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पंचकोशीय सिद्धांत पर आधारित शिक्षण को भी सम्मिलित किया गया है, भारतीय शिक्षा बोर्ड के सिलेबस में

 
Teaching based on Panchkoshi theory has also been included in the syllabus of the Indian Education Board
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 Teaching based on Panchkoshi theory has also been included in the syllabus of the Indian Education Board

mahendra india news, new delhi

लेखक
नरेंद्र यादव
नेशनल वाटर अवॉर्डी
यूथ डेवलपमेंट मेंटर
हम सालों से सुनते आए है कि ह्यूमन डेवलपमेंट के लिए पंच कोश सिद्धांत बहुत ही महत्वपूर्ण है, इसे शिक्षा पद्धति में शामिल करना चाहिए, लेकिन ये मानव निर्माण का अनूठा सिध्दांत अभी तक हमारी शिक्षा से दूर ही रहा हैं। शिक्षा, ह्यूमन डेवलपमेंट, ह्यूमैनिटी डेवलपमेंट तथा व्यक्तित्व विकास के लिए अति आवश्यक है। जिस शिक्षा पद्धति से मानव का निर्माण ना होता हो, उसका अधिक लाभ नहीं होता है। वर्तमान में शिक्षा, इंसानों को मशीन तो बना रही है लेकिन मनुष्य नहीं बना पा रही है। हमारे वेद कहते है कि हे इंसान, तू मनूर भव अर्थात मानव बन, तभी तुम अपने कर्तव्यों का पालन कर पाओगे। हमारे तैत्तिरीय उपनिषद में जीवन के अस्तित्वों का जिक्र किया गया है, इसके पांच कोश बताए है। वैसे भी मानव जीवन जीने के चार आधार, धर्म , अर्थ, काम तथा मोक्ष को स्थान दिया गया है।

अगर की बेहतर जीवन जीना चाहते है तो उसका जो महत्वपूर्ण आधार है तो वो धर्म है। धर्म अर्थात कर्तव्य, ड्यूटी, नीति, मर्यादा। यहां धर्म के दस लक्षण बताएं गए है, धर्म कर्म कांड नहीं है, हमारे यहां अधिकतर लोग पूजा पद्धति को ही धर्म मानते है। धर्म वो है जो एक व्यक्ति को मानव बनाने की क्षमता रखता हो। जब हम धर्म से धन कमाना अर्थात ईमानदारी से पैसा कमाना, धर्म से काम करना अर्थात धर्म से काम वासना पर काबू पाना तथा अपने कर्म भी मर्यादित होकर करना, तीसरे धर्म का इतना अभ्यास करना की हम धन, काम वासना, कर्म फल तथा मोह लोभ की आसक्ति से ऊपर उठ जाएं, वहीं मोक्ष की प्राप्ति हैं।

जीवन को अनासक्त होकर जीना ही मोक्ष हैं, इसे ऐसे भी परिभाषित किया जा सकता है कि मोह का क्षय ही मोक्ष है। यहां हम भारतीय शिक्षा बोर्ड की बात कर रहे है, जिसकी स्थापना मानव संसाधन विकास मंत्रालय की संस्तुति से की गई है, जिसका संचालन पतंजलि योग पीठ द्वारा किया जाएगा। इस बोर्ड के पाठ्यक्रम में पंच कोश सिद्धांत को भी सम्मिलित किया गया है, जिसका जिक्र हम पहले भी कर चुके हैं। अब  हम पंचकोशीय सिद्धांत के बारे में चर्चा करेंगे, जिसमें पांच अंग है; पहला अन्नमय कोश, दूसरा प्राणमय, तीसरा मनोमय कोश, चौथा  विज्ञानमय कोश तथा पांचवां आनंदमय कोश है, इससे ही ह्यूमन डेवलपमेंट का सच्चा रास्ता निकलता हैं। आज तक हम इसी सिद्धांत की इंतजार कर रहे थे।

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भला हो भारतीय शिक्षा बोर्ड का जिन्होंने इस सिद्धांत को भारतीय शिक्षा पद्धति में सम्मिलित करने का कार्य किया हैं।  इसके द्वारा हर विषय को पंच कोश सिद्धांत से जोड़ना है। पहले हमे अन्न  के द्वारा बाहरी कोष अर्थात शरीर के विकास की बात करनी होती है, उसके बाद प्राणों को सशक्त करना , फिर अपने मन को स्थिर करने का अभ्यास करने की कला सीखनी है, जीवन को विज्ञानमय तथा तर्कशील बनाना। अंत में जीवन को शांति, संतुष्टि तथा आनंद तक लेकर जाना। पंच कोश सिद्धांत द्वारा हर तरह से मानव का विकास करना, जिसे मानवता या कहें ह्यूमैनिटी का विकास करना है।

जब हम शारीरिक रूप से विकसित होना चाहते है अर्थात शारीरिक रूप से स्वस्थ रहना चाहते है तो हमे अपने अन्नमय कोश को ठीक करना होगा, जिसमें हमारे कारण शरीर को यानी हड्डी, मांस , मज़ा, नस नाड़ी को स्वस्थ रखने पर कार्य किया जाता हैं। भोजन की क्वालिटी तथा शारीरिक परिश्रम पर ध्यान देने की जरूरत है, शारीरिक व्यायाम करने का संकल्प लेना है। भोजन ऐसा हो जिससे सात्विकता बढ़े, वात पित कफ संतुलित रहे, शरीर का विकास सत्व तत्वों से होना चाहिए, तभी तो शरीर सही दिशा में जाने को तत्पर रहेगा।

उसी प्रकार प्राणायाम द्वारा प्राणमय कोश संतुलित करना हैं। प्राणमय कोश में शरीर के अंदरूनी अंग, पाचन क्रिया, सभी वाइटल अंगों के स्वास्थ्य, हृदय के स्वास्थ्य, किडनी, लिवर, तंत्रिका तंत्रों,नर्वस सिस्टम के स्वास्थ्य के लिए प्राणों के आयाम पर कार्य करने की जरूरत है। इससे आगे तीसरे पायदान पर मनोमय कोश, जिसमें इंसानी मन एवं भावनाओं को जाना जाता है, भावनाओं  को स्टेबल करने के लिए प्रयास किया जाता है, यह कोश बहुत ही महत्वपूर्ण कोश है जो मन को नियंत्रित करने का एक सशक्त साधन है। यह कोश मध्य स्तर का है इसमें व्यक्ति कारण शरीर से सूक्ष्म शरीर की ओर बढ़ता हैं। भावनाओं में लोभ मोह, दुख, खुशी, प्रशंसा, को प्रबंध करना भी मानव विकास का तीसरा पायदान है।

इसके बाद विज्ञानमय कोश के विकास पर विमर्श करने की आवश्यकता है, इसमें बुद्धि, तर्कशीलता, विवेक को विकसित करने पर ध्यान दिया जाता है। इस कोश के माध्यम से ही नागरिकों में वैज्ञानिक टेंपरामेंट विकसित किया जा सकता है। यह कोश सूक्ष्म शरीर से  आत्मिक विकास की ओर बढ़ने के लिए अज्ञान से ज्ञान को प्राप्त करना है। पंच कोश में पांचवां कोश आनंदमय कोश, यह सूक्ष्म शरीर से आत्मा की तरफ बढ़ने की क्रिया है, जब हमारा आनंदमय कोश विकसित होता है तभी किसी के जीवन में भी शांति, संतुष्टि तथा आनंद की स्थिति आती है। कोई भी व्यक्ति जब शारीरिक वासना से आगे जाता है तो सुक्ष्म शरीर से होता हुआ फिर आत्मिक सुख को प्राप्त करता हैं।

आनंदमय कोश आत्मा का कोश है जिसमें शांति, प्रेम, स्नेह, वात्सल्य तथा सेटिस्फेक्शन का जन्म होता हैं। मै आप सभी को यही कहना चाहता हूँ कि जो आज हम या हर पेरेंट्स अपने बच्चों की नित नई आदतों से परेशान है, उनकी नकारात्मक गतिविधियों से दिक्कत में है, उनके एग्रेशन, उनके बात बात पर क्रोध तथा अशांति की वजह से परेशान है,  उनका भौतिक वस्तुओं से हद से अधिक लगाव,

शारीरिक वासनाओं के वशीभूत होने के कारण जितने परेशानी में है उन सभी के समाधान का एक ही रास्ता है, कि हमारी प्राथमिक शिक्षा में पंच कोश शिक्षा सिद्धांत को लागू किया जाएं, अन्यथा हमारे बच्चे जीवन में सब कुछ होते हुए भी कभी खुश नहीं रह पाएंगे, कभी संतुष्टि नहीं प्राप्त कर पाएंगे। भारतीय शिक्षा बोर्ड भारत में शिक्षा के पाठ्यक्रम को नया रूप देने का जो पुनीत कार्य कर रहा है, वो निश्चित तौर पर भारतीय विद्यार्थियों के लिए सौभाग्यशाली हैं। यह बोर्ड एक दिन भारत भूमि के सभी विद्यार्थियों के लिए वरदान साबित होगा।
जय हिंद,वंदे मातरम