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विश्वविद्यालयों के प्रतिष्ठित विद्वानों ने भारतीय भाषाओं की सांस्कृतिक जड़ों, उनकी संरचना और वैश्विक परिप्रेक्ष्य में बढ़ते महत्व पर विस्तृत विमर्श प्रस्तुत किया

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Eminent scholars from universities presented detailed discussions on the cultural roots of Indian languages, their structure and their growing importance in the global perspective

Mahendra india news, new delhi
 चौधरी देवीलाल विश्वविद्यालय, सिरसा में भारतीय भाषा समिति, भारत सरकार के सहयोग से मानविकी संकाय द्वारा आयोजित दो दिवसीय भारतीय भाषा परिवार सम्मेलन के अंतर्गत आयोजित तकनीकी सत्र में विभिन्न विश्वविद्यालयों के प्रतिष्ठित विद्वानों ने भारतीय भाषाओं की सांस्कृतिक जड़ों, उनकी संरचना और वैश्विक परिप्रेक्ष्य में बढ़ते महत्व पर विस्तृत विमर्श प्रस्तुत किया।


गुरु गोबिंद सिंह इंद्रप्रस्थ विश्वविद्यालय, दिल्ली के अंग्रेजी विभाग के विद्वान प्रो. नरेश वत्स ने भारतीय भाषाओं की संरचना, शब्द-संपदा और सांस्कृतिक महत्व पर विशेष व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि मानव सभ्यता का मूलाधार है। प्रत्येक शब्द में समय, समाज और परंपराओं का इतिहास समाहित होता है। उन्होंने कहा कि अच्छे शब्द व्यक्ति और समाज दोनों की मानसिकता को दिशा देते हैं।

भाषा मनुष्य में संस्कार उत्पन्न करती है, इसलिए शब्दों का चयन अत्यंत संवेदनशीलता के साथ होना चाहिए। उन्होंने बताया कि हर शब्द के अनेक अर्थ होते हैं, और भाषा एक जीवंत सत्ता की तरह समय के साथ बदलती, विस्तृत होती और नए शब्दों को अपनाती रहती है। किसी समाज में शब्दों का महत्व घटने लगता है, तो सांस्कृतिक क्षरण आरंभ हो जाता है।
प्रो. वत्स ने भारतीय भाषाओं में अर्थ-विस्तार, ध्वनि-विज्ञान, शब्द-विकास और भाषाई लचीलेपन पर उदाहरणों सहित विस्तृत चर्चा की। उनके अनुसार मनुष्य वही सोच सकता है जिस भाषा में उसकी चेतना की जड़ें होती हैं, इसलिए मातृभाषा हमारे विचार, दृष्टि और ज्ञान का मूल आधार है।

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इससे पूर्व केंद्रीय विश्वविद्यालय हरियाणा के प्रख्यात विद्वान प्रो. बीर पाल सिंह यादव ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय भाषाएँ मात्र संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय चिंतन, आचार, संस्कृति और व्यवहारिक ज्ञान की संवाहक हैं। भारतेंदु हरिश्चंद्र का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि निज भाषा उन्नति का मूल है, किंतु आधुनिक जीवनशैली के प्रभाव ने हमें अपनी ही भाषाओं और देशज शब्दों से दूर कर दिया है। उन्होंने कहा कि जब विश्व में पेडागोजी का स्वरूप भी विकसित नहीं हुआ था, तब भारत में पंचतंत्र जैसी ज्ञान परंपरा मानव शिक्षा का वैश्विक मॉडल तैयार कर चुकी थी। हरियाणा की कृषि-प्रधान संस्कृति के अनेक देशज शब्द अब लुप्त होते जा रहे हैं।


प्रो. यादव ने भारत की विविध भौगोलिक संरचना पठार, पर्वत, नदियों, समुद्र तट और विविध जलवायु को भारत की सांस्कृतिक शक्ति बताया। उन्होंने कहा कि हिंदी सदियों से विभिन्न भाषाओं को जोड़ने वाली महानदी की भूमिका निभाती आई है। कबीर, रहीम और तुलसीदास जैसे संत ज्ञानियों की परंपरा को ज्ञानाश्रम बताते हुए उन्होंने कहा कि वे केवल भाषा नहीं, भाव के अनुवाद के भी आचार्य थे।

उन्होंने वसुधैव कुटुंबकम् और उदार चैतन्य को भारतीय मनीषा का मूल स्वर बताते हुए चेताया कि भाषा और संस्कृति से दूरी किसी भी समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने कोविड-19 महामारी का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत के श्रमशील वर्ग ने बिना वैज्ञानिक उपकरणों के भी अनुशासन और धैर्य का जो परिचय दिया, वह भारतीय सभ्यतागत चेतना की अनुपम शक्ति को प्रमाणित करता है।


सत्र के दूसरे भाग में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के वरिष्ठ आचार्य प्रो. रामचंद्र ने कहा कि वेद सार्वभौमिक और सर्वकालिक हैं। उन्होंने कहा कि संस्कृत को कठिन समझना एक भ्रांति है; यह उतनी ही सहज, वैज्ञानिक और क्रमबद्ध भाषा है जितनी शीघ्र कोई मनुष्य सीख सकता है। प्रो. रामचंद्र ने पाणिनी की अष्टाध्यायी को मानव बुद्धि का अपूर्व चमत्कार बताया और कहा कि उसका संरचनात्मक व्याकरण आज भी आधुनिक प्रौद्योगिकी तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित भाषा-प्रणालियों के लिए आधार-प्रेरणा है। उन्होंने सावधान किया कि यदि एआई मनुष्य की स्वाभाविक चिंतन-क्षमता को कम करे और स्वयं की बढ़ाए, तो यह समाज के लिए लाभकारी नहीं होगा। इस अवसर पर कुलसचिव डॉ सुनील कुमार, मानविकी संकाय के डीन प्रो. पंकज शर्मा, संयोजक प्रो. अनु शुक्ला सहित विभिन्न शिक्षाविद उपस्थित रहे।

 

पंजाबी विश्वविद्यालय पटियाला के रिटायर्ड प्रो. जोगा सिंह विर्क ने अपने संबोधन में पंजाबी भाषा की सांस्कृतिक गहराई, भाव-विस्तार और लोक-मूल्यों पर केंद्रित दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि पंजाबी केवल बोलचाल की भाषा नहीं, बल्कि जीवन-शक्ति और लोक-चेतना को अभिव्यक्त करने वाली भाषा है। गुरबाणी, लोकगीतों, किस्सागोई परंपरा और पंजाबी साहित्य ने भारतीय भाषाई विरासत को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि पंजाबी भाषा की सबसे बड़ी ताकत उसकी अपनत्व भरी ध्वनियाँ और सरल अभिव्यक्ति है, जो मनुष्य की संवेदनाओं को सीधा स्पर्श करती हैं।


प्रो. विर्क ने इस बात पर बल दिया कि पंजाबी, हिंदी, संस्कृत और अन्य भारतीय भाषाएँ एक ही सांस्कृतिक जड़ से उपजती हैं, और भारतीय भाषाओं का भविष्य तभी सुरक्षित रहेगा जब हम भाषाई विविधता का सम्मान करें और इसे शिक्षा व शोध में बढ़ावा दें। उन्होंने कहा कि भाषा का अस्तित्व केवल शब्दों में नहीं, बल्कि बोलने वाले समुदाय की संस्कृति, लोक-स्मृति और जीवन-दर्शन में बसता है। इसलिए क्षेत्रीय भाषाओं का संरक्षण राष्ट्रीय एकता को मजबूत करता है।
इस तकनीकी सत्र की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. विजय कुमार ने की और कहा कि मानविकी संकाय द्वारा भाषा सम्मेलन का आयोजन करके एक अच्छी पहल की गई है। भाषा की सम्पनता एवं संस्कृति के रख-रखाव में यह सम्मेलन मील का पत्थर साबित होगा।