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वर्तमान युवा पीढ़ी को प्रेम और वासना के अंतर को समझने की जरूरत है, वासना प्रेम नहीं हो सकती

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The current young generation needs to understand the difference between love and lust, lust cannot be love

mahendra india news, new delhi
लेखक
नरेन्द्र यादव
नेशनल वाटर अवॉर्डी
यूथ एंपावरमेंट मेंटर
भौतिकवाद में युवा पीढ़ी कन्फ्यूज्ड है, विचलित है, भ्रम में है, द्वैत में है, भोग के पीछे भागने की कौशिश कर रही है, क्योंकि चारों ओर यही तो परोसा जा रहा है। चारों ओर न केवल जीवन में कॉन्फ्लिक्ट ही कॉन्फ्लिक्ट है, बल्कि वर्तमान युवा प्रेम का अर्थ भी नहीं समझ पा रहे  है। वासना और प्रेम दोनों स्थितियों में बहुत अंतर है, वासना बाहरी जरूरत है, जबकि प्रेम भीतर से उठने वाला गुण है। सारी दुनिया को बाजार बनाया जा रहा है, सारी दुनिया को भोगी बनाने के पश्चिम के प्रयास को समझने की जरूरत है, जिन पर हमे आध्यात्मिक बनाने की जिम्मेदारी थी वो भी आमजन को भोगी ही बनाना चाहते है और पैसा इक्कठा करना चाहते है। युवा पीढ़ी भ्रमित हो गई है कि क्या करें और क्या ना करें।

वर्तमान युवा पीढ़ी को बाजार बनने की तरफ धकेला जा रहा है क्योंकि हम विकास की आंधी दौड़ में भाग रहे है, जिससे हमारे मानव मूल्य और नैतिक मूल्यों का पतन हो रहा है। आध्यात्मिक क्षेत्र में कार्य करने वाले महापुरुष भी उन्हें मानव बनाने की बजाय उपभोक्ता बनाने की ओर ले जा रहे है। जब हम जन्म से भोग को देखते आ रहे है तो फिर युवा होकर वो भी उसी दौड़ में भागने लगेंगे, जिसके परिणाम आज हमारे सामने दिखाई दे रहे है। वर्तमान में युवाओं की शादियां टूट रही है क्योंकि हमारी युवा पीढ़ी भौतिकवाद उनका आधारभूत विचार बन गया, आज व्यक्ति ऑब्जेक्ट बनकर जीवन जीने की राह पर है। जिन्हें सब्जेक्ट होना चाहिए था वो ऑब्जेक्ट बनकर खुश है, और अगर एक इंसान वस्तु बनना चाहता है तो फिर वस्तु का तो उपभोग ही होगा, वस्तु आध्यात्मिक नहीं हो सकती है, युवाओं को मानव होने का एहसास जगाना पड़ेगा।

प्रेम और वासना में यही सबसे बड़ा अंतर है, कि प्रेम भीतरी सजगता है तथा वासना बाहरी चाहत है। वासना भोग चाहती है, वासना उपयोग होना चाहती है लेकिन इसके विपरित प्रेम स्थिरता है, प्रेम सहजता है, प्रेम स्थाई है, प्रेम एक अवस्था है, प्रेम में देना है मांगना नहीं है, प्रेम में भौतिकवाद की कहीं जगह नहीं है। प्रेम में बनावट नहीं है, प्रेम में सजावट नहीं है, प्रेम दिखावा नहीं है, प्रेम किसी को ठगना नहीं है, प्रेम में तो भोलापन है, प्रेम जैसा है वैसा ही स्वीकार करता है, वैसा ही दूसरों को समर्पित है। वासना में भोग है, शारीरिक है, आकर्षण है, वासना दिखावा है, अधूरापन है, लेकिन इसके विपरित प्रेम पूर्ण है, सहज है, किसी को दिखना नहीं है, प्रेम जीवन की सहज धारा है। प्रेम आत्मिक है, जो आत्मा से आत्मा को जोडता है,

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जो आत्मिक है और वासना शारीरिक है जो प्लेजर ही है, जब भोग पूरा हुआ तो वासना पूरी हो जाती है, इसके साथ ही जिसे हम प्रेम समझते है वो आकर्षण भी पूरा हो जाता है। वर्तमान युवा पीढ़ी को प्रेम और वासना के आकर्षण को समझने की आवश्यकता है। जैसे ही किसी भी बच्चे में किशोरावस्था शुरू होती है, उनमें हार्मोनल बदलाव शुरू होता है, तो उनका विपरीत सेक्स की ओर आकर्षण बढ़ने लगता है, वो सेक्स के प्रति आकर्षण है वो प्रेम नहीं है। वासना स्थाई नहीं है लेकिन प्रेम स्थाई है। प्रेम ह्यूमन का एक सतत गुण है, जो इंसान के जीवन तक उसमें रहता है।

प्रेम किसी एक से नहीं बल्कि हर प्राणी से होता है, प्रेम मानव मूल्य की श्रेणी में आता है। वासना एक भूख है, चाहत है जिसे पूरा करने के लिए व्यक्ति कुछ भी प्रपंच रचता है, झूठ फरेब का सहारा लेता है, अपने विपरित लिंग को बहकाता है, फुसलाता है, परंतु प्रेम तो होता है वो सभी के लिए ही प्रेम की भावना के साथ ही होती है। जब हम किसी को प्रेम करते है तो उसमें डिमांड नहीं होती है, उसमें मांगना नहीं है बल्कि कुछ देने का मन होता है, समर्पण होता है। वर्तमान युवा पीढ़ी को प्रेम और वासना को समझने की जरूरत इसलिए भी है, क्योंकि उसी के वशीभूत होकर आजकल युवा शादी विवाह के बंधन में तो बंध जाते है लेकिन कुछ दिनों में जैसे ही वासना की पूर्ति होती है तो फिर शारीरिक आकर्षण कम होने लगता है, कुछ दिनों के बाद शारीरिक आकर्षण बिल्कुल समाप्त होने पर लड़ाई झगड़े शुरू होते है, जिसके कारण शादी विच्छेद हो जाता है।

जीवन में शादी विवाह प्रेम का बंधन है, अगर शादी हो जाती है तो अपने वैवाहिक जीवन के लिए त्याग की भावना को विकसित करने की जरूरत है, धैर्य विकसित करने की आवश्यकता है, आपसी मतभेद को मनभेद नहीं बनने देना है, वो तभी हो पाएगी, जब हम जो जैसा है उसे वैसा ही स्वीकार करें। प्रेम किसी को दबाना नहीं है, किसी को बदलने की शर्त नहीं है, प्रेम किसी के शरीर का अट्रैक्शन नहीं है, प्रेम तो सद्भाव है, प्रेम तो करुणा है, प्रेम तो ईमानदारी है, सत्यता है। प्रेम में छलावा नहीं है, झूठ नहीं है। प्रेम करने वाले तो एक दूसरे के सभी दुख दर्द खुद उठाने की क्षमता रखते है, ये कोई रोटी की भूख थोड़े ही है कि भोजन किया और प्रेम खत्म, प्रेम कोई दिखावा थोड़े ही है कि कुछ दिनों में समाप्त जो जाएं।

वर्तमान युवा पीढ़ी ये बात अच्छी तरह समझ लें कि इंसान वस्तु नहीं है वो भोग की वस्तु नहीं है, वो यूज करने की वस्तु नहीं है, इसलिए कोई भी किसी मेल फीमेल को वस्तु न समझें, उसे जीवन समझे और उसके साथ मानव मूल्यों के साथ व्यवहार करें। विवाह एक संस्थान की तरह है, उसके कुछ नियम कानून होते है, जैसे परिवार, समाज व राष्ट्र विकास के लिए नियम होते है। अगर विवाह को गुड्डे गुड़िया का खेल समझा जाएगा, तो फिर हमे समझ लेना चाहिए कि हम पतन की ओर जा रहे है।

अगर युवाओं को प्रेम और वासना में अंतर समझना है तो उन्हें पांच बातों पर विमर्श करना होगा, जैसे;
1. युवाओं को समझना होगा कि अगर वो किशोरावस्था में है तो उनका विपरीत लिंग की ओर आकर्षण प्रेम नहीं, वासना है।
2. युवाओं को समझना होगा कि अगर वो अपने करियर की बजाय विपरीत सेक्स की तरफ लालायित है तो वो प्रेम नहीं वासना है।
3. युवाओं को समझना होगा कि अगर वो अपनी वासना की पूर्ति के लिए अपने ब्रह्मचर्य आश्रम को भी भूल रहे है, करियर को भी भूल रहे हैं, तो यह सम्पूर्ण रूप से वासना ही है।


4. युवाओं को समझना चाहिए कि उनकी विपरीत सेक्स से कुछ चाहना है या दूसरों का ख्याल रखना है, अगर उनका आकर्षण केवल कुछ चाहने के लिए है, या अपने विद्यार्थी जीवन के लक्ष्य को छोड़कर किसी दूसरे लक्ष्य की तरफ भागते है, तो यह शुद्ध रूप से वासना है।
5. युवाओं को समझना होगा कि अगर उनका कोई दोस्त विपरीत लिंग के है और तुम्हार व्यवहार उनके साथ सहयोग का है, सद्भावना का है, करुणा का है तो ये प्रेम हो सकता है अगर ऐसा नहीं है तो फिर वो वासना ही होगी।


प्रेम को और बेहतर तरीके से समझने के लिए एक मां का बच्चे के प्रति स्नेह को समझने की जरूरत है जहां कोई चाहत नहीं है केवल खुशी ही है, स्नेह आंतरिक अटैचमेंट है, जिसके लिए अपनी सभी जरूरतों को कुर्बान किया जा सकता है। जिस प्रकार एक पिता अपने बच्चों के लिए अपनी सभी खुशियों को त्याग देता है वहीं प्रेम है,वो स्नेह है। प्रेम में न अधिकार है, न चाहत है, न लेना है,

न जबरजस्ती है, न तक़लीफ देना है, न अपने जैसा बनाना है, प्रेम देने का नाम है, ख्याल रखने का नाम है, प्रेम कर्तव्य है, प्रेम जिम्मेदारी है, जैसा है उसे वैसे ही खुशी से स्वीकारने का नाम है। परंतु वासना केवल शारीरिक है, चाहत है, कुछ पाने चाहत ही है, किसी को नियंत्रित करने की चाहत है। प्रेम मानव का नैसर्गिक गुण है जो किया नहीं जाता है वह तो होता ही है। भगवान श्रीकृष्ण जी महाराज  गीता में कहते है कि" पत्रम पुष्पम फ़लम तोयम यो में  भक्तत्या प्रयच्छति। तदत भक्ति उपहृतम असनती प्रयत ।।" अर्थात  जो मुझे भक्ति पूर्वक, प्रेम पूर्वक पत्र फूल फल या पानी भी प्रेम पूर्वक अर्पित करता है तो शुद्ध भाव से अर्पित की गई वस्तु को प्राप्त करता हूँ। यानी भगवान श्रीकृष्ण जी कहते है कि मैं प्रेम का भूखा हूं, मुझे प्रेम चाहिए, मुझे प्रेम पूर्वक भाव चाहिए, कर्मकांड नहीं चाहिए। वर्तमान युवाओं को एक महत्वपूर्ण सलाह दी जाती है कि वो शादी विवाह का निर्णय लेने से पहले अपने सभी गुण दोषों को अच्छी तरह परख लें। किसी को बहकाना नहीं, किसी को भ्रमित करके भटकावों मत, किसी के साथ धोखा मत करो, किसी को वासना के प्रति वशीभूत होकर घर से बेघर मत करो, क्योंकि वासना की पूर्ति से भी महत्वपूर्ण बहुत से कर्म है। इसलिए अपने हर कर्म को अच्छी तरह परख कर अंजाम दे, जिससे आपका निर्णय आगे चलकर पछतावा न बने। युवा अपनी संपूर्ण ऊर्जा को अगर पढ़ाई में लगाएंगे तो वासना कभी तंग नहीं करेगी।
जय हिंद, वंदे मातरम