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मोडिया खेड़ा के सरपंच मनीराम घोटिया का निधन, विभाजन का दर्द, संघर्ष भरा जीवन और समाजसेवा की मिसाल

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Death of Modia Kheda Sarpanch Maniram Ghotia, an example of the pain of partition, a life full of struggle and social service

Mahendra india news, new delhi
सिरसा। गांव मोडिया खेड़ा और रंगड़ी खेड़ा में आज शोक की लहर है। एक ऐसा शख्स जो विभाजन के दर्द से गुजरा, मेहनत से खेती-बाड़ी संभाली, प्रोग्रेसिव फार्मर का अवॉर्ड जीता, अमेरिका-ईरान तक की सैर की, सरपंच बना और समाज में इतना मान-सम्मान कमाया कि आज भी लोग उनके नाम से रोमांचित हो जाते हैं। वह महान व्यक्तित्व मनीराम घोटिया अब इस दुनिया में नहीं रहे। उनकी उम्र 90 साल थी।


मनीराम जी का जन्म 1935 में हुआ था। उस वक्त पाकिस्तान के गांव 84 चक जिला मिंटगुमरी तहसील में हुआ। उनके पिताजी फौज में थे, इसलिए परिवार वहां बसा हुआ था। तीन भाई और बहनें थी। पढ़ाई सिर्फ पांचवीं तक पाकिस्तान में हुई। फिर आया वो काला दिन, 1947 में देश का बंटवारा हुआ। हिंदुस्तान-पाकिस्तान अलग हुए तो लाखों परिवारों की तरह घोटिया परिवार भी सब कुछ छोडक़र भारत आया। उनके दादा जी की पुरानी जमीन सिरसा जिला के मोडिया खेड़ा में थी। पाकिस्तान वाली रंगड़ी खेड़ा की जमीन के बदले में यहां जमीन मिली। यही वो जगह बनी जहां परिवार ने नई शुरुआत की। 1948 में मनीराम व  बड़े भाई धर्मपाल की शादी गांव बकरियांवाली के जाखड़ परिवार में हुई। हिंदुस्तान आने के बाद पढ़ाई फिर शुरू की। सिरसा के आर्य स्कूल में दाखिला लिया और पूरी पढ़ाई यहीं पूरी की। 1962 में मोडिया खेड़ा से रंगड़ी खेड़ा वाली जमीन पर शिफ्ट हो गए और खेती-बाड़ी संभाल ली। परिवार में तीन बेटे रणधीर सिंह, विजय सिंह, ओमप्रकाश और तीन बेटियां बिमला, उर्मिला, संतोष थे। पूरा परिवार मेहनत से खेती में जुट गया।
 

प्रोग्रेसिव फार्मर का अवॉर्ड:
1972 में मनीराम को बड़ा सम्मान प्रोग्रेसिव फार्मर का अवॉर्ड मिला। भारत सरकार ने उन्हें अमेरिका भेजा, जहां उन्होंने वहां की आधुनिक खेती की तकनीक सीखी। 1977 में फिर विदेश यात्रा का मौका मिला। इस बार ईरान, इराक, लेबनान, दुबई जैसे कई देशों की सैर की और वहां दो साल तक रहे। इन यात्राओं ने उन्हें नई सोच दी, गांव में कई बदलाव लाए।

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1984 में हुआ बंटवारा:
1984 में दोनों भाइयों मनीराम और रामप्रताप के बीच जमीन का बंटवारा हुआ। मनीराम को मोडिया खेड़ा का हिस्सा मिला और रामप्रताप को रंगड़ी खेड़ा। मनीराम का परिवार मोडिया खेड़ा में बस गया।


1987 में गांव रंगड़ी खेड़ा के लोगों ने इतना मान-सम्मान दिया कि मोडिया खेड़ा रहते हुए भी उन्हें सरपंच चुन लिया। पूरे पांच साल उन्होंने बखूबी सेवा की। सडक़ें, पानी, स्कूल, मंदिर-गुरूद्वारा सबकी चिंता की। लोग आज भी कहते हैं कि मनीराम सरपंच ने गांव को नया रूप दिया। सरपंच बनने के बाद भी उन्होंने 15 साल तक कपड़े की दुकान का कारोबार चलाया। पोतों-पोतियों को जीप पर स्कूल छोडऩे जाते, साथ में दुकान भी संभालते, लेकिन असली पहचान बनी सामाजिक कामों से। आस-पास के गांवों में हर शादी-जन्मदिन, हर समस्या में उनका नाम सबसे आगे रहता। हर समाज से जुड़े, सबके साथ भाईचारा रखा। उनकी लोकप्रियता ऐसी थी कि आज भी लोग कहते हैं मनीराम जैसे लोग अब पैदा नहीं होते।


2025 में रंगड़ी खेड़ा में रामलीला का आयोजन हुआ। गांव वालों ने फैसला किया कि उद्घाटन पहले सरपंच मनीराम से ही करवाना है। उन्होंने कहा कि वास्थ्य ठीक नहीं है, लेकिन लोग नहीं माने। बोले, आपके बिना नहीं चलेगा। आखिरकार उन्होंने हाजिरी दी। समापन समारोह में भी बुलाया गया और वे गए। यह उनकी लोकप्रियता की जीती-जागती मिसाल थी।

आखिरी दिनों में भी वही पुरानी आदतें। एक दिन शाम को खाना नहीं खाया। बोले, कि आज भूख नहीं लग रही। रात भर आराम से सोए। सुबह 7 बजे परमात्मा ने बुलावा दे दिया। पूरा गांव रो पड़ा। मनीराम घोटिया एक सच्चे योद्धा थे। विभाजन के दर्द से निकले, मेहनत से ऊंचा उठे, सम्मान कमाया और समाज को जोड़ा। उनके जाने से मोडिया खेड़ा और रंगड़ी खेड़ा में शोक का माहौल है। हजारों लोग अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे। उनका नाम हमेशा याद रहेगा, एक सच्चे सरपंच, किसान, समाजसेवी के रूप में।