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मकर संक्रांति एक शुभ अवसर है, इस पर युवा अपनी ऊर्जा को नकारात्मकता से पॉजिटिविटी की ओर जाने का संकल्प लें

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Makar Sankranti is an auspicious occasion; on this occasion, youth should resolve to channelize their energy from negativity to positivity

mahendra india news, new delhi
लेखक
नरेंद्र यादव
नेशनल वाटर अवॉर्डी
यूथ एंपावरमेंट मेंटर
भारतीय संस्कृति पर बिना वजह की बहस करने से अच्छा है कि हम उसे खुद के बदलाव के लिए एक शुभ अवसर माने तथा जीवन को पॉजिटिव ऊर्जा से जोड़ने का प्रण लें। हमारी संस्कृति व जीवनशैली में जितने भी पर्व आते है वो हमारे जीवन में नए मोड की तरह होते है, वो नए दीपस्तंभ की तरह होते है, जिसके पॉजिटिव उपयोग से आगे कुछ नया और अच्छा करने का संकल्प देते है। वैसे तो हर मास संक्रांति आती है, जिसे उस मास के नाम से जोड़कर पुकारा जाता है, जैसे मेष संक्रांति, वृष संक्रांति, मिथुन संक्रांति, कर्क संक्रांति, सिंह संक्रांति, कन्या संक्रांति, तुला संक्रांति, वृश्चिक संक्रांति, धनु संक्रांति, मकर संक्रांति, कुंभ संक्रांति और मीन संक्रांति, लेकिन इनमें सबसे महत्वपूर्ण मकर संक्रांति को माना जाता है, क्योंकि उस दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, जिसे कई राज्यों में उत्तरायण उत्सव भी कहा जाता है। यहां यह अवगत कराना भी आवश्यक है कि भारत भूमि उत्तरी गोलार्ध में आती है, इसीलिए सूर्य का उत्तरी ओर गमन करने की शुरुआत ही हमारे लिए शुभ अवसर है।

संक्रांति संस्कृत की दो धातुओं से बनता है एक तो सम धातु जिसका अर्थ शुभ या अच्छा होता है, दूसरा क्रमण धातु, जिसका अर्थ चलना, या प्रवेश करना होता है। इसलिए संक्रांति से तात्पर्य है कि सूर्य का मकर राशि में प्रवेश करना, अर्थात सूर्य अपने उत्तर के रास्ते पर आना, जिसे हम भारतीय संस्कृति में उत्तरायण भी कहते है। यह उत्तरायण या संक्रांति सूर्य का उत्सव है, जिसे हम ज्ञान का उत्सव भी कहते है क्योंकि श्रीमद्भगवद् गीता के दसवें अध्याय के 21 वे श्लोक में श्रीकृष्ण जी महाराज ने कहा है कि " आदित्यनामहम विष्णुज्योतिरतीसाम रविरंशुमान।

मरिचिर्रुतामसमी नक्षत्रन्माहं शशि।।" अर्थात अदिति के बारह पुत्रों में मै विष्णु हूं, ज्योतियों में किरणयुक्त सूर्य हूँ, मै उन्चास वायुदेवताओं का तेज हूं  और नक्षत्रों का अधिपति चंद्रमा हूँ। भगवान श्रीकृष्ण जी ने कहा है कि मैं सभी ज्योतियों में सूर्य हूँ अर्थात ज्ञान के लिहाज से व श्रीभगवान के अनुसार ज्योतियों में सूर्य श्रेष्ठ है। जब सूर्य ईश्वर के समान है क्योंकि यह हम प्राणी मात्र को, वनस्पति जगत को, अन्य स्थूल पदार्थों को जीवन देने का कार्य करता है, इसकी रौशनी से हमारे जीवन में ज्ञान आता है। जब सूर्य,  देवता की तरह हमारे जीवन को पोषित करते है तो उसकी हर चाल हमारे जीवन के लिए महत्वपूर्ण है। मकर संक्रांति के दिन से सूर्य उत्तरायण में गमन करता है

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और हमारे सोलर सिस्टम में इसी से दिन बड़े होते है तथा रात्रि छोटी होनी शुरू होती है। वैसे तो भारतीय पंचांग लूनर पद्धति पर आधारित होता है, क्योंकि जो तिथियां है उनका आधार चंद्रमा ही होता है, लेकिन संक्रांति का पर्व सूर्य का पर्व है, ज्ञान का पर्व है। उत्तरायण में जब सूर्य का गमन होता है तो सूर्य की रौशनी भारत भूमि पर अधिक होती है,  यह शिशिर, वसंत तथा ग्रीष्म ऋतु में आता है, जो हमारे सभी कार्यों के लिए महत्वपूर्ण होते है। वैसे सनातन संस्कृति में इसे देवताओं के दिन की शुरुआत तथा कर्क संक्रांति पर देवताओं की रात्रि का आरंभ माना जाता है। इसका अर्थ हुआ कि इस समय में देवता अर्थात देने वाले जागरण अवस्था में होते है, और कर्क संक्रांति से देवताओं की रात्रि का आरंभ होने के कारण देवता निद्रा की अवस्था में चले जाते है।

अगर हम इसे साइंस ऑफ सिंबल की दृष्टि से देखें तो ये हमारे जीवन के लिए महत्वपूर्ण प्रतीक है कि हम इस प्रतीक को समझकर अपने जीवन को उसी के अनुसार जीएं। यहां सिंबल यह है कि पहले वर्षा ऋतु का समय अधिक होता था, इसलिए दक्षिणायन का अधिकतर समय वर्षा ऋतु में ही निकल जाता था और सूर्य भगवान की रौशनी उतनी प्रभावी नहीं रहती थी। उत्तरायण का समय शुभ इसलिए माना जाता था क्योंकि हमारी अधिकतर फसल इस समय में होती थी। जलवायु परिवर्तन होने से वर्तमान समय में तो वर्षा ऋतु का समय कम हो गया है,

जिसके कारण  अब बरसात का उतना प्रभाव नहीं रहा है। बरसात के कारण खेती पर असर पड़ता था, लोगों के व्यवसाय पर असर पड़ता था, हमारे भवन निर्माण से संबंधित सामग्री तैयार नहीं हो पाती थी, मिट्टी के बर्तन नहीं बन पाते थे, और एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक दृष्टिकोण ये था कि वर्षा ऋतु का समय अधिक होने के कारण जो लोग इस दक्षिणायन काल में मृत्यु को प्राप्त होते थे, उनकी अंत्येष्टि में भी कठिनाई होती थी। लोगों के कार्य बंद हो जाते थे, इससे तो आमदनी भी कम होती थी। इसलिए भी हम अपने शुभ कार्य करने में समर्थ नहीं रहते थे।

अगर सब कुछ को हम छोड़ भी दें तो यह पर्व हमारी युवा पीढ़ी को सीखने का अवसर प्रदान करती है, अपने नए संकल्प के लिए एक नया मौका देता है। सूर्य का प्रकाश ज्ञान प्राप्त करने की ओर अग्रसर करता है। अगर मैं सीधे शब्दों में कहूं तो सूर्य दक्षिण से उत्तर की ओर गमन करना शुरू करता है। सभी युवा आज संक्रांति के पावन अवसर पर एक संकल्प जरूर लें कि हम आज से अपने समय का सदुपयोग करेंगे तथा अपनी संपूर्ण ऊर्जा को अपने सकारात्मक कार्यों में उपयोग करेंगे, ताकि जीवन में सदैव खुशी रहे, आनंद रहे।
जय हिंद, वंदे मातरम