जानें क्या आप भी विषाक्त (Toxic) माता-पिता हैं? स्कूल जाने वाले बच्चों पर भावनात्मक दुर्व्यवहार और उपेक्षा की गलतियां
mahendra india news, new delhi
प्रिय माता-पिता,
मैं एक शिक्षक के रूप में, वर्षों से स्कूलों, गांवों और बच्चों के बीच काम कर रहा हूं। हरियाणा की मिट्टी में मेहनत, ईमानदारी और परिवार के प्रति समर्पण की खुशबू बसी है। आप दिन-रात खेतों में पसीना बहाते हैं,अपने अन्य कारोबार करते है,ताकि आपके बच्चे बेहतर पढ़ाई कर सकें, अच्छी नौकरी पा सकें और समाज में नाम कमा सकें। लेकिन आज मैं आपसे एक गंभीर, लेकिन दिल से बात करना चाहता हूं – कई बार अनजाने में हमारा प्यार ही बच्चों के लिए विषाक्त (Toxic) बन जाता है। खासकर भावनात्मक दुर्व्यवहार और भावनात्मक उपेक्षा के रूप में, जो हमारे स्कूल जाने वाले बच्चों के मन को चुपके-चुपके तोड़ देता है।
भावनात्मक दुर्व्यवहार: वो घाव जो दिखते नहीं, लेकिन सालों तक दर्द देते हैं
अपने घरों मे, जहां पढ़ाई पर भारी दबाव है, माता-पिता अक्सर इन गलतियों में पड़ जाते हैं:
बच्चा अगर परीक्षा में कम नंबर लाए या होमवर्क न करे, तो चिल्लाना – "तू तो बिल्कुल निकम्मा है! कुछ नहीं बनेगा तुझसे!"
पड़ोस के बच्चे से तुलना करना – "देख, रामू तो टॉप कर रहा है, तू क्या कर रहा है?"
बच्चे की भावनाओं को कुचलना – लड़का रोए तो "मर्द बन, आंसू मत बहा!" या लड़की शिकायत करे तो "चुप रह, घर की इज्जत रख!"
ये शब्द बच्चे के मन में डर, शर्म और खुद से नफरत बो देते हैं। शिक्षा के नजरिए से देखें तो ऐसे बच्चे स्कूल में ध्यान नहीं दे पाते, डर के मारे सवाल नहीं पूछते और धीरे-धीरे पढ़ाई से दूर हो जाते हैं। हाल के अध्ययनों से पता चलता है कि ग्रामीण हरियाणा में किशोरों में डिप्रेशन की दर 20% से ज्यादा है – और इसका एक बड़ा कारण परिवार से मिलने वाला भावनात्मक दबाव है।
भावनात्मक उपेक्षा: जब प्यार मौजूद है, लेकिन बच्चे तक नहीं पहुंचता
खेतों की मेहनत में व्यस्त माता-पिता अक्सर ये भूल जाते हैं: बच्चा स्कूल से लौटकर उत्साह से अपनी बात बताना चाहे, लेकिन "अभी काम है, बाद में" कहकर टाल दिया जाए।
अच्छे नंबर लाने पर भी कोई "शाबाश बेटा!" न कहा जाए, बस "अगली बार और अच्छे लाना"।
बच्चे की स्कूल की छोटी-मोटी परेशानियां (दोस्तों से झगड़ा, टीचर की डांट) को "खुद संभाल ले" कहकर अनदेखा कर दिया जाए।
या फिर खासकर छोटे बचों को हम डर दिखाकर ही समझाने की कोशिश करेंगे, " चुड़ैल आ जाएगी, पुलिस आ जाएगी " और ना जाने क्या क्या तरीकों से हम बच्चों को अनजाने में मानसिक रुप से प्रताड़ित करते हैं।
यह उपेक्षा बच्चे को अकेला महसूस कराती है। वह सोचता है – "मेरी भावनाओं की कोई कद्र नहीं।" नतीजा? स्कूल में एकाग्रता कम होना, दोस्तों से दूरी, और कई बार गलत रास्ते पर चल पड़ना। ग्रामीण इलाकों में संयुक्त परिवारों में व्यक्तिगत ध्यान कम मिलता है, लेकिन यही कमी बच्चों के मानसिक विकास को रोक देती है।बच्चों पर गहरा असर – शिक्षा और जीवन दोनों प्रभावित
एक शिक्षक के तौर पर मैं देखता हूं कि ऐसे बच्चे: पढ़ाई में पिछड़ जाते हैं, क्योंकि मन उदास रहता है।
आत्मविश्वास खो देते हैं, नई चुनौतियों से डरते हैं।
बड़े होकर रिश्तों में समस्या झेलते हैं या खुद विषाक्त (Toxic) माता-पिता बन जाते हैं।
हरियाणा के ग्रामीण क्षेत्रों में युवाओं में तनाव और मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ रही हैं। यह चक्र तोड़ना हमारी जिम्मेदारी है।
सकारात्मक parenting: शिक्षा की असली नींव
अच्छी खबर यह है कि बदलाव बहुत आसान है। आपकी थोड़ी सी कोशिश से बच्चे न सिर्फ अच्छे छात्र बनेंगे, बल्कि मजबूत इंसान भी।
रोज 10 मिनट सुनें: स्कूल से लौटने पर बच्चे की बातें बिना जजमेंट के सुनें।
प्रशंसा की शक्ति: छोटी सफलता पर "बहुत अच्छा किया बेटा!" कहें – यह बच्चे के दिमाग में सकारात्मक रसायन छोड़ता है।
भावनाओं का सम्मान: रोए तो गले लगाएं, समझें। "मर्द बन" कहने की बजाय "बताओ क्या हुआ" पूछें।
समय निकालें: खेतों के बीच परिवार के साथ भोजन या शाम की बातचीत जरूर करें।
मदद लें: अगर तनाव ज्यादा हो, तो सबसे पहले बच्चे के स्कूल से बात करें और मिलकर एक टीम के रूप मे काम करे।
अंत में एक अपील
प्रिय माता-पिता, आपकी मेहनत अमूल्य है। लेकिन याद रखें – बच्चे को सिर्फ पढ़ाई नहीं, बल्कि प्यार, विश्वास और भावनात्मक ताकत की जरूरत है। विषाक्त व्यवहार छोड़कर सकारात्मक parenting अपनाएं। आपके बच्चे न सिर्फ अच्छे नंबर लाएंगे, बल्कि खुश, आत्मविश्वासी और समाज के लिए उपयोगी नागरिक बनेंगे। आइए, मिलकर हम अपने बच्चों को एक मजबूत, प्यार भरी नींव दें। क्योंकि शिक्षा की असली शुरुआत घर से होती है – और वह घर प्यार से बनता है।
आपका शिक्षा साथी
Vijender Godara
डायरेक्टर
Dayanand School
Nathusari Chopta.
