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इस प्रदेश में पराली से बन रहे कंबल, महिलाओं को मिला नया रोजगार

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इस प्रदेश में पराली से बन रहे कंबल, महिलाओं को मिला नया रोजगार
mahendra india news, new delhi

पराली जलाने से पर्यावरण प्रदूषण बढ़ता है। पराली जलाने से भूमि की उपजाऊ शक्ति भी कमजोर होती है। पराली न जलाकर इस प्रबंधन किया जा सकता है। इसे पशुओं के चारे में भी कई पशुपालक कर रहे तो कई जगह पर पराली से ख्खाद भी बनाई जा रही है। यूपी के एटा में पराली से कंबल भी तैयार किए जा रहे हैं। 


इस बारे में आपको बता दें कि मुख्य विकास अधिकारी डा. नागेंद्र नारायण मिश्र मलावन गौशाला में अवलोकन के लिए पहुंचे। क्षेत्र में धान की खेती और पराली की अधिकता को देखते हुए, सर्दी के मौसम में पशुओं को बचाने के लिए पराली से कंबल बनाने का सुझाव सामने आया। 

इसके बाद इस पहल को जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी नीतू देवी ने जिम्मेवारी संभाली। शुरुआत में गौशाला में मौजूद करीब 450 पशुओं के लिए कंबल तैयार किए गए। यह काम बहुत ही सरल था, लागत करीबन जीरा के बराबर। पराली मुफ्त में उपलब्ध हो गई और जूट के निष्प्रयोज्य बोरे बाजार से जुटा लिए गए। इसके बाद पर कंबल बनाए गए, बाद में इसे समूह की नियमित आजीविका का माध्यम बना लिया गया।

परियोजना की कामयाबी देकर एरिया के ओम साईं और परी महिला स्वयं सहायता समूह की महिलाएं भी इससे जुड़ गईं। पराली से बने कंबलों का प्रचार प्रसार बढऩे लगा। इसके बाद तो जिले की अन्य गोशालाओं और निजी पशुशालाओं से भी आर्डर मिलने लगे। इस अनोखाी पहल का प्रशासनिक स्तर पर पहल को प्रोत्साहन मिलने के बाद अलीगढ़ और हाथरस तक से मांग शुरू हो गई।

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महिला नीतू देवी ने बताया कि पहले ही सीजन में बिना लागत के इस कार्य से प्रत्येक महिला को 7 से आठ हजार रुपये प्रतिमाह की औसत आय हुई। वक्त कम होने के बावजूद इस वर्ष 8 से दस हजार कंबल तैयार होने का अनुमान है। अगले वर्ष इस पहल को और व्यापक स्तर पर ले जाने की तैयारी है।


राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन की ब्लाक समन्वयक वीना शर्मा ने बताया कि स्वयं सहायता समूह पहले से गोबर से काष्ठ निर्माण जैसे पर्यावरण हितैषी कार्य कर रहा है। पराली से कंबल निर्माण ने न सिर्फ आमदनी बढ़ाई है, बल्कि पराली जलाने की समस्या के समाधान में भी योगदान दिया है।