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स्वतंत्र से गणतंत्र बनने का सफर जवाबदेही का है, इसे समझने की जरूरत है, ताकि लोकतंत्र सशक्त हो सकें

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लेखक
नरेंद्र यादव
नेशनल वाटर अवॉर्डी
यूथ एंपावरमेंट मेंटर
स्वतंत्रता भी द्विआयामी होती है एक तो स्वयं की स्वयं से स्वतंत्रता और दूसरा आयाम हैं दूसरों की परतंत्रता से स्वतंत्र होना। बिना दोनों प्रकार की स्वतंत्रता के कोई भी व्यक्ति गणतांत्रिक व्यवस्था को नहीं समझ सकता है। हमे 1947 में अंग्रेजी शासन से तो आजादी मिल गई परंतु खुद के लोभ लालच, स्वार्थ या व्यसनों से खुद के मन मस्तिष्क को स्वतंत्र करने में कुछ लोग कामयाब ही नहीं हो पाए, वो वैसे ही अंग्रेजी शासन में थे और वैसे ही अब है। भारत 26 जनवरी 1950 को गणतंत्र भी बन गया, फिर भी हम एक दूसरों के अधिकारों का हनन करते है, जो महानुभाव अपने खुद के स्वार्थ को लेकर चलते है वो कभी गणतांत्रिक नहीं बन पाते है, क्योंकि गणतंत्र तो जनता द्वारा जनता का शासन होता है। उस जनता का शासन नहीं, जो केवल अपने बारे में सोचती है, उस जनता का शासन, जो अपने पड़ोसी का भी ख्याल नहीं करती है, वो जनता जिनको मतदान करने का भी समय नहीं होता है, या उस जनता का शासन नहीं जो बेईमानी व भ्रष्टाचार से सब कुछ अपने पास ही रखने का मन रखती है।

स्वतंत्रता और गणतंत्र के बीच में जो महत्वपूर्ण पायदान है वो समाज के रूप में है, अगर समाज को तोड़ दिया जाए या समाज जातियों में बंट जाए, या समाज दलों में बंट जाए, या समाज में आपाधापी हो जाए तो वो क्षीण हो जाता है, उसका ताना बाना बिखर जाता है। समाज एक ऐसा मैकेनिज्म होता है जो किसी व्यक्ति व कार्य या समूह के कार्य का ऑडिट  करता है और उसे नैतिक मूल्यों के साथ सकारात्मक दिशा तथा विकास उन्मुख करता है,

अगर वो ही समाज छोटे छोटे समुदायों में बंट जाए, कुछ असामाजिक लोगों के प्रभाव में आ जाए, जब स्वार्थी तत्वों व नकारात्मक महानुभावों के चक्कर में फंस जाए तो फिर वही समाज खुद के प्राणों की भी रक्षा नहीं कर सकता है। जैसे दूसरों की परतंत्रता से छुटकारा पाने के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती है वैसे ही अपने लोभ लालच व स्वार्थी मन से लड़ने के लिए भी योग जैसी विद्या का सहारा लेना पड़ता है, अभ्यास करना पड़ता है, तभी जाकर एक व्यक्ति  कुटुंब, समाज व राष्ट्र के लायक बनता है। एक स्वार्थी व्यक्ति समाज व राष्ट्र के लिए बहुत घातक होता है,  गणतंत्र बनने के लिए अपनी सीमाओं में रहकर, परमार्थ की भावना से दूसरों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए भी तत्पर रहना होता है, तभी हम वैयक्तिक रूप से गणतांत्रिक बनने की राह अपनाते है। स्वतंत्र से गणतंत्र होने का सफर लंबा है, खुद के अहंकार को त्याग कर सभी के साथ सहअस्तित्व की भावना से जीवन जीने का नाम गणतंत्र है। इस धरती माता ने सभी को समान अधिकार दिए है, उसकी झोली में सभी के लिए सब कुछ है, लेकिन कुछ स्वार्थी लोग उसका दोहन अपनी कभी न पूरी होने वाली भूख को शांत करने के लिए करते है परंतु ऐसा कभी हो नहीं पाता है। सबके द्वारा सबका ध्यान रखना, यही तो गणतंत्र है, यही तो गणतांत्रिक व्यवस्था है, अगर हमने सबका ख्याल करना ही छोड़ दिया, अपने ही पड़ोसी के भोजन की चिंता छोड़ दी, अपने नागरिकों की शिक्षा व स्वास्थ्य की चिंता छोड़ दी, तो फिर हमारी गणतंत्र बनने की राह स्पष्ट नहीं बन पाती है। जब तक मन गुलामी की पीड़ा से आजाद नहीं होगा तब तक वह अपनी गणतांत्रिक यात्रा पर नहीं निकल पाएगा। भारत भूमि पवित्र, पुण्य की भूमि है, भारत भूमि ऋषि मुनियों, वेद शास्त्रों की धरती है, भारत भूमि श्रीमद्भगवद् गीता, रामायण तथा उपनिषदों की धरती है, भारतभूमि गंगा यमुना सरस्वती की धरती है, इसलिए यहां स्वार्थ से अधिक परमार्थ को माना जाता है, लेकिन ये काया से ही नहीं मन से होती है, जब से समाज विखंडित होना शुरू हुआ है, बड़े बुजुर्गो के अनुभवों को तिलांजलि देना शुरू हुआ है, मातापिता से ज्यादा बच्चे खुद को अधिक समझदार मानते है,

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संवाद हीनता के कारण जनरेशन गैप बढ़ा है, तब से ही सामाजिक नेतृत्व खत्म होने के कगार पर पहुंच गया है। राजनीति चाहे किसी भी देश की हो, उसमें राजनीतिक लोग सबसे पहले समाज को विभाजित करने के लिए जतन करते है क्योंकि जब तक समाज सशक्त रहेगा, तब तक मतदाताओं में विभाजन नहीं हो सकता है। और जब तक मतदाता सामाजिक विमर्श तथा राष्ट्रीय विमर्श को छोड़कर व्यक्तिगत विमर्श तक नहीं पहुंचेंगे, तब तक मतदाताओं में विभाजन  होगा ही नहीं। सामाजिक तानाबाना ही हमारी राष्ट्रीय ताकत है, हमारी राष्ट्रीय एकता और बंधुता है। जब कुछ लोग अपने स्वार्थ के कारण हमारी सामाजिक सद्भावना को सामुदायिकता तक ले जाते है तो समाज शक्तिहीन हो जाता है, वह बिखर जाता है, उसकी एकता खंडित हो जाती है, सद्भाव को खत्म करने के लिए कोई भी बड़े बुजुर्गो का कहना मानना बंद कर देते है, इसी लिए आजकल सामाजिक सद्भाव की सुरक्षा की आवश्यकता आन पड़ी है। समाज इतना खंडित हो गया है कि एक ही परिवार का हर सदस्य अपनी खुद की मर्जी से मतदान करता है, अब ऐसा तो है नहीं कि राष्ट्र के या सत्य के कई पक्ष हो जाए, जीतना तो सत्य को ही चाहिए, लेकिन हर सदस्य अपने स्वार्थ को ध्यान में रखकर या उन्हें भ्रमित करके उनसे वोट लेने के कार्य के लिए उन्हें अलग अलग किया जाता है। समाज और राष्ट्र के विकास की एक ही धारा होती है और वो सत्य सद्भावना कर्मठता की धारा है, जिसे हम सभी को समझने की जरूरत है। सभी के मिले झूले प्रयास से ही लोकतंत्र सशक्त बनता है परंतु उसके लिए हम सभी को अपने अपने निजी हित छोड़ने होंगे। गणतंत्र का अर्थ ही सबके लिए, सभी का प्रयास हो, सभी के हित की बात हो, सभी की बुद्धि विवेक के उपयोग के लिए सभी को समान अवसर मिलें। जब हम एक पक्ष में खड़े हो जाते है तो हमे केवल अपने पक्ष के लोग ही दिखते है, भले ही वो बुद्धिहीन हो, अविवेकी हो, बेईमान हो, भ्रष्ट हो, अपराधी हो, पक्षपाती हो, क्योंकि वो ही तो उस पक्ष के लिए कार्य करते है। राष्ट्र और समाज एक पक्ष से नहीं, बल्कि सभी पक्ष की ताकत से चलता है, पॉलिटिकल पार्टियां भले ही अलग अलग हो लेकिन मेहनतकश, ईमानदार, सत्यवादी, देशभक्त लोग तो सदैव राष्ट्र और समाज को ही शक्तिशाली व अखंड बनाने का ही कार्य करते है और वही गणतांत्रिक यात्रा होती है। मानसिक रूप से स्वतंत्र होकर अर्थात निष्पक्ष होकर ही कोई व्यक्ति गणतंत्र बनने के सफर में शामिल हो सकता है क्योंकि पक्षपात व निजी हित के लिए विमर्श करने वाला कोई भी व्यक्ति गणतंत्र को समझ भी नहीं सकता है। उनके लिए तो बस वो एक व्यवस्था है, जो  स्वतः ही चलती है। परंतु गणतंत्र में स्वतंत्र मानसिकता के लोग निजी हित छोड़कर सभी के लिए कार्य करते है, इसे ही तो सर्वोदय या अन्तोदय भी कहते है, आखिर छोर पर खड़े नागरिक को भी शिक्षित करना है, उसके स्वास्थ्य का ध्यान भी रखना, उसे भी मेहनत करने का अवसर देना है, उसे भी शुद्ध पानी और पौष्टिक भोजन देना है, उसे भी भारत के विकास की धारा में शामिल करना, उसे भी संस्कारवान बनाना है, उसके जीवन की भी सुरक्षा करनी है, उसकी प्रतिष्ठा व गरिमा की भी रक्षा करनी है, तभी तो हम विकसित भारत बनेंगे। आओ गणतंत्रता को समझें और खुद को व्यक्तिगत रूप से उस लायक बनाएं।
जय हिंद, वंदे मातरम