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पेरेंट्स को अपने विद्यार्थी बच्चों को लक्ष्मण रेखा की मर्यादा का पालन करना सिखाना होगा ताकि उनका जीवन व करियर सुरक्षित रहें

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Parents must teach their students to follow the limits of Lakshman Rekha so that their life and career remain safe

mahendra india news, new delhi
लेखक
नरेंद्र यादव 
नेशनल वाटर अवॉर्डी
यूथ एंपावरमेंट मेंटर
जीवन जीना एक स्किल होती है, जिससे हमारे किशोरावस्था के विद्यार्थी अपने जीवन को सुरक्षित रख सकें। ये जीवन किसी एक व्यक्ति का नहीं होता है, एक जीवन बहुत सी धाराओं से जुड़ा होता है, जिसे समझने की सभी को जरूरत होती है। एक विद्यार्थी का जीवन मातापिता, शिक्षकों, दोस्तों, परिवार के अन्य सदस्यों, प्रकृति, समाज, शैक्षणिक संस्थान, भारतीय संस्कृति, संस्कारों, रीति रिवाजों, वैज्ञानिक दृष्टिकोण तथा राष्ट से जुड़ा होता है। बहुत बार या अकसर हमारे  एडोलोसेंट विद्यार्थी ये समझ ही नहीं पाते है और वो यही सोचते कि ये उनका जीवन केवल उन्हीं का है, वो जैसा मर्जी जिएं, जो मर्जी करें,

 उन्ही को इसकी दिशा वा दशा तय करने के अधिकार है, बस यहीं पर वो गलती कर जाते है। जो मर्यादाएं विद्यार्थियों के लिए लक्ष्मण रेखा के तौर पर तय की गई है अगर उनको सभी विद्यार्थी अपने जीवन में समाहित करने का प्रण लें लें तो फिर वो हर प्रकार से सुरक्षित हो जाएंगे, जिस प्रकार ऊंची ऊंची मजबूत दीवारें बना कर एक किले को सुरक्षित किया जाता है वैसे ही मर्यादाओं के पालन से विद्यार्थी जीवन तथा उसके करियर को भी सुरक्षित किया जा सकता है। आप सभी मातापिता, लक्ष्मण रेखा के बारे में तो अवश्य जानते होंगे, जब श्रीराम जी सोने के मृग को लेने के लिए अपनी कुटिया छोड़ जंगल में गए थे, और उसके बाद श्रीराम जी की आवाज पर श्री लक्ष्मण जी को भी उन्हें देखने के लिए जंगल जाने को माता सीता जी ने विवश किया था तो उनकी सुरक्षा के लिए लक्ष्मण जी ने वहां एक सुरक्षा रेखा बनाई थी ,

उसे ही लक्ष्मण रेखा कहा जाता है और माता सीता को निवेदन किया था कि माता आप इस रेखा के अंदर ही रहना, क्योंकि लक्ष्मण जी जानते थे कि इस रेखा को कोई नहीं लांघ सकता है। इसी बीच रावण एक संन्यासी का वेश धर कर भिक्षा मांगने पहुंचे तो उन्होंने लक्ष्मण रेखा की तपत को महसूस किया, तो रावण ने कहा था कि मैया बाहर आकर भिक्षा दो, तभी वो भिक्षा स्वीकार करेंगे और माता सीता ने वही लक्ष्मण रेखा लांघ कर भिक्षा देने की कौशिश की तो माता सीता का हरण हुआ था।

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यहां हम यही विमर्श कर रहे है कि जिस सुरक्षित प्रकार हर माता पिता भी अपने बच्चों का पालन पौषण करते है उसी को लक्ष्मण रेखा कहा जाता है ताकि उनके विद्यार्थी बच्चें सुरक्षित रह सके , लेकिन कुछ बच्चें पियर प्रेशर में उस मर्यादा रूपी लक्ष्मण रेखा को लांघ कर खुद ही अपने को पियर प्रेशर व बुराइयों के हवाले कर देते है और अपने जीवन तथा करियर को पटरी से उतारने का कार्य खुद ही कर लेते है, फिर वो कभी उसकी भरपाई नहीं कर पाते है। यहां विषय मर्यादाओं के पालन का है जिन्हें हम श्रीराम जी की मर्यादाएं भी कहते है, मेरा यहां अर्थ संयमित जीवन जीने से है, यहां बिल्कुल भी किसी प्रकार से पूजा पद्धति से नहीं है, क्योंकि धर्म का अर्थ श्रीमद्भगवद् गीता ने कर्तव्य पालन से दिया है।

विद्यार्थी जीवन और किशोरावस्था तो असुर भी निश्चित रूप से बहुत ही संवेदनशील होती है, थोड़ी सी नजर हटी नहीं कि हो गई दुर्घटना। प्रिय पेरेंट्स तथा शिक्षकों, यहां हर विद्यार्थी को पियर प्रेशर व सामाजिक प्रेशर रूपी दुर्घटना से बचाना है, जिससे उनका जीवन तथा करियर भी सुरक्षित बन सकें। यहां हर विद्यार्थी को मर्यादाओं का अर्थ समझना बेहद जरूरी है। अब हम लक्ष्मण रेखा की मर्यादाओं की बात कर रहे है जो मातापिता या शिक्षकों द्वारा हर उस विद्यार्थी के लिए खींची जाती है जिन्हें अपने सुंदर भविष्य की कामना करनी है, इसलिए इनके पालन का संकल्प लेना ही होगा और पियर प्रेशर से मुक्त होना ही पड़ेगा। मातापिता तथा शिक्षकों द्वारा खींची गई लक्ष्मण रेखा के उल्लंघन का अर्थ है जीवन की बर्बादी। अब हम उन मर्यादाओं की चर्चा करते है जो लक्ष्मण रेखा के रूप में तय की गई है:
1. व्यक्तिगत मर्यादाएं: व्यक्तिगत मर्यादा में हर किशोरावस्था के विद्यार्थी को आत्म जागरूकता का ध्यान रखना चाहिए,

जिनमें सबसे पहली जरूरत है अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग होना, अपने पौष्टिक भोजन के प्रति सजगता, पौष्टिक तत्वों के प्रति सजग होना। शरीर को क्रियाशील रखने के लिए योग प्राणायाम तथा व्यायाम को अपनी दैनिक चर्या में शामिल करना। खुद को किसी भी प्रकार के नशे से दूर रखना, वर्तमान में इस मर्यादा का पालन करना जरूरी है। मैदा, नमक, चीनी, तथा जंक फूड तथा जंक पेय पदार्थों से दूरी रखना भी आवश्यक है। सात घंटे से अधिक नहीं सोना, इसका भी संकल्प होना चाहिए। प्रातः जल्दी उठाने का प्रण जीवन में बहुत आगे बढ़ने को प्रेरित करता है। मानसिक वा आध्यात्मिक रूप से मेडिटेशन के माध्यम से सशक्त बनना है।

खाद्य पदार्थों को किसी भी सूरत में वेस्ट नहीं करना है, जितना खाना है, उतना ही थाली में डालना है। हर किशोर ये ध्यान रखे कि उसे अपनी लक्ष्मण रेखा नहीं लांघनी है, ताकि सुरक्षित रहा जा सकें, चाहे कोई कितना भी पक्का दोस्त हो, सखी हो, लेकिन लक्ष्मण रेखा में ही रहना है, तभी सुरक्षा रहेगी। यहां मैं बार बार यही कह रहा हूँ कि पियर प्रेशर इतना होगा कि तुम्हे उसे झेलना आना चाहिए। सुनो सबकी और करो अपनी लक्ष्मण रेखा के अनुसार, तभी जीवन वा करियर सुरक्षित रहेगा। हर विद्यार्थी को चाहे वो लड़की हो या लड़का हो, उन्हें विद्यार्थी काल में बॉय फ्रेंड या गर्ल फ्रेंड बनाने में समय नहीं खोना है। एक बार नियम टूटा तो समझ लेना सदा के लिए टूट जाएगा, उसकी भरपाई कभी नहीं होगी, इसे ध्यान में रखना होगा।


2. पारिवारिक मर्यादा: यहां हर विद्यार्थी को तीन बातों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है, पहली ये कि अपनी पारिवारिक प्रतिष्ठा के साथ कभी समझौता नहीं करना है। दूसरा, अपने मातापिता की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखकर ही जीवन को बनाना है कि किसी भी  सूरत में उस आर्थिक मर्यादा को लांघना नहीं है। तीसरा, अपने मातापिता वा खुद की प्रतिष्ठा को बनाए रखना है जो भी करें, उसे ध्यान में रखकर ही करना है। बड़े बुजुर्गो को सदैव सम्मान की दृष्टि से देखना है, उनके साथ आदर सत्कार का व्यवहार करना है।
3. सामाजिक मर्यादाएं: किशोरावस्था ऐसी आयु है कि उसमें भावनाओं के पहाड़ होते है, भावनाओं में बहने का समय होता है, खुद को दिखाने का मन करता है, सेक्स की तरफ आकर्षण बढ़ता है, इनसे बचने के लिए संकल्पशील रहना है। साथियों, यहां तुम्हारे साथी विद्यार्थियों का बहुत दबाव रहता है, कोई कहेंगे कि तुम तो दब्बू हो, मम्मा बॉय हो, कोई कहेगा कि तुम तो पापा की परी हो, कोई कहेंगे कि एक बार करो, एक बार से कोई फर्क नहीं पड़ता है। एक बार सिगरेट में घूंट मारो, एक पैग शराब का लो कोई फर्क नहीं पड़ता है, एक बार कोई भी नकारात्मक गतिविधि कर लो, इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता है, लेकिन आपको किसी भी कीमत पर लक्ष्मण रेखा नहीं लांघनी है, इसका संकल्प लेकर विद्यार्थी जीवन जीना है। हर प्रकार की सामाजिक गतिविधियों में, प्रतियोगिताओं में प्रतिभागिता करनी है, तभी विद्यार्थी के भाव उज्ज्वल बनेंगे।


4. शैक्षणिक मर्यादा: यहां हम शिक्षण संस्थान तथा शिक्षकों के प्रति विद्यार्थियों के कर्तव्य के विषय में चर्चा कर रहे है। इसमें हर विद्यार्थी को पांच बातों को ध्यान में रखकर आगे बढ़ना है। पहला, अपने शैक्षणिक संस्थान को सदैव सुरक्षित रखने का भाव होना चाहिए। दूसरा, अपने सभी टीचर्स के प्रति श्रद्धा तथा सम्मान का भाव रखना है, कभी कभी पियर प्रेशर में बच्चें अपने टीचर्स के साथ मिसबिहेव करने की कौशिश करते है, उससे हर हाल में बचने का संकल्प लेना है। तीसरा, अपने संस्थान की बेहतरी के लिए अच्छा परिणाम देने के लिए संकल्पशील रहना ही हर विद्यार्थी का दायित्व है। चौथा, कक्षा के दौरान अपने टीचर्स साहिबान से खूब प्रश्न पूछने की आदत बनाएं, ताकि क्लास का माहौल रुचिकर बन सकें। पांचवां, हर विद्यार्थी का ये कर्तव्य तथा दायित्व है कि वो सभी शिक्षकों की मान मर्यादा का ध्यान करे, अगर सामने से टीचर आ रहे है तो उनके सम्मान में एक तरफ खड़े होकर श्रद्धा के भाव प्रकट करना सीखें। अगर टीचर के सामने खड़े है तो सावधान की मुद्रा में खड़े होकर अपनी श्रद्धा का भाव प्रकट करे। अपने शैक्षणिक संस्थान में साफ सफाई का ख्याल रखें, कभी भी उसे गंदा करने वाली कोई गतिविधि ना करें। अपने संस्थान को उच्च स्तर पर ले जाने के लिए अपनी हर गतिविधि को उज्ज्वल बनाएं, जिससे संस्थान का नाम बन सकें।


5. राष्ट्र के प्रति मर्यादाएं: हर विद्यार्थी को अपना चारित्रिक उत्थान इतना करना है कि इससे राष्ट्रीय चरित्र को कोई ठेस न पहुंचे। एक एक विद्यार्थी का चरित्र ही राष्ट्रीय चरित्र है। राष्ट्र के प्रति उच्च भाव, उज्ज्वल भाव, उच्च चरित्र, उच्च ज्ञान, सर्वोत्तम गतिविधियां, बेहतरीन स्वास्थ्य, सकारात्मक भाव, अपनी शारीरिक मानसिक व आध्यात्मिक गतिविधियों का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करना है, तभी राष्ट्र की उन्नति होती है। राष्ट्र के लिए हर विद्यार्थी धरोहर के रूप में है, दैवी संपदा के रूप में है, इसका ध्यान हर विद्यार्थी, टीचर वा मातापिता को होना चाहिए, ताकि राष्ट्र को अपना सर्वश्रेष्ठ दे सकें। "राष्ट्र हमे सब कुछ देता है हम भी कुछ तो देना सीखें" का भाव प्रकट करना है।


 प्रिय विद्यार्थियों, पेरेंट्स तथा सम्माननीय शिक्षकगणों, विद्यार्थी जीवन जीने के सब के अपने अपने विभिन्न तरीके हो सकते है, अपनी अपनी आर्थिक स्थिति हो सकती है, अपना अपना भोजन हो सकता है, अपनी अपनी दिनचर्या हो सकती है, अपना अपना सोचने का दृष्टिकोण हो सकते है,  लेकिन विद्यार्थी जीवन जीने के लिए जो मर्यादित लक्ष्मण रेखा बनाई गई है वो तो सभी के लिए एक जैसी ही है, चाहे कोई किसी भी पंथ, संप्रदाय, जाति से हो। चाहे वो अमीर हो , चाहे वो गरीब हो, चाहे वो संपन्न हो, या विपन्न हो, चाहे वो कमजोर हो या मेधावान हो, सभी को लक्ष्मण रेखा की मर्यादाओं का पालन करना होगा, तभी वो अपने जीवन व करियर को सुंदर, तथा सम्पन्न बना पाएंगे। हर मातापिता अपने एडोलोसेंट विद्यार्थियों को पियर प्रेशर को हैंडल करने का अभ्यास कराना दिखाएं, जिससे पियर प्रेशर उन पर हावी ना हो पाएं।
जय हिंद, वंदे मातरम