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माननीय शिक्षकों को कुछ गतिविधियों को संकल्प के साथ "ना कहने " की जरूरत है, तभी गुरु पद मिलेगा

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Respected teachers need to say "no" to some activities with determination, only then they will get the position of Guru

Mahendra india news, new delhi

लेखक
नरेंद्र यादव
नेशनल वाटर अवॉर्डी
यूथ एंपावरमेंट मेंटर
हर इंसान की फितरत अलग होती है, हर किसी की वृति व प्रकृति भी अलग अलग होती है, ये तो है मानवीय दैवीय गुण तथा आसुरी गुण जो हमारे सभी के भीतर मौजूद है। हर इंसान कोई भी गतिविधि उनकी वृत्ति तथा संगत से भी तय होती है, लेकिन जब हम अपने देश के संविधान के अधीन हो जाते है तो हमारी सारी गतिविधियां उसी के अनुरूप होनी चाहिए है और विशेषरूप से जब कोई भी व्यक्ति नागरिक सेवा में हो चाहे वो निजी तौर पर हो या भी राजकीय तौर पर हो, लेकिन बड़ी विडंबना है कि फिर भी लोग अपनी वृत्ति के अनुसार अधिक चलते है और गलतियां करते है।

नागरिक सेवा में भी कुछ कार्य चारित्रिक विकास, बौद्धिक तथा मानव उत्थान के होते है, उनमें लगे सभी व्यक्ति चाहे वो स्त्री हो या पुरुष हो,चाहे किसी भी जाति के हो या धर्म हो, सभी के लिए विशेष संकल्प व गुणों की जरूरत होती है। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि अगर कोई व्यक्ति शिक्षा, स्वास्थ्य, विधान बनाने के कार्य या उन्हें क्रियान्वयन करने के क्षेत्र में लगे है, उनकी जिम्मेदारी वा जवाबदेही बहुत अधिक होती है, उन्हें हम मेंटर नागरिक भी कह सकते है, वो आम नागरिक नहीं है।

अगर यह बात इन क्षेत्रों में लगे सभी लोगों को समझ में आ जाए तो किसी भी प्रकार का व्यवधान ना हो, लेकिन ऐसा न होने के कारण हम अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में कमजोर पड़ जाते है। हर कार्य में विशेष रूप से विशेष गुणों की जरूरत होती है, अगर कार्य के अनुरूप गुण वा नैतिक मूल्य नहीं होंगे तो हम कुछ भी करने के उपरांत भी बेहतरीन परिणाम नहीं पा सकेंगे। अगर सब कुछ को छोड़ भी दे तो एक क्षेत्र तो हमारे सामने विशेष रूप से आता है जहां से देश का हर नागरिक शैक्षणिक, बौद्धिक तथा आत्मिक रूप से तैयार किया जाता है, ऐसी जगह पर किसी प्रकार की कौताही नहीं बरती जा सकती है।

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यहां यह भी विशेष है कि इस कार्य में लगे हर व्यक्ति चाहे वो किसी भी लेवल पर कार्यरत हो, उनकी ड्यूटी विशेष है, यही समझने की जरूरत है। यही शिक्षण संस्थान चाहे वो प्राथमिक विद्यालय हो, चाहे वो महाविद्यालय हो, फिर चाहे वो विश्वविद्यालय ही क्यों न हो, ये नियम सभी पर लागू होती है। अनेक स्थानों की लापरवाही सहन की जा सकती है, लेकिन शिक्षण संस्थान वा वहां कार्य कर रहे हर एक महानुभाव की लापरवाही को सहन नहीं किया जा सकता है

क्योंकि यहीं से राष्ट्र निर्माण के आधार तैयार किए जाते है, यहीं से देश सर्वोच्च्य पद पर बैठे व्यक्ति तैयार होते है, यहीं से माननीय राष्ट्रपति, माननीय प्रधानमंत्री तैयार किए जाते है, यहीं पर देश की न्यायपालिका में बैठे महत्वपूर्ण माननीय न्यायाधीश तैयार किए जाते है, यहीं से ब्यूरोक्रेसी में बैठे सभी अधिकारी तैयार किए जाते है, यहीं से डॉक्टर्स इंजीनियर्स व अधिवक्ता तैयार किए जाते है, यहीं से देश के बड़े बड़े वैज्ञानिक, बिजनेसमैन, कृषक, व्यवसायी तैयार किए जाते है और उससे भी बड़ी बात और मत्वपूर्ण बात यहीं से सबसे माननीय शिक्षक भी तैयार किए जाते है, यहीं से प्राथमिक अध्यापक से लेकर विश्वविद्यालयों के प्रोफेसर्स तैयार किए जाते है,

तो हम और आप सभी बड़ी आसानी से अनुमान लगा सकते है कि एक माननीय शिक्षक का कार्य कितना जिम्मेदारी तथा जवाबदेही भरा है, यह कार्य करना चयन का है, चांस का बिल्कुल नहीं है, क्योंकि एक बच्चे का भविष्य या एक बच्चे का निर्माण भी देश के विकास के लिए महत्वपूर्ण है। यहां हर किसी को समझने की जरूरत है कि जितना एक बड़े से बड़े व्यक्ति के बच्चे का महत्व है उतना ही एक गरीब से गरीब के बच्चे का भी महत्व है। जब भी जिसने भी इसके विपरित सोच बनाई है वो कभी भी न तो देशभक्त हो सकते है और न ही वो राष्ट्रभक्त  हो सकते है। देश का हर नागरिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि उनके बल, बुद्धि, स्वास्थ्य तथा विवेक की जरूरत होती है। शिक्षक का पद इतना महत्वपूर्ण है कि कोई इसका आंकलन भी नहीं कर सकता है,

उसमें लगी मेहनत, कर्तवनिष्ठा तथा संवेदनशीलता का एहसास भी नहीं कर सकते है। मै यहां बहुत स्पष्टता तथा ईमानदारी से कहना चाहता हूँ कि मानव निर्माण की सेवा में लगे कुछ महानुभाव तो वास्तव में अपनी चॉइस से नहीं, बल्कि बाय चांस ही आए हुए है जिनके लिए शिक्षण कार्य भी सेवा नहीं बल्कि व्यवसाय की तरह ही है और कुछ के लिए तो यह पेंशन या किसी एडिशनल कार्य की तरह ही है। मैने कुछ शिक्षक देखें है जो न तो समय पर आते है और न ही विद्यार्थी उनके लिए कोई अहमियत रखते है। शिक्षण के क्षेत्र में इसे सेवा कहे या नौकरी कहें, परंतु यह कार्य बहुत ही नोबल है, परोपकार का कार्य है,

इसलिए सभी शिक्षक कुछ कार्यों को हर हाल में ना कहने का संकल्प लें, जिस प्रकार हम विद्यार्थियों को अच्छी बात सिखाते है उसी प्रकार शिक्षकों को खुद ही ये जरूरी बातों पर अमल करना चाहिए, जिससे भारत के विद्यार्थी संस्कारी, परिश्रमी, प्रश्न पूछने वाले, स्वावलंबी, आत्मविश्वासी, तर्कशील, सशक्त तथा जीवन में प्रसन्न रहना सीख सकें। इन सभी के लिए सभी शिक्षण संस्थानों के शिक्षकों को

अपनी कुछ अनावश्यक गतिविधियों को "ना " कहने का प्रण लेना ही होगा, जैसे :
1. विद्यार्थियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने को सदैव ना कहे, क्योंकि विद्यार्थी शिष्य है आप गुरु हो।
2. शिक्षण के कार्य में रहते हुए व्यक्ति धूमपान की आदत को व हर प्रकार के नशे को न कहने का संकल्प करें।
3. सभी शिक्षकों को किसी भी प्रकार के फैशन को ना कहने का संकल्प कहना होगा।
4. अपने कार्य को पूरा समय न देने की आदत को ना कहना ही चाहिए।
5. शिक्षण संस्थान व कक्षा से पढ़ाई के समय में बंक मारने की आदत को ना कहना चाहिए।
6. बिना अवकाश लिए छुट्टी पर रहने या लेट आने की आदत को भी ना कहना चाहिए।
7. सभी शिक्षकों को कैजुअल वस्त्र व जींस टीशर्ट आदि पहनने को ना कहना चाहिए, जिससे वस्त्रों की गरिमा बनी रहें, क्योंकि नई जेनरेशन आपसे ही जीना सीखते है।


8. विद्यार्थियों के साथ अपने कैजुअल बिहेवियर को ना कहने का संकल्प लेना चाहिए।
9. अपनी बोलचाल में किसी भी प्रकार के अपशब्दों के उपयोग को ना कहना चाहिए।
10. अपने शिक्षण संस्थान में मोबाइल के उपयोग को ना कहने का प्रण लेना चाहिए।
11. शिक्षण संस्थान के समय में किसी और कार्य करने को न कहना होगा।
12. हर शिक्षक को अपने जीवन से समय की बर्बादी को ना कहना चाहिए, जिससे समय का महत्व विद्यार्थियों को भी बताया जा सकें।
13. हर शिक्षण संस्थान का एक ध्येय वाक्य होता है, उससे इतर जाने को ना करना होगा।
14. अपने घर की समस्याओं को शिक्षण संस्थान में लेकर आने को ना करना चाहिए।
15. शिक्षक लाइक क्वालिटी के विपरीत हर उस क्रिया को न कहना होगा, जिससे विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास व चारित्रिक विकास में बाधा पढ़ें।


विषय की गंभीरता को देखते हुए हम सभी को चाहे हम किसी भी स्तर के शिक्षक है, किसी भी शिक्षण संस्थान में कार्यरत है, या किसी भी पद पर है, हमे कुछ कार्यों को "ना" कहना ही होगा, चाहे हम अपनी चॉइस से शिक्षण के कार्य में आए है या फिर बिना सोचें समझे आएं है। अब जब आ ही गए है, और उस कार्य के बदले सैलरी मिल रही है, जिससे हमारी आजीविका ही नहीं, बल्कि हमारे परिवार का भी जीवन यापन बेहतरीन ढंग से हो रहा है, हमारा मान सम्मान भी उस पर आधारित है तो फिर उसी को अपने जीवन का ध्येय वाक्य बना लें। बस एक बात मन मस्तिष्क में रखना चाहिए कि किसी भी प्रकार से विद्यार्थियों के अधिकारों का हनन न हो, इसके लिए हमे माननीय शिक्षक होने के नाते अपनी किसी भी अनावश्यक क्रिया की हां को "ना" कहने का संकल्प लेना ही चाहिए।
जय हिंद, वंदे मातरम