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विद्यार्थियों याद रखना तुम्हारी संगति निर्माण करती है, जैसी संगत होगी वैसे बन जाओगे

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Students, remember that your company builds you; you will become what you keep

mahendra india news, new delhi

लेखक
नरेंद्र यादव
नेशनल वाटर अवॉर्डी
यूथ एंपावरमेंट मेंटर
जब हम श्रीमद्भगवद् गीता के सोहलवें अध्याय के पहले तीन श्लोकों का पाठ करते है तो हम मानव होने के अहसास की ओर बढ़ने के पवित्र कार्य को अपने जीवन में स्वीकारते है। वैसे इस संसार में अधिकतर इंसान तो ज्यादातर समय कुछ न कुछ बनने में ही निकाल देते है, वो अपना होना समझ ही नहीं पाते है। सर्वशक्तिमान ईश्वर या ब्रह्मांड ने इंसान को बुद्धि विवेक सब कुछ देकर भेजा है, हर इंसान को यूनीक बनाकर इस धरती पर भेजा है, हर इंसान को किसी विशेष कार्य को सम्पन्न करने को भेजा है, परंतु इंसान है कि वो खुद को समझे बिना दूसरों की तरह बनने में जिंदगी निकाल देता है,

दूसरों की नकल करने में जीवन का महत्वपूर्ण  हिस्सा निकाल देता है और उसी फेर में वो तमाम अवगुणों का मालिक बन जाता है, कई कठिनाइयां अपने जीवन में ले आता है। अपनी इंसानियत, अपनी मानवता, अपनी कोर स्ट्रेंथ को छोड़कर कुछ और बनने की चाहत में सारे दुर्गुण अपने भीतर समेटने में लग जाता है, और अपने को सही ठहराने के लिए अहंकार में जीने के वशीभूत हो जाता है। संगत निर्माण करती है, जिस संगति में हम रहते है वैसे ही हम बनते जाते है, युवा विद्यार्थियों संगति हमारे जीवन के निर्माण का रॉ मटेरियल है, कच्चा पदार्थ है, जिसे हम कच्चा माल भी कहते है,

जिससे कोई भी इंसान अपना निर्माण करता है, उसमें दूसरों की तरंगें, दूसरों की सांसे, दूसरों के शब्द, दूसरों की गतिविधियां, दूसरों के दृष्टिकोण, दूसरों के भाव, दूसरों की ऊर्जा, दूसरों की आदतें,दूसरों जैसा व्यवहार, दूसरों की प्रकृति, ये सभी रॉ मटेरियल ही तो है, जो हमारा निर्माण करते है। हर विद्यार्थी को चाहिए ईश्वर द्वारा दी गई अपनी अपनी स्ट्रेंथ को पहचाने, अपने खुद के गुणों की पहचान करें, अपनी पॉजिटिव मैरिट को पहचाने, ताकि अपनी सफलता और हैप्पीनेस की राह खुद बना सकें। यहां इस बात पर ध्यान देने की जरूरत है कि इस दुनिया में हर व्यक्ति अलग होता है, यूनिक होता है, विशेष होता है, हर विशेष विशेषताओं के साथ जन्मता है, वही उसकी कोर ताकत होती है और उसी के लिए इस ब्रह्माण्ड ने उसको  जन्म दिया है, बस यही गलती हर मातापिता करते है कि उसे किसी और कार्य में लगा देते है, कुछ और बनाना चाहते है जिसका बीज उनके भीतर ब्रह्मांडीय ऊर्जा ने दिया ही नहीं है।

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अब ये कैसे और कौन पहचाने कि यह बच्चा क्या बनना चाहिए, यहां मैं कह चुका हूं कि हर बच्चा अपनी कोशिकाओं  के अनुसार विशेष होता है। भारतीय संस्कृति के मुताबिक हर इंसान के बॉडी सेल अलग ऊर्जा से बने होते है, इसलिए ही हमे बच्चों का अध्ययन करना आना चाहिए, ताकि वो अपने कार्य में रुचि ले सकें तथा प्रसन्न भी रह सकें। इस दुनिया की अधिकतर मानव रूपी ऊर्जा या संसाधन उनके भीतर के इंट्रस्ट के विरुद्ध ही कार्य में लगे रहते है, इसीलिए वो असत्य, भ्रष्टाचार, बेईमानी, पक्षपात, ईर्ष्या, जलन, द्वेष, लोभ के प्रभाव में आसानी से आ जाते है, क्योंकि उन्हें उनका जीवन कभी भी संपूर्णता की ओर बढ़ता ही नहीं दिखता है, इसी लिए अधिक और अधिक पाने की चिंता में लगे रहते है। अधिकतर इंसान पूरी जिंदगी बनने में लगे रहते है, वो कभी अपना होना महसूस नहीं कर पाते है, जो ऑलरेडी उनके पास है, कभी बनने का आनंद नहीं ले पाते है, क्योंकि बनना सदैव दूसरे जैसा है, और होना अपने जैसा है। खुद के भीतर के बीज को पहचानने के लिए कुछ टिप्स दिए गए है, इन्हें सभी पेरेंट्स तथा बच्चे भी पहचाने इन्हें,

जैसे ;
1. जीरो से पांच वर्ष की आयु के बच्चों की छोटी छोटी गतिविधियों का एक रजिस्टर बनाएं, और उसकी हर दिन की गतिविधियों को पेरेंट्स नोट करें।
2. पांच से आठ वर्ष की आयु में उनके पठन पाठन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है जिससे उनकी रुचि को उस रजिस्टर में इंगित किया जा सकें।
3. हर बच्चें की शारीरिक ताकत की जांच करते रहें, उन्हें हर प्रकार का पौष्टिक भोजन देने की आदत डालें, ताकि शरीर और मन से सशक्त बन सकें।
4. जीरो से पांच वर्ष की आयु में उन्हें विभिन्न प्रकार के खिलौने या कुछ एक्सरसाइज़ के माध्यम से भी उनकी रुचि का पता लगाया जा सकता है।
5. दस वर्ष तक की आयु के बच्चों की हर बात को ध्यान से सुना जाए, उन पर गौर करना चाहिए, वहीं से उनकी रुचि का ज्ञान होगा।


6. अपने बच्चों को खूब स्नेह करें ताकि वो आप से बात करने में हिचकिचाएं नहीं, वो बिना डर के अपनी सभी बात पेरेंट्स से शेयर कर सकें।
7. आठ से 12 वर्ष के बच्चों की संगति पर फोकस करना बेहद जरूरी है, क्योंकि वो आयु डिस्ट्रक्शन की है। बच्चा अपनी प्रकृति के अनुसार संगत ढूंढने का प्रयास करता है, उसे वहां केयर करना जरूरी है, उस समय उसकी प्रकृति में उत्थान करना बेहद आवश्यक है, या दूसरों के चक्कर में फंसने का भी भय होता है।


8. उसकी प्रकृति अर्थात सत्व, रजस या तमस में से कौन सी स्थिति है उसकी पहचान करना जरूरी है ताकि उसे सत्व की ओर ले जाने के लिए कार्य किया जाएं, कुछ गतिविधियां छोटी आयु से ही उसकी दिनचर्या में शामिल की जा सकें।
9. किसी भी बच्चे की प्रकृति को बदलने के लिए लगातार अभ्यास करने की जरूरत होती है, जिससे वो अपनी मूल ऊर्जा को पहचान सकें, और उसमें श्रेष्ठ कर सकें।
10. सभी पेरेंट्स यह याद जरूर करें कि अपनी चाहत को बच्चों पर न थोपें, क्योंकि अधिकतर हर इंसान के साथ यही होता है, और उसका जीवन केवल बनने में ही निकल जाता है, वो अपना होना कभी पहचान ही नहीं पाते है।


बनना या होना दोनों अलग स्थितियां है, लेकिन हम न तो होना समझते है और न ही बनना समझते है, हम पेरेंट्स होने के नाते एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करने में लगे रहते है। उदाहरण के तौर पर एक बच्चा नीट परीक्षा में 720 में से 250 अंक लेकर आता है, भले ही वो क्वालीफाई कर ले, परंतु वो उसका इंटरेस्ट नहीं है, उसे जबरजस्ती उसमें धकेला जा रहा है। यहां हर इंसान के जीवन के दो पहलू है, एक तो उसके भीतर के बीज की पहचान करना और दूसरा उसकी प्रकृति को पहचानना। जीवन इन्हीं दो पक्षों से प्रभावित होता है। अगर पेरेंट्स ने या बच्चों ने इन्हें पहचान लिया, तो जीवन में न केवल कामयाब होंगे, बल्कि खुश भी रहेंगे। प्रकृति के अनुसार बच्चा पटरी से उतरने की ओर दौड़ता है लेकिन अगर हमने उसकी प्रकृति पर पहले ही अर्थात 10 या 12 वर्ष की आयु तक काम कर लिया तो वो अपने भीतर की ऊर्जा के अनुसार कार्य करते हुए जीवन में न केवल खुद खुद रहेंगे, बल्कि अपने मातापिता, परिवार , समाज तथा राष्ट्र के लिए भी उपयोगी बन पाएंगे।
जय हिंद, वंदे मातरम