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विद्यार्थियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण स्किल अनुशासन है, यह अभ्यास से ही विकसित होता है

 
The most important skill for students is discipline, it develops only through practice
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 The most important skill for students is discipline, it develops only through practice

mahendra india news, new delhi

लेखक
नरेंद्र यादव
नेशनल वाटर अवॉर्डी
यूथ डेवलपमेंट मेंटर
"अथ योग अनुशासनम" अर्थात अब योग का अनुशासन शुरू होता है, अथ का अर्थ है अब, योग मतलब चेतना से जुड़ने का अभ्यास करना। कहते जब हम योग से जुड़ते है तो हमारे जीवन में अनुशासन रूपी गुण स्वयं आता है। योग विद्यार्थी जीवन को ज्ञान से, संयम से, नियम से, मेहनत से तथा आज का कार्य आज ही करने को प्रेरित करता है। जीवन को आलस्य से जीवटता से जोड़ने का प्रयास करता है। जिस प्रकार तन मन को नियंत्रित करने के लिए कठोर अनुशासन की आवश्यकता है, उसी प्रकार जीवन में हर कर्म को लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए भी संयमित जीवन की जरूरत होती है। महर्षि पतंजलि महाराज के योग दर्शन का पहला सूत्र है, अथ योग अनुशासनम।

आम लोग अक्सर कह देते है कि इससे क्या होगा? प्रिय विद्यार्थियों, हमारे शास्त्रों में जितने भी सूत्र, श्लोक या मंत्र लिखित है वो ऐसे ही जीवन में काम करते है जैसे गणित के फार्मूले कार्य करते है और मैथमेटिक्स के प्रश्न हल करने में मदद करते है, ये सूत्र जीवन को सशक्त बनाने के फार्मूले ही तो है। अगर योग रूपी दर्शन जीवन में उतारना है तो अनुशासन से जुड़ने का अभ्यास करना है तो योग चाहिए और योग से जुड़ना है तो अनुशासन चाहिए। योग करने का विषय है, योग अभ्यास का विषय है, योग क्रिया का विषय है, योग पढ़ने का विषय नहीं है, योग रटा मारने का विषय नहीं है।

इसी तरह किसी भी विद्यार्थी के लिए जीवन पथ पर चलने के लिए नियम अर्थात नियमित व निरंतरता के साथ जीवन जीने की जरूरत होती है। अनुशासन का पहला सिद्धांत  संयम, धैर्य, नियम से है, इसमें आलस्य का निग्रह करना, आलस्य का निरोध ही करने का अभ्यास है। अनुशासन शब्द लैटिन भाषा के डिस्प्लीना शब्द से अंग्रेजी में आया है, यह डिस्प्लीना से डिस्प्लिन में बदल कर आया और उसी से अनुशासन शब्द का उद्गम हुआ है। डिस्प्लीन का अर्थ होता है खुद को निर्देशन एवं प्रशिक्षण देना। हम कई बार अनुशासन को दंड से जोड़ देते है जो बिल्कुल गलत है, अनुशासन दंड नहीं है, अनुशासन तो जीवन जीने उत्तम कला है।

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अनुशासन में व्यक्ति स्वयं को निर्देश देने का कार्य करता है और फिर उसके लिए प्रशिक्षण देकर, सशक्तिकरण करता हैं। इस ब्रह्मांड में सभी कुछ तो अनुशासित है, जिसे हम ऋत भी कहते है। पृथ्वी का अपनी धुरी पर घूर्णन तथा सूर्य के चारों ओर परिक्रमण, सूर्य का चमकना, चंद्रमा का शीतलता प्रदान करना, सभी ग्रहों का नियमित रूप से सूर्य का चक्र लगना, इंसानों को छोड़ सभी जीवों का जीवन भी तो अनुशासित ही है, कही कोई चूक नहीं है, लेकिन एक मनुष्य ही है जिसके जीवन में अनुशासन अनुशासन की ट्रेनिंग देनी पड़ती है, फिर धीरे धीरे विकसित करने का अभ्यास किया जाता है। जब भी अवसर मिले तो इंसान अनुशासन से भागने की कौशिश करता है, अनुशासन को  भंग करने का प्रयत्न करता है। एक इंसान को यह नहीं पता कि उसको भोजन में क्या खाना है, कितना खाना है,

भोजन के स्वाद के अनुसार उसकी मात्रा ऊपर नीचे हो जाती है, इंसान को यह भी नहीं पता है कि उसे कितना नमक लेना है, उसे कितना मीठा खाना है, इसका भी एहसास वो खुद नहीं कर पाता है, उसे कितनी शारीरिक मेहनत करनी चाहिए, उससे भी वह बचने की कोशिश करता है, इंसान को अपने स्वास्थ्य का भी ध्यान रखना नहीं आता है, उसमें इतनी संवेदना नहीं है कि क्या खाना उनके लिए हानिकर हैं, कितना खाना है वो भी नहीं पता है, और उनके भोजन में कौन कौन से पौष्टिक तत्व है। बस समय होते ही ब्रेकफास्ट, लंच तथा डीनर के नाम पर पेट में खाना भरने भर के लिए लालायित होता है, चाहे भूख लगे या न लगे। कभी किसी के कहने पर खाना पड़ता है, कभी किसी को खुश रखने के लिए पीना पड़ता है, कभी किसी के प्रभाव में आकर झेलना पड़ता है। अरे युवा दोस्तों, सभी को एक जैसा भोजन नहीं चाहिए, क्योंकि सभी की तासीर एक जैसी नहीं है, सभी के कार्य एक जैसे नहीं है अर्थात एक जैसी मेहनत नहीं करते है। शरीर में वात, पित, कफ की स्थिति एक जैसे नहीं है, इसलिए अपने शरीर की सुनो और उसके अनुसार चलो, बिना विचारे कुछ नहीं करना चाहिए यानी बिना योग के अनावश्यक निर्णय लेने की जरूरत नहीं है।

विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर ही हम यहां विमर्श कर रहे है, क्योंकि सीखने की उम्र यही हैं। जीवन को नियम से चलाना ही अनुशासन का पालन है या यूं कहे जीवन को अनुशासन से चलाना ही नियम का पालन है। विद्यार्थियों को अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए अनुशासन ही स्टेयरिंग का कार्य करता है। स्टेयरिंग अर्थात जितनी जरूरत हो, सजगता के साथ उतना ही इधर उधर ले जाओ, जीवन को स्थिल नहीं करना है, जीवन को अंधता से नहीं चलाना है, किसी के अंधे अनुकरण से नहीं चलाना है। अनुशासन स्टीयरिंग है जो विद्यार्थी जीवन की दिशा वा दशा तय करता है, जैसे आपके शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्टेबिलिटी, सामाजिक संबंधों में प्रगाढ़ता तथा आर्थिक व्यवस्थाओं को सशक्तिकरण प्रदान करता हैं।

एक विद्यार्थी की सुबह सोकर उठने से लेकर रात में सोने तक की हर गतिविधि अनुशासन से ही संचालित होती है, जहां अनुशासन टूटा, समझो जीवन भटक गया। हर विद्यार्थी के समय का प्रबंधन बिना अनुशासन के तय नहीं किया जा सकता है, बिना अनुशासन के लक्ष्य भी निर्धारित नहीं किया जा सकता है, बिना अनुशासन के कोई भी विद्यार्थी बड़े विमर्श की ओर नहीं बढ़ सकता है। विद्यार्थी जीवन में ही कोई बच्चा अनुशासन का अभ्यास करना सीखता है, वही अनुशासन जीवन भर उसके तन , मन, धन, पन, अन्न, तथा गण को अनुशासित करता है। अनुशासन का अर्थ है नियमों का पालन करना, अपने खुद के व्यवहार को नियंत्रित करना, अपनी आदतों को ट्रैक कर उनमें सुधार करना है। अनुशासन दंड नहीं है, ये कोई पनिशमेंट नहीं है।

नियम का पालन करना ही अनुशासन कहलाता है, जीवन को दिन 24 घंटे के श्रेष्ठ उपयोग को सिखाता है, समझ के एक एक क्षण को उपयोगी बनाने की ट्रेनिंग देता है। विद्यार्थी जीवन क्योंकि ट्रेनिंग का काल होता है, शिक्षण प्रशिक्षण का समय होता है, इसलिए उन्हें दूसरे के निर्देशन, शिक्षण तथा प्रशिक्षण से अधिक स्वयं के निर्देशन तथा प्रशिक्षण की आवश्यकता होती हैं, उसी से जीवन बदलता है।

यहां हमे विद्यार्थियों को यह समझाने की जरूरत है कि अपनी नियमित पढ़ाई के साथ साथ खुद के निर्देशन व प्रशिक्षण पर भी कार्य करें, वो अपनी रोज की गतिविधियों को भी देखें, अपनी आदतों को भी जानने का अभ्यास करें तथा उनमें से अनावश्यक गतिविधियों या फिर नकारात्मक आदतों को सुधारने के लिए स्वयं को निर्देश दे, स्वयं को आदेश दें, स्वयं को दिशानिर्देश दें, स्वयं से बात करे, जैसे प्रातः जल्दी उठना, मोबाइल का उपयोग कम उपयोग, समय का सदुपयोग, पढ़ाई के समय का निर्धारण करने के लिए खुद को कहें।

इसके अनुपालन के लिए अपनी गतिविधियों का एक चार्ट तैयार करें, जिससे विद्यार्थी अपने समय को समयसारिणी में बांध पाएं। जीवन को जीते तो सभी है , समय भी सभी के पास बराबर है, शरीर बुद्धि भी सभी के पास है लेकिन जीवन का स्तर सभी का अलग अलग होता है, इसका कारण केवल जीवन में अनुशासन के स्तर का हैं। जिसका जीवन अनुशासित है उसका समय भी अनुशासित है, उसका भोजन भी अनुशासित है, उसका पहनावा भी अनुशासित है, उसका विचारना भी अनुशासित है, उसका विमर्श भी अनुशासित है, उसकी इच्छाएं भी अनुशासित है, उसका देखना भी अनुशासित है, उसके विचारों का प्रवाह भी अनुशासन में है। विद्यार्थी जब अनुशासन के घोड़े पर सवार होता है तो सफलता और प्रसन्नता उसके जीवन में घटित होती है, जिसका वो विद्यार्थी सदैव आनंद उठाता है। सर्वश्रेष्ठ का आनंद, जीवन को आदर्श बनाता है।
जय हिंद, वंदे मातरम