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Good rice yield : धान की अच्छी पैदावार के लिए अभी से करें तैयारी, कृषि वैज्ञानिक ने बताई बड़े काम की बात, होगा बंपर उत्पादन

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mahendra india news, new delhi

कुछ ही दिनों में मानसून की बरसात शुरू हो जाएगी। मानसून की बरसात के सीजन में अनेक प्रदेशों में धान की रोपाई का कार्य तेजी से शुरू हो जाता है। वैसे देखे तो खरीफ की फसल खासकर धान की अच्छी पैदावार के लिए समय रहते खेत की तैयारी, उन्नत बीजों का चयन और मिट्टी की उर्वरता बनाए रखना बेहद जरूरी है। 

इसी को लेकर वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डा. देवेंद्र सिंह जाख्खड़ ने किसानों को महत्वपूर्ण सुझाव दिए. उन्होंने बताया कि कैसे गर्मी के इस दौर खासकर नौतपा का फायदा उठाकर खेत की तैयारी की जा सकती है और किस प्रकार उर्वरक और बीजों का प्रबंध पहले से कर लेने से किसान समय पर नर्सरी की बुवाई कर सकते हैं, डा. जाखड़ ने जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए सनई-ढैंचा जैसे हरित खाद के प्रयोग की भी सिफारिश की, जिससे रासायनिक खाद की आवश्यकता कम होगी और जमीन की उर्वरता बनी रहेगी.
डॉ दिनेश पांडे ने बताया कि नौतपा के दौरान जब गर्मी चरम पर होती है, उस वक्त खेत की जुताई बेहद फायदेमंद होती है. जो किसान अब तक जुताई नहीं कर पाए हैं, वे जल्द से जल्द यह कार्य पूर्ण कर लें. गर्मी में जुताई करने से खेत में मौजूद खरपतवार, कीट-पतंगे और उनके अंडे नष्ट हो जाते हैं, जिससे फसल को नुकसान नहीं होगा और उत्पादन में बढ़ोतरी होगी.


जमीन की गुणवत्ता के अनुसार करें फसल का चयन
वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डा. देवेंद्र सिंह जाख्खड़ ने कहा कि किसानों को अपनी भूमि की प्रकृति पहचाननी चाहिए. यदि जमीन ऊंची है, तो वहां धान की खेती से बचें और दलहन या तिलहन की फसल लगाएं. इन फसलों को कम पानी की आवश्यकता होती है और अच्छी पैदावार भी देती हैं. वहीं मध्यम और निचली जमीनों में किसान मध्यम और अधिक अवधि वाली धान की किस्में उगा सकते हैं.

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उन्नत बीज और खाद की समय से करें व्यवस्था
वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डा. देवेंद्र सिंह जाख्खड़ ने बताया कि खरीफ सीजन की शुरुआत से पहले ही किसान उन्नत किस्म के बीज और खाद की व्यवस्था कर लें. इससे नर्सरी लगाने और धान की बुवाई में किसी प्रकार की देरी नहीं होगी. डॉ पांडे ने विशेष रूप से सलाह दी कि मानसून आने से पहले यह तैयारियां पूरी हो जानी चाहिए.


जैविक खेती को बढ़ावा दें
वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डा. देवेंद्र सिंह जाख्खड़ ने ये भी बताया कि रासायनिक खाद की जरूरत को कम करने और मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को बनाए रखने के लिए डॉ पांडे ने सनई और ढैंचा जैसे ग्रीन मैन्योर (हरित खाद) के इस्तेमाल की सिफारिश की. ग्रीष्मकालीन जुताई के दौरान इनका बीज खेतों में डालने से भूमि की उर्वरता बनी रहती है और रासायनिक खाद पर निर्भरता घटती है. इससे लंबे समय तक अच्छी उपज ली जा सकती है। 

कृषि वैज्ञानिक की अपील
अंत में वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डा. देवेंद्र सिंह जाख्खड़ ने किसानों से अपील की कि वे समय रहते खेती की तैयारी कर लें और प्राकृतिक संसाधनों का अधिकतम उपयोग करें. जैविक विधियों को अपनाकर खेती को लाभदायक और पर्यावरण के अनुकूल बनाएं.