हरियाणा बॉन्ड एवं डिबारमेंट नीति पर गंभीर सवाल: BDS छोड़ने के बाद MBBS में प्रवेश, शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं
mahendra india news, new delhi
रोहतक/चंडीगढ़। हरियाणा की मेडिकल प्रवेश प्रक्रिया में पारदर्शिता और नियमों के समान अनुपालन को लेकर एक गंभीर विवाद सामने आया है। शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि हरियाणा सरकार की MBBS/BDS प्रवेश नीति, बॉन्ड नीति तथा डिबारमेंट नियमों का उल्लंघन करते हुए एक अभ्यर्थी को BDS कोर्स छोड़ने के बाद MBBS में प्रवेश दे दिया गया, जबकि समान परिस्थितियों में अन्य छात्रों पर कठोर नियम लागू किए जाते हैं।
शिकायतकर्ताओं के अनुसार, निकिता महेश कुमार ने वर्ष 2023 में BDS कोर्स में प्रवेश लिया था और बाद में कोर्स छोड़ दिया। इसके बावजूद वर्ष 2025 में उन्हें MBBS कोर्स में प्रवेश मिल गया। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि हरियाणा की प्रवेश नीति के अनुसार ऐसे मामलों में 3 वर्ष का डिबारमेंट तथा निर्धारित बॉन्ड/पेनल्टी संबंधी प्रावधान लागू होते हैं। उनका आरोप है कि यदि नियम लागू थे तो उनका पालन नहीं किया गया, जिससे अन्य पात्र एवं आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के साथ अन्याय हुआ तथा उनकी सीटों और अवसरों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि इस मामले को लेकर उन्होंने व्यापक स्तर पर शिकायतें दर्ज करवाई हैं। उनके अनुसार शिकायतें SP नूंह, SP रेवाड़ी, DC नूंह, DC रेवाड़ी, एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) पंचकूला, DMER हरियाणा, PGIMS रोहतक, SHKM मेडिकल कॉलेज नल्हड़, DIG स्तर के अधिकारियों, राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (NMC), स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों तथा मुख्यमंत्री विंडो सहित विभिन्न विभागों को भेजी गई हैं। इसके अतिरिक्त लगभग 18 वरिष्ठ अधिकारियों को ई-मेल के माध्यम से भी शिकायत भेजी गई है।
शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि लगभग 20 दिन पहले संबंधित विभागों को लिखित शिकायतें सौंपे जाने के बाद अधिकारियों द्वारा 7 दिन का समय मांगा गया था, लेकिन अब तक कोई स्पष्ट एवं संतोषजनक जवाब उपलब्ध नहीं कराया गया है। उनका यह भी आरोप है कि मुख्यमंत्री विंडो पर मामले में तथ्यों के अनुरूप कार्रवाई करने के बजाय भ्रामक अथवा गलत ATR प्रस्तुत की गई, जिसकी स्वतंत्र जांच कराई जानी चाहिए।
ATR पर भी उठे सवाल
शिकायतकर्ताओं ने मुख्यमंत्री विंडो पर प्रस्तुत ATR पर भी गंभीर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि ATR में उल्लेख किया गया है कि 14 जुलाई 2026 को शिकायतकर्ता को हस्ताक्षर के लिए बुलाया गया था, लेकिन उसने हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। साथ ही ATR में यह भी दर्ज किया गया कि संबंधित कॉलेज ने मामले को NTA से संबंधित विषय बताया।
हालांकि शिकायतकर्ताओं का दावा है कि उनके पास PGIMS रोहतक के डीन कार्यालय, NTA तथा मेडिकल काउंसलिंग कमेटी (MCC) के अधिकारियों के साथ हुई बातचीत की रिकॉर्डिंग उपलब्ध है। शिकायतकर्ताओं के अनुसार इन वार्तालापों में संबंधित अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि NTA की भूमिका केवल परीक्षा आयोजित करने और परिणाम घोषित करने तक सीमित है, जबकि राज्य की बॉन्ड नीति, डिबारमेंट नियमों, प्रवेश पात्रता तथा प्रवेश से जुड़े प्रशासनिक निर्णयों का अधिकार संबंधित राज्य प्राधिकरणों एवं संस्थानों के पास होता है।
शिकायतकर्ताओं की मुख्य मांगें
शिकायतकर्ताओं ने सरकार से कड़ी कार्रवाई की मांग की है:
1. बॉन्ड नीति के खिलाफ हुए प्रवेश को तत्काल रद्द किया जाए
2. MBBS बॉन्ड नीति के अनुसार निर्धारित पेनल्टी/बॉन्ड राशि वसूल की जाए
3. फर्जीवाड़े और नियम उल्लंघन के आरोप में संबंधितों के खिलाफ पुलिस केस दर्ज कर कानूनी कार्रवाई की जाए
4. पूरे मामले की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए और तथ्यों को सार्वजनिक किया जाए
उठ रहे हैं कई महत्वपूर्ण सवाल
- क्या संबंधित अभ्यर्थी पर हरियाणा की डिबारमेंट नीति लागू होती थी?
- यदि हां, तो उन्हें MBBS प्रवेश प्रक्रिया में भाग लेने और प्रवेश प्राप्त करने की अनुमति किस आधार पर दी गई?
- क्या बॉन्ड नीति एवं पेनल्टी संबंधी प्रावधानों का पालन किया गया?
- यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही क्यों तय नहीं की गई?
- क्या सभी अभ्यर्थियों पर समान नियम लागू किए जा रहे हैं?
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यह मामला केवल एक अभ्यर्थी तक सीमित नहीं है, बल्कि हरियाणा की मेडिकल प्रवेश प्रणाली की पारदर्शिता, निष्पक्षता और हजारों विद्यार्थियों के अधिकारों से जुड़ा हुआ है। इसलिए राज्य सरकार, DMER हरियाणा, संबंधित मेडिकल संस्थानों और जांच एजेंसियों को मामले में शीघ्र स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
