भारतीय थल सेना दिवस के उपलक्ष्य पर युवाओं को थल सेना तथा विवेकानंद द्वारा दिए एकीकरण के संदेश को समझना चाहिए
mahendra india news, new delhi
लेखक
नरेंद्र यादव
नेशनल वाटर अवॉर्डी
यूथ एंपावरमेंट मेंटर
15 जनवरी का दिन भारतीय थल सेना दिवस के रूप में हम सभी भारतीयों के लिए गौरव का दिन हैं, यहां युवाओं को थल सेना दिवस के महत्व को जानना और 15 जनवरी को ही यह दिवस क्यों मनाया जाता हैं, तथा भारतीय थल सेना हमारे देश की सुरक्षा की रीढ़ के तौर पर हैं, इसका महत्व समझना ये युवाओं के लिए तो समझना बेहद जरूरी हैं। मैं आप सभी युवाओं को ये जानकारी देना चाहता हूं कि 15 जनवरी 1949 को माननीय कोंडडेरा मडप्पा करिअप्पा जी भारतीय थल सेना के जनरल के पद पर तैनात हुए थे,
उसी दिन उन्होंने ब्रिटिशर्स चीफ ऑफ द डिफेंस स्टाफ सर फ्रांसीस बूचर से चीफ ऑफ द डिफेंस स्टाफ का पद भी संभाला था, ये बहुत शुभ दिन था और इसीलिए भारतीय थल सेना द्वारा 15 जनवरी को सेना दिवस के रूप में मनाने का फैसला लिया गया। 1986 में जनरल के एम करिअप्पा जी को फील्ड मार्शल की उपाधि दी गई । भारत में दो ही ऐसे अधिकारी रहे हैं जिन्हे ये उपाधि मिली हैं। युवा साथियों अब हम भारतीय सेना के शौर्य जानने की कोशिश करेंगे, जिससे आप सभी को थल सेना का विशाल एवं विराट रूप दिखाया सा सके।
दोस्तो भारतीय थल सेना का आदर्श वाक्य है " सेवा परमो धर्म: " सर्विस बिफोर सेल्फ अर्थात स्वयं से पहले सेवा। भारतीय सेना विश्व की दूसरी सबसे बड़ी सेनाओं में गिनी जाती हैं। युवा साथियों , स्वामी विवेकानंद जी ने 15 जनवरी 1893 को विश्व धर्म सम्मेलन में अपना जो व्यक्तव दिया था, वो भारतीय सेना की आत्मा से मेल खाता हैं। जैसे भारतीय सेना में भर्ती होने के लिए किसी प्रकार का कोई जातिगत आधार नही होता , कोई धार्मिक आधार नही होता है और सभी के लिए सेवा परमो धर्म: ही ध्येय वाक्य है यानी सर्विस बिफोर सेल्फ, यही तो स्वामी विवेकानंद जी ने 15 जनवरी को अपना व्याख्यान में कहा था।
भले ही सभी धर्म अपने अपने कूप में बैठ कर समझते है कि हम ही सबसे बड़े है, हम ही श्रेष्ठ हैं, हमारा धर्म ही विश्व का सबसे अच्छा धर्म है, इसी को लेकर स्वामी जी ने कुएं के एक मेंढक की कहानी कही थी कि एक बार समंदर का कोई मेंढक बरसात की वजह से कुंए में गिर गया तो एक मेढक पहले से ही कुंए में रहता था, उसने कुएं में आए नए मेढक से आश्चर्य के साथ पूछा कि तुम कहां से आए हो, तो दूसरे ने बताया की मैं समुंद्र से आया हूं, तब कुएं के मेढ़क ने कहा समुंद्र कितना बड़ा होता है और कैसा होता हैं इस पर दूसरे मेंढक ने बताया कि समुंद्र बहुत बड़ा होता है, बहुत विशाल होता है, इसके जबाव में कुएं के मेढ़क ने एक छलांग लगाई और बोला इतना बड़ा , तब समंदर के मेढ़क ने कहा नही बहुत बड़ा ,
फिर कुएं के मेंढक ने दूसरी छलांग के बाद तीसरी लगाई और कहने लगा कि इससे बड़ा तो नही हो सकता परंतु समुंद्र के मेंढक ने कहा , ये तो बहुत छोटा हैं समुंद्र तो अथाह है। यही तो सभी पंथों की स्थिति है कि सब अपने अपने कुएं में बैठ कर, दूसरो को छोटा बता रहे हैं, जबकि सभी एक ही हैं, सब नदी की धारा की तरह है जो अंत में समुंद्र में ही मिलते हैं, जो अंत में सनातन में मिलते है। सभी धर्मो का लक्ष्य एक ही है, ईश्वर की प्राप्ति करना, एक ओंकार, आल्हा, गॉड की प्राप्ति करना। परंतु हम सभी असहिष्णु हैं,
एक दूसरे को भिन्न दिखाने का प्रयास करते है, जब कि ऐसा है नहीं। सभी एक ही रूप हैं, अगर सभी भगवान अलग अलग होते तो सभी के फॉलोअर की रचना अलग अलग होती, परंतु ऐसा नहीं है। सभी इंसानों की रचना एक ही जैसी है, सभी मुंह से खाते है, सभी आंखो से देखते है, सभी जन्म लेते है, सभी मृत्यु को प्राप्त होते है। सभी को जीने के लिए सांस की जरूरत है, तो फिर सभी भगवान अलग अलग कैसे हो सकते हैं। स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था कि मैं उस पवित्र भूमि आया हूं जो सभी धर्मो का सम्मान करती है और सार्वभौमिक स्वीकृति देती हैं, मैं उस भूमि से आया हूं जो सभी धर्मो की जननी हैं। इसका अर्थ हुआ की हिंदू धर्म , सभी की जननी है, सनातन ही जननी है, सनातन धर्म ही धर्म माता हैं वो जननी हैं। तो फिर सनातन धर्म या संस्कृति किसी की कंपीटीटर कैसे हो सकती है, वो अपने ही बच्चो के साथ प्रतिस्पर्धा कैसे करने लगी,
मातापिता कभी भी अपने बच्चो के साथ कंपीटिटर नही हो सकते बल्कि सभी का ध्यान रखना ही हमारे पवित्र धर्म का कर्तव्य हैं, हम ही सभी को बांधने वाले है, हम ही सनातन है, हम ने ही सबको सहिष्णुता का पाठ पढ़ाया है, हमारे ही धर्म की ना कोई शुरुआत है और ना ही कोई अंत, ये अपौरुष्य हैं, सनातन धर्म को किसी पुरुष ने नही बनाया है, किसी व्यक्ति ने नहीं बनाया है, यह तो सृष्टि की रचना है, सनातन धर्म के ग्रंथ भी अपौरुष्य हैं, ना ही उनकी कोई बिगनिंग है और ना ही कोई एंड हैं। इसी लिए सनातन धर्म जननी हैं, यही सबकी रक्षा करने वाला है। हम अपने बच्चो से कभी असुरक्षित नही हो सकते है बशर्ते कि हम अपना बड़े होने का धर्म निभाएं, ये प्रतिस्पर्धा नही हैं,
ये धर्म लड़ने के नही बल्कि सद्भावना, शांति, और आपस में सौहार्द के लिए हैं, अगर इसका कोई अलग अर्थ निकलता है तो फिर वो धर्म नही हैं, क्योंकि श्रीमद्भगवद् गीता में श्रीकृष्ण भगवान कहते है कि धर्म हमारा कर्तव्य है, हमारी ड्यूटी है। अगर संस्कृत के अमर कोष में देखें तो धर्म की 14 परिभाषाएं दी है। जैसे भारतीय सेना में सभी भारतीय एक समान है वैसे ही विवेकानंद जी के अनुसार सभी नागरिक भी भारतीय है तथा एक समान हैं। युवाओं को इन दोनो को आदर्श के रूप में अपनाना होगा , वरना जो स्वामी जी ने कहा था "
एसिमिलेशन नॉट डिस्ट्रक्शन, हार्मनी एंड पीस नॉट डिसेक्शन " इस वाक्य पर हम कभी खरे नहीं उतरेंगे। जैसे भारतीय सेना हर प्रकार से सुदृढ़ है चाहे संख्या बल, चाहे टेक्नोलॉजी, चाहे एकता, चाहे बहादुरी और हिम्मत, तो फिर उसी प्रकार हम सभी भारतीय पंथों, धर्मों को भी एक ही माला में पिरोए हुए मनको की तरह हैं, हमे जननी का धर्म निभाना है, हमे पिता हो का कर्तव्य निभाना है, हमे अपने बड़प्पन का धर्म निभाना हैं, जैसे सभी नागरिकों की वजह से हमारी सेना सशक्त है वैसे ही सभी नागरिकों के धर्मो की वजह से हम सशक्त हैं। युवा साथियों मैं इस अवसर पर आपको पांच बाते कहना चाहता हूं जो ना केवल हमे शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, बौद्धिक , तथा आध्यात्मिक रूप से मजबूत करेगी बल्कि हम सफलता के साथ साथ सार्थक भी सिद्ध हो पाएगी।
1. सभी युवाओं को सेना से शारीरिक रूप से मजबूत होना सीखना चाहिए, जीवन में लक्ष्य के प्रति सजग रहना सीखना चाहिए।
2. सभी भारतीयों को सेना से मानसिक रूप से स्थिर तथा सशक्त बनना सीखना होगा, ताकि किसी भी परिस्थिति में अपने मन को मजबूत कर सकें।
3. सभी युवाओं को अपनी कुशलता को सामाजिक रूप से सार्थक करने के लिए , ज्यादा से ज्यादा सामाजिक कार्य करने चाहिए ताकि युवाओं के व्यक्तित्व का विकास हो सकें तथा राष्ट्र विकसित हो सकें। भारतीय सेना के ध्येय वाक्य को सभी युवाओं को अपने जीवन का लक्ष्य बनाना होगा, ताकि राष्ट्र की सेवा कर, राष्ट्र को विकसित बनाया जा सकें।
4. सभी युवाओं को अपनी बुद्धि का विकास करना है, विवेकशील बनना है, तर्कशील बनना होगा, ताकि कोई आपको भेड़ों की तरह प्रयोग न कर पाएं, और हर युवा राष्ट्र को समर्पित होना सीखें।
5. भारतीय युवाओं को सर्वांगीण सशक्तिकरण के लिए आध्यात्मिकता का सहारा लेना होगा ताकि इस पाश्चत्य भौतिकवाद को हैंडल करने की सीख मिल सकें और जीवन को आनंद के साथ जी सकें, ताकि किसी भी प्रकार का अवसाद हमारे जीवन में न आवे।
अन्त में मैं यही कहना चाहता हूं कि जीवन संपूर्णता की ओर जाने के लिए खुद को सशक्त करना होगा। आज भारतीय थल सेना दिवस के अवसर पर हर युवा को, विद्यार्थी को अनुशासन, सेवा, तथा समर्पण का पाठ पढ़ना होगा। मानव जीवन, स्वाभिमान, स्वावलंबन, तथा स्वाधिष्ठान के लिए मिलता है, इसे यूं ही नशे में, गलत आदतों में न गवाएं। मानव जीवन सभी जीवो के संरक्षण के लिए तथा प्रकृति के संरक्षण के लिए ही मिलता है, लेकिन जरूरत पड़े तो अपना सब कुछ त्याग कर राष्ट्र के लिए सर्वोच्च्य बलिदान के लिए भी तैयार रहना होता है।
मानव जीवन मानव मूल्यों, नैतिक मूल्यों, सामाजिक मूल्य, ब्रह्मांडीय मूल्यों की रक्षा के लिए है, इसे झूठ में, फरेब में, बेईमानी में, अकर्मण्यता में, आलस्य में, आपराधिक गतिविधियों में तथा अपने चारित्रिक क्षरण में न गुजारे। मानव जीवन सर्वश्रेष्ठ कर्मों के लिए है, इस दुनिया को सुंदर बनाने के लिए है, अनुशासन और राष्ट्र भक्ति के लिए है, इसे राष्ट्र के लिए सार्थक बनाएं।
जय हिंद, वंदे मातरम
