गजों से उसे कड़ी टक्कर मिल रही थी। कंपनी के लिए असली टर्निंग पॉइंट 1991 में दीपावली डिनर के दौरान आया। 

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जानकारी के अनुसार दीनदयाल गुप्ता ने अपने सबसे बड़े बेटे विनोद गुप्ता (जो चार्टर्ड अकाउंटेंट थे और 1987 से फर्म का ऑडिट कर रहे थे) से अपनी कॉरपोरेट जॉब छोडक़र पारिवारिक व्यवसाय में पूरी तरह शामिल होने को कहा। उन्होंने कहा, तुम अपनी पेशेवर विशेषज्ञता को पारिवारिक व्यवसाय में लगाकर इसे बड़ा क्यों नहीं बनाते? इसके बाद तो विनोद गुप्ता ने ऐसा ही किया। उन्होंने कंपनी के कामकाज का कंप्यूटरीकरण किया, रिटेलर्स के लिए क्रेडिट सुविधाएं और मार्जिन बढ़ाया तथा आक्रामक मार्केटिंग शुरू की, जिससे बिक्री के आंकड़े तेजी से बढऩे लगे।

डॉलर नाम कैसे मिला?
बताया जा रहा है कि साल 1998 में कंपनी का नाम भवानी टेक्सटाइल्स से बदलकर 'डॉलर इंडस्ट्रीज' कर दिया। यह एक मास्टरस्ट्रोक साबित हुआ। 'डॉलर' विश्व की सबसे अधिक पहचानी जाने वाली मुद्रा है, यह नाम तुरंत याद हो जाने वाला और एक प्रीमियम अहसास देने वाला था। विनोद गुप्ता ने डिस्ट्रीब्यूटर्स का एक लॉयल नेटवर्क बनाने के लिए मनाली, गोवा और काठमांडू जैसी जगहों पर एक्सक्लूसिव मीट आयोजित किए। इसके बाद तो पीढ़ी दर पीढ़ी इस इंडस्ट्रीज से जुड़ती गई।