सिमरन ही इंसान की असली पूंजी, हक-हलाल की कमाई से ही घर में आती है खुशी: संत बिरेन्द्र सिंह
mahendra india news, new delhi
कालांवाली मस्ताना शाह बलोचिस्तानी आश्रम डेरा जगमालवाली में रविवार को सत्संग का आयोजन किया गया, जिसमें भारी संख्या में पहुंचे सत्संगियों और श्रद्धालुओं ने गुरुवाणी व प्रवचनों का लाभ उठाया। इस अवसर पर संत बिरेन्द्र सिंह ने संगत को निहाल करते हुए जीवन को सफल बनाने के गूढ़ रहस्य समझाए। उन्होंने इंसान को बाहरी आडंबरों से दूर रहकर अपने भीतर झांकने और सिमरन की अमूल्य पूंजी इकट्ठा करने की प्रेरणा दी। प्रवचन करते हुए संत बिरेन्द्र सिंह ने कहा कि आज का इंसान दिन-रात दुनियावी पूंजी और भौतिक सुख-साधन जोड़ने में लगा हुआ है,
जबकि हमारी असली पूंजी 'सिमरन' (नाम सुमिरन) है। उन्होंने अफसोस जताते हुए कहा, "हम उस पूंजी को इकट्ठा करने की सोच ही नहीं रहे जो हमारे साथ जाएगी, बल्कि पूरा जीवन उस धन-दौलत के पीछे गंवा रहे हैं जो यहीं छूट जानी है। आज हमें यह सोचने की सख्त जरूरत है कि जिस रास्ते पर हम चल रहे हैं, क्या वह हमें हमारी असली मंजिल की तरफ ले जा रहा है या नहीं? संत जी ने समाज में फैले अंधविश्वास और बाहरी दिखावे पर चोट करते हुए कहा कि हम सतगुरु की तलाश बाहर कर रहे हैं, जो कि व्यर्थ है।
इतिहास गवाह है कि आज तक किसी को भी सतगुरु बाहर नहीं मिले हैं। जिसको भी परमात्मा या सतगुरु की प्राप्ति हुई है, उसे अपने इस शरीर रूपी मंदिर के भीतर ही हुई है। उन्होंने कहा कि हम सब 'नकल' (दिखावे) के जाल में फंसकर रह गए हैं और असली तत्व को भूल चुके हैं। सतगुरु केवल भीतर के सिमरन से ही प्राप्त हो सकते हैं। संत बिरेन्द्र सिंह ने कहा कि जीवन में हमेशा हक-हलाल (ईमानदारी) की कमाई करनी चाहिए। हराम की कमाई करने वालों के पास बड़ी गाड़ियां, कोठियां और जमीन-जायदाद तो हो सकती है, लेकिन उनके घर के भीतर कभी आत्मिक शांति और खुशी नहीं मिल सकती। इसके विपरीत, ईमानदारी की कमाई करने वाले व्यक्ति की भले ही झोपड़ी हो, लेकिन उसका घर हमेशा सच्ची खुशी और सुकून से महकता है। प्रवचनों के दौरान उन्होंने इंसान को आत्ममंथन करने की सीख दी।
उन्होंने कहा कि हमें दूसरों के दाग (कमियां) तो तुरंत दिखाई दे जाते हैं, लेकिन अपने दामन पर लगे दाग नजर नहीं आते। दूसरों पर उंगली उठाने से पहले हमें अपने गिरेबान में झांकना होगा। उन्होंने समाज की संकीर्ण मानसिकता पर बोलते हुए कहा कि हम युगों-युगों से गफलत (अज्ञानता) की नींद में सोते आए हैं और झूठ को सच मानकर जी रहे हैं। लोग धर्मों के चश्मे से सत्संग और संतों को देखते हैं। संत तो इस धरा पर काल के नियम-कायदे में रहकर काम करते हैं। वे कोई चमत्कार या आडंबर नहीं दिखाते, बल्कि हमें गफलत की नींद से जगाकर हमारे 'असली घर' की याद दिलाते हैं और परम सत्य से अवगत करवाते हैं।
डेरे में लगेंगी 25 जून से सिमरन क्लास:
सत्संग के दौरान संगत के लिए एक महत्वपूर्ण घोषणा भी की गई। डेरा प्रबंधन की ओर से बताया गया कि संगत को नाम-सिमरन से जोड़ने और आत्मिक उन्नति के लिए संत बिरेन्द्र सिंह जी स्वयं विशेष 'सिमरन क्लासेस' (सिमरन कक्षाएं) लगाएंगे। यह कक्षाएं दो चरणों में आयोजित होंगी। पहला चरण 25 जून से 30 जून तक चलेगा, जबकि दूसरा चरण 08 जुलाई से शुरू होकर 28 जुलाई तक जारी रहेगा।
