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स्वयं के दोषों पर पी एच डी करें, तभी विद्यार्थी उन्नत बन पाएंगे

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Do a PhD on your own flaws, only then will students be able to progress

mahendra india news, new delhi

लेखक
नरेंद्र यादव 
नेशनल वाटर अवॉर्डी
यूथ एंपावरमेंट मेंटर
जब हम किसी विषय को जानने के लिए अलग अलग शिक्षण संस्थानों के माध्यम से उन विषयों पर शोध करते है,  विभिन्न डिग्रियां हासिल करते है, लेकिन फिर भी जीवन में संतुष्टि नहीं मिलती है। जीवन में संतोष भीतर के निर्मोह से मिलता है जितनी भी गलतियां हम अपने जीवन में करते है, वो पहले हमारे भीतर पलती है और फिर उसको हम अपने व्यवहार में उतारते है, ताकि किसी दूसरे को अपमानित किया जा सकें, किसी दूसरे को पीड़ित किया जा सकें, तथा अपनी इगो को संतुष्ट किया जा सकें।

जब कोई भी व्यक्ति खुद को आत्मबल से भरना चाहता है तो उसे अपने दोषों को पहले तो अपने भीतर खोजना पड़ेगा, जो हमारे अंदर पलता है उसी का रिफलेक्शन बाहर दिखाया जाता है। ह्यूमन डेवलपमेंट की बात जब भी होती है तो दो आधार हमारे सामने होते है, पहला अपनी सभी बुराइयों को खोजना, उन्हें सूचीबद्ध करना, फिर उनसे निजात पाने के लिए उन पर प्रहार किया जाएं, दूसरा आधार है कि जब भी हम अपने अवगुणों से छुटकारा चाहते है तो उनके स्थान पर गुणों का विकल्प देना पड़ता है। हम अधिकतर लोग ये तो कहते है कि ऐसे बनो वैसे बनो , लेकिन उनके सामने गतिविधियों का विकल्प नहीं दे पाते है।

शरीर काम मांगता है, मस्तिष्क को कुछ सोचने के लिए चाहिए, मन को व्यस्तता चाहिए, चाहे जो भी हो मन को चलते रहना है, इसलिए शरीर के लिए कुछ करने के लिए चाहिए, जैसे व्यायाम, दौड़ना भागना, कुछ घरेलू जिम्मेदारियां, कुछ सामाजिक जिम्मेदारियां ,हर व्यक्ति के पास सदैव होनी चाहिए, जिससे व्यस्त रह सकें। इसी प्रकार मस्तिष्क के पास पढ़ने लिखने के लिए कुछ लक्ष्य होने चाहिए, हर दिन के लिए तीन से चार घंटे अगर पढ़ने का उद्वेश्य हो तो मस्तिष्क को बुराइयों की तरफ जाने से रोका जा सकता है। मन तो बड़ा ही विचित्र है, उसे भटकने से रोकने के लिए हमारे पास सुबह उठने से लेकर रात सोने तक का एजेंडा होना चाहिए तभी उसे नेगेटिविटी की ओर जाने से रोकने में कामयाबी मिलती है। हमारे यहां एक कहावत है कि खाली दिमाग शैतान का घर अर्थात दिमाग जैसे ही खाली रहता है वैसे ही वो दोषों की ओर बढ़ता है। किसी भी व्यक्ति को चाहे वो कितना ही बुद्धिमान हो,

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उन्हें अपने दोष दिखते नहीं है, हां अपनी अच्छाई सभी को बहुत अच्छी तरह से दिखाई देती है, जिनका बखान व्यक्ति खुद भी करता है और दूसरों से भी सुनने में उन्हें आनंद का अनुभव होता है। बुराई को न तो व्यक्ति खुद देखता है और न ही दूसरे से सुनना चाहता है, बस यही कारण है जिससे बुराइयों को आगे बढ़ने में मदद मिलती है, इसके साथ ही समाज व राष्ट्र में चाटुकार लोगों की भरमार होती है, जिनके कारण अच्छे, सभ्य, कर्मठ, ईमानदार, तथा विवेकशील लोगों के अवसर मारे जाते है। जब समाज में लोग बुराइयों को पालना शुरू कर देते है, फिर कबीर जी का वो दोहा ,

जिसमें उन्होंने कहा था, कि " निंदक नियरे राखिए आंगन कुटी छवाय, बिन पानी साबुन बिना निर्मल करे सुभाय"।। उसकी सार्थकता खत्म हो जाती है। कबीर के दोहे के अनुसार अगर हमे अपनी बुराइयों को समझना है दोषों को समझना है, उनसे छुटकारा पाना है तो क्रिटिक्स को सम्मान देना होगा। कैसी विडंबना है कि हर मातापिता अपने बच्चों के लिए क्रिटिक्स के रूप में हमेशा उनके साथ खड़े रहते है, वो निंदक वाली भूमिका में कार्य करते है, या कुंभकार वाली भूमिका में सदैव उनके साथ खड़े रहते है जिसमें वो बाहर से थपकी देते है और भीतर से सहारा भी देते है,

लेकिन वही मातापिता खुद की बुराई खोजने में क्यों फेल हो जाते है, अगर कोई दूसरा बताएं तो भी कष्ट क्यों होता है, वह निंदक वह क्रिटिक्स क्यों दुश्मन दिखाई देने लगते है। जब हम बच्चों की हर कमी पर फोकस करते है और उन्हें उन दोषों से बचने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते है तो, फिर अपने भीतर की कमी को दूर करने की जिम्मेदारी किसी को तो देनी चाहिए। खैर हो सकता है कि क्रिटिक्स हर समय सही से आंकलन न कर पाते हो, कभी कभी ईर्ष्या वश वो हतोत्साहित करने के लिए भी दूसरों की कमियां निकालने का कार्य करते है। यहां हर विद्यार्थी को अपना खुद का आंकलन ऐसे करना चाहिए, जैसे हम अपने दोषों पर शोध कर रहे हो, जैसे विद्यार्थी अपने एक एक दोष को बाहर निकालने के लिए खोजबीन कर रहे हो।

यह तब ही संभव है, जब हम अपने दोषों को स्वीकार करने के लिए आगे आएं, ऐसे ही जैसे अपनी बड़ाई सुनने के लिए लालायित रहते है, वैसे ही बुराइयों को भी सुनने के लिए न केवल गंभीर रहें, बल्कि उन्हें खुशी खुशी स्वीकार भी करें, बताने वाले चाहे कोई भी हो, तभी हम या कोई भी विद्यार्थी उन्हें दूर करने के लिए तैयार होंगे। इस समाज में जितने भी चाटुकार हुए है, जितने भी भ्रम फैलाने वाले हुए है, उनको ऐसे लोगों से ही पौषण मिलता है जो अपनी बुराइयों को देखना ही नहीं चाहते है, वो खुद को संपूर्ण परमात्मा मानते है, वो खुद को ही ईश्वर स्वरूप मानने लगते है। यह सोच न केवल उन्हें कमजोर करती है, बल्कि राष्ट्र समाज को भी कमजोर करने का कार्य करती है, क्योंकि ऐसे में कर्मठता, सत्य, ईमानदारी, स्वाभिमान पीछे चले जाते है और अकर्मण्यता, बेईमानी, झूठ, चोरी, निर्लज्जता आगे खड़ी हो जाती है, जो हमारे नैतिक मूल्यों का कत्ल कर देती है, मानव मूल्यों का हनन होता है। जब एक बार अनैतिकता का पौषण होने लगता है तो पूरा समाज उसी ओर बढ़ने लगता है,

जिसकी भरपाई शायद बहुत समय तक नहीं हो पाती है। ऐसी परिस्थिति में सबसे बड़े दोषी वो लोग होते है जो सब कुछ देखते हुए भी, सब प्रकार से सम्पन्न होते हुए भी, सब प्रकार से सक्षम होते हुए भी कुछ नहीं बोलते है और निर्लज्जता से अपनी मूक स्वीकृति देने का कार्य करते है, जैसे उनके भीतर ये भाव हो कि हमे क्या लेना देना है या फिर छोटे से तुच्छ से लाभ के लिए राष्ट्र समाज का बहुमूल्य नुकसान कर देते है। सक्षम लोग, सम्पन्न लोग भी उसी चाटुकारिता के हिस्से बन जाए तो फिर जो बेचारे सिर्फ रोजी रोटी को तरसते है वो तो क्या ही कर पाएंगे। अगर राष्ट्र को आगे बढ़ाना है तो हर विद्यार्थी की ये जवाबदेही उठानी होगी,  कि वो खुद को सशक्त बनाए, यह सशक्तिकरण केवल गुणों से ही संभव हो पाएगा। अपने दोषों को हर दिन देखें, उनकी लिस्ट बनाएं, उन्हें दूर करने के लिए अपने एडवाइजर से सलाह लें, ताकि उन्हें बाहर किया जा सकें। अपनी बुराइयों की थीसिस तैयार करें,

उनको बार बार फोकस करें, उन बुराइयों को बार बार पढ़े। एक बार सूचीबद्ध होने के बाद, उन दोषों को एक एक कर बाहर निकालने के लिए उनके स्थान पर एक एक गुण रखते जाए। शरीर, मन , मस्तिष्क को व्यस्त रखने के लिए कार्यों का लक्ष्य बनाए, ताकि जीवन को एक नई राह मिल सकें। थीसिस बनाना बहुत कठिन कार्य है क्योंकि उसके लिए अपने मन को तैयार करने की जरूरत होती है, जो अधिकतर अपनी ही बुराइयों को देखने के लिए तैयार ही नहीं होता है,

अगर बुराइयों की थीसिस बन भी जाएं तो उन्हें बाहर निकालना एक बड़ी मुसीबत है, अगर बाहर निकालने का मन बन भी जाए तो उन्हें भविष्य में भी दूर रखने का प्लान मुश्किल होता है, क्योंकि मन अपनी पुरानी लाइन को छोड़ना नहीं चाहता है। जीवन एक अभ्यास की तरह है, रोज रोज लैब में नए प्रैक्टिकल करने पड़ते है, रोज रोज नए दोष सामने आते है, रोज रोज नई विकृतियां आती रहती है, जिन से सावधान रहना पड़ता है,

मन को अपनी बुराई ढूंढने की बजाय अच्छाई ढूंढना आसान लगता है, इसलिए खुद के दोषों पर पी एच डी करना बड़ा मुश्किल कार्य है, हां अगर किसी दूसरे के दोषों पर शोध करना हो तो शायद वो बहुत आसान होगा, एक थीसिस नहीं दस थीसिस लिखी जा सकती है। लेकिन जीवन तभी राष्ट्र या समाज उपयोगी बनेगा, जब हर विद्यार्थी खुद को गुणों से सशक्त करने का मन बनाएगा। सभी विद्यार्थियों को गलतियां स्वीकार करने तथा उन्हें सुधारने का संकल्प लेना चाहिए और अपने राह खुद बनाने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए, ताकि कोई भ्रमित न कर सकें।
जय हिंद, वंदे मातरम