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सरकारी स्कूलों में लड़खड़ाने लगी मिड-डे-मील योजना: राजरानी अनेक स्कूलों में अनाज व राशन खत्म

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राजरानी अनेक स्कूलों में अनाज व राशन खत्म

 
 mahendra indianews 
बच्चों की संख्या के साथ-साथ घटाई जा रही कर्मचारियों की संख्या, रोष
सिरसा। राजकीय विद्यालयों में चल रही मिड-डे-मील योजना लड़खड़ाने लगी है। जिले के कई विद्यालयों में अनाज और अन्य राशन खत्म हो चुका है। ऐसे में भोजन पकाने के लिए शिक्षकों को अपने स्तर पर सामान खरीदना पड़ रहा है। इससे शिक्षकों को दिक्कत हो रही है। वहीं, फुटकर सामान लेने पर पैसे भी ज्यादा लग रहे हैं।

 

मिड-डे-मील यूनियन की जिला प्रधान राजरानी ने बताया कि सरकार की ओर से एफसीआई, विद्यालयों में गेहूं और चावल की सप्लाई पहुंचाता है। वहीं, हरियाणा एग्रो से दाल, दलिया, मसाले सहित अन्य सामग्री पहुंचाई जाती है। सभी विद्यालयों में सप्लाई दो से तीन महीने की दी जाती है। हालांकि विद्यालयों के पास भंडार के लिए पर्याप्त जगह नहीं है

 

, लेकिन नियमित रूप से सप्लाई न आने के कारण शिक्षक एक साथ सामान ले लेते हैं। करीब एक महीने से विद्यालयों में राशन खत्म हो गया है और अभी तक दोबारा सप्लाई नहीं भेजी गई है। करीब तीन महीने पहले विद्यालयों में सप्लाई दी गई थी, इसके बाद अब सामान खत्म हो गया है और मिड-डे-मील वर्कर्स व शिक्षक सामान की राह देख रहे हैं, लेकिन सप्लाई आने की उन्हें सही जानकारी नहीं मिल पा रही है। कुक और शिक्षक विभाग से मांग कर चुके हैं, लेकिन कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिल रहा है।

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उन्होंने बताया कि मिड-डे-मील वर्कर्स जो सरकारी स्कूलों में बच्चों को साफ-सुथरा भोजन पकाकर उनका पेट भरती हैं, उनको मानदेय 10 महीने मिलता है, लेकिन वो भी सही ढंग से नहीं मिल रहा। हजार रुपया केंद्र सरकार देती है, 6 हजार राज्य सरकार देती है। कभी तो राज्य सरकार का पैसा लेट हो जाता है, तो कभी केंद्र सरकार का पैसा लेट हो जाता है। जिला प्रधान ने बताया कि अभी हाल ही में 4-5 महीने का जो केंद्र का शेयर है, वो अभी नहीं आया। बिल बनाकर पंचकूला पहुंचा दिए गए हैं,

लेकिन पंचकूला से जो मिड-डे-मील का केंद्र का शेयर है, वो वहीं से अप्रूवल होकर आता है। अभी तक 4-5 महीनों से नहीं मिला। जब राज्य सरकार का पैसा आता है तो वो भी एक महीने का पेंडिंग रख लेते हैं, फिर डालते हैं। मांग है कि हर महीने की 7 तारीख तक मानदेय खाते में भेजा जाए, ताकि वर्कर्स बिना टेंशन के बच्चों के लिए खाना बना सकें। 2026 का वर्दी का पैसा भी अभी तक नहीं आया है।
बड़ी संख्या में विधवा महिलाएं कर रही काम:
राजरानी ने बताया कि बड़ी संख्या में विधवा महिलाएं भी इस काम में लगी हुई हैं। पैसा लेट आने से बच्चों का पालन-पोषण, दवाई, पढ़ाई का खर्चा चलाना मुश्किल हो जाता है। मजबूरी में प्राइवेट लोन लेना पड़ता है और किश्त न भर पाने पर परेशानी होती है।
बच्चों की संख्या घटने के साथ ही कर्मचारियों की घट रही संख्या:


जिला प्रधान ने बताया कि स्कूलों में जब बच्चों की संख्या कम हो जाती है तो वर्कर को हटा देते हैं। मान लो एक स्कूल में तीन वर्कर काम कर रही हैं और बच्चों की संख्या कम हो गई तो एक वर्कर को हटा दिया, अब पीछे दो वर्कर रह गईं। अभी सरकार ने लेटर निकाल दिया कि नौवीं से बारहवीं तक बच्चों को दूध पिलाना है और चॉकलेट भी बांटनी है

। किसी स्कूल में सौ बच्चे हैं, किसी में अस्सी बच्चे हैं नौवीं से बारहवीं तक के। उनके गिलास भी धोने पड़ेंगे, दूध भी पिलाना पड़ेगा, तो वर्कलोड तो बढ़ गया। उधर से जो बच्चे कम हुए थे तो एक वर्कर हटा दी गई थी, अब दो वर्कर रह गईं। तो वर्कलोड तो उन दो वर्करों पर पड़ेगा। इसी को मद्देनजर देखते हुए मांग है कि वर्करों को बच्चों की संख्या कम होने के कारण हटाया ना जाए, ताकि जो तीन वर्कर हैं वो दूध पिलाने का काम भी मिलकर कर सकें।