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समाज की वेल्थ शिक्षा है, शिक्षा मानव उत्थान में प्रश्न, तर्कशीलता, व ज्ञान की जिज्ञासा के रूप में प्रदर्शित

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The wealth of society is education, education is reflected in the form of questions, rationality and curiosity for knowledge in human development

mahendra india news, new delhi
लेखक
नरेंद्र यादव
नेशनल वाटर अवॉर्डी
यूथ एंपावरमेंट मेंटर
एक समय था जब लोग अपने पारंपरिक हुनर को छोड़कर शिक्षा की ओर अग्रसर हुए, हर नागरिक शिक्षा प्राप्त करें, ये राष्ट्रीय मुद्दा था और आज भी है। विषय बहुत ही गंभीर है, जिस पर विमर्श होना ही चाहिए, क्योंकि हमारे यहां शिक्षा लेने के अर्थ को ही बदल दिया है। हमारी शिक्षा ह्यूमन डेवलपमेंट को छोड़कर केवल आजीविका प्राप्त करने या नौकरी पाने का टूल बन कर रह गई है।

अगर कोई स्कूल कॉलेज विश्वविद्यालयों में पढ़ने के लिए एडमिट होते है तो वो केवल नौकरी प्राप्त करने के लिए ही होते है। कितनी बड़ी विडंबना है कि जिस शिक्षा को मानव निर्माण के लिए आवश्यक माना जाता था, वो आज न केवल नौकरी पाने के लिए एक सर्टिफिकेट या डिग्री तक सीमित हो गई है, बल्कि शिक्षा का अर्थ कागज का एक सर्टिफिकेट मात्र रह गया है चाहे वो कैसे भी प्राप्त हो, वो कैसे भी नकल से, जुगाड से कैसे भी प्राप्त हो सकें, बस डिग्री मिल जाए तो नौकरी मिल जाएगी, जबकि शिक्षा एक इंसान को सभ्य बनाने, तर्कशील बनाने, अपने गुणों में इजाफा करने,

अपनी नैतिकता में उत्थान करना, अपनी संस्कृति व संस्कारों में बढ़ोतरी करना, अपने समाज व राष्ट्र को सशक्त बनाने तथा एनालिसिस करने के लिए प्रशिक्षित करती है। शिक्षा कोई फाइलों में रखने वाले कुछ कागज नहीं है, शिक्षा मानव मूल्यों के विषय में ज्ञान करना है, किसी विषय को तौलने के लिए सक्षमता आना है, अपने बड़े बुजुर्गो के सम्मान को वरीयता देना है, मातापिता को हर हाल में इज्जत व सहयोग करना है, इस धरती के संरक्षण के बारे में विचार करना है, प्राकृतिक संसाधनों के किफायती उपयोग का ध्यान रखना है, अपने जल संसाधनों को संरक्षित रखने के लिए आगे आना है। शिक्षा ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स को ऊपर लेकर जाने की कला है,

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अगर शिक्षा हमारे नजरिए को बदलने में सक्षम है तो उसे हम शिक्षा कहेंगे, अगर वही शिक्षण संस्थान विद्यार्थियों के  मानव मूल्यों में उन्नति नहीं कर पा रहे है तो ये विचारणीय बन जाता है। जब विद्यार्थी शिक्षा के द्वारा समाज को सशक्त नहीं बना पा रहे है, या ट्रैफिक नियमों का पालन नहीं कर पा रहे है, या रोड पर अपनी लेन में चलना नहीं सीख रहे है, या सड़क पर पैदल चलने वालों के लिए गाड़ियों को नहीं रोक रहे है, या रेड लाइट पर नहीं रुक रहे है, या खाने पीने के सामान के रैपर सड़क या रास्तों पर फेंक रहे है, या घर में बिजली के इक्विपमेंट यानी पंखे, लाइट चलते हुए छोड़ रहे है, या जोहड़ तालाबों को पाटकर कम्युनिटी सेंटर बना रहे है,

या लाइन में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार नहीं कर रहे है, या बस में चढ़ते हुए धक्का मुक्की कर रहे है, या शादी विवाह में खाने की भरी की भरी प्लेट छोड़ रहे है, या भूख से अधिक भोजन प्लेट में भर रहे है, या बात करते वक्त अपशब्दों का उपयोग कर रहे है, या स्पीड लिमिट से अधिक गाड़ी चला रहे है, टॉयलेट को बिना फ्लस के उपयोग कर रहे है, या राष्ट्रीय धरोहरों को नुकसान पहुंचा रहे है, या कहीं पर भी थूक रहे है, या अपने ही राष्ट्र के शहीदों का सम्मान नहीं कर रहे है, या नकल से एग्जाम पास कर रहे है,

या समय पर नहीं पहुंच रहे है, या लेट आने की वृति को बढ़ावा दे रहे है, या बेईमानी से राष्ट्र का धन लूट रहे है, या डॉक्टर होने के नाते भी मरीजों को गुमराह कर रहे है, या किसी दूसरे के अवसरों को हड़प रहे है तो फिर वो शिक्षा नहीं है वो केवल चालाक बनाने का एक टूल है, क्योंकि जो शिक्षा नागरिकों में नागरिकता ज्ञान नहीं लेकर आ सकती है वो शिक्षा तो कदापि नहीं हो सकती है। शिक्षा समाज का धन है, शिक्षा समाज की शक्ति है, शिक्षा समाज की एकजुटता है, शिक्षा राष्ट्र की संपति है, शिक्षा समाज की वेल्थ है, शिक्षा गुणों का पुष्पगुच्छ है, जिसके माध्यम से समाज सभी नागरिकों को जोड़ने का कार्य करता है,

अपने नागरिकों को सशक्त बनाने की शक्ति प्रदान करता है। यहां हम कुछ बिंदुओं पर विमर्श करेंगे जो हम सभी को शिक्षित होने के लिए महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखने के लिए प्रेरित करेंगे, जैसे;
1. शिक्षा से विनम्रता आनी चाहिए, जैसे वेद का एक मंत्र है कि " विद्या ददाति विनयम" अर्थात विद्या इंसान को विनय प्रदान करती है, वही विद्या है।
2. शिक्षा वह है जो प्रश्न करने का हौसला पैदा करें, सवाल करने की हिम्मत प्रदान करें।
3. शिक्षा वह है जो तर्कशील बनने की तरफ लेकर जाएं।
4. शिक्षा वह है जो समाज व राष्ट्र के प्रति लॉयल्टी सिखाएं।


5. शिक्षा वह है जो मानव मूल्यों के साथ, नैतिक मूल्यों के साथ जीवन जीने की प्रेरणा दें।
6. शिक्षा वह है जो अपने शिक्षकों, गुरुओं व मातापिता को आदर प्रदान करना सिखाएं।
7. शिक्षा वह है जो सड़क पर विनम्रता के साथ चलना सिखाएं, हॉर्न बजाना नहीं बल्कि धैर्य के साथ चलना सिखाएं।
8. शिक्षा वो है जो भाषा में सभ्यता को लेकर आवे।
9. शिक्षा वह है जो पक्षपात नहीं, बल्कि निष्पक्ष रहना सिखाएं, न्याय के साथ जीना सिखाएं।
10. शिक्षा वह है जो अपनी बारी का इंतजार करना सिखाएं, क्षमाशीलता सिखाएं।


11. शिक्षा वह है जो मानव का उत्थान करें,अगर शिक्षा प्राप्त करते वक्त भी आत्मिक पतन हो रहा है तो समझ लो वो शिक्षा नहीं है।
12. शिक्षा वह है जो छोटे बड़े के बीच कायदा कानून का एहसास कराएं, मन मस्तिष्क को धैर्य धीरज रखना सिखाएं।
13. शिक्षा वह है जो ईमानदारी रखना सिखाएं।
14. सामने से कोई बड़े बुजुर्ग, मातापिता या टीचर्स आ रहे है तो वहीं पर रुककर उनका सम्मान करना सिखाएं।
15. शिक्षा वह है जो मानव को सभ्य बनने के लिए प्रेरित करें।


अगर ऐसा नहीं हो रहा है तो फिर ऐसी शिक्षा का कोई लाभ नहीं है। जो व्यक्ति को कनिंग, चालाक, बेईमान, झूठ बोलने वाले, जो चोरी करना, समय पर न आने को गौरव बनाने वाला बनाए, एथिक्स से परे जाने को सम्मान समझे, तो समझ लो कि हम पतन की सीढ़ियां उतर रहे है। जीवन को गर्त में ले जा रहे है। इसलिए समय रहते अपनी शिक्षा व्यवस्था को संभालना हम सभी का कर्तव्य है, शिक्षा पंगु नहीं, ताकतवर व तर्कशील बनाती है, जिससे अच्छे बुरे को समझने का गुण विकसित होता है। यहां विषय ये है ही नहीं कि कौन किस पक्ष में खड़े है, विषय यहां मानव मूल्यों के उत्थान का है, एथिक्स का पालन करने का है, नैतिक मूल्यों के संरक्षण का है।

अगर हम ऐसे पाले में खड़े है जो हमे पतन की ओर, कमजोरी की ओर, अंधविश्वास की ओर, पाखंड की ओर, चाटुकारिता की ओर, मानसिक बीमारी की ओर, अपव्यय की ओर धकेल रहा है तो समझ लें कि हम अपनी अगली जेनरेशन के साथ अन्याय कर रहे है, फिर चाहे उसमें कोई भी शामिल हो, उनसे दूरी बनाने की जरूरत है, क्योंकि शिक्षा अगर व्यवसाय बन गई तो फिर वो सौदा करना सिखाएगी चाहे वो झूठ, फरेब, बेईमानी, चोरी, अत्याचार, शौषण, अपराध का ही क्यों न हो। शिक्षा को निष्पक्ष होना बेहद जरूरी है, क्योंकि आत्मबल नैतिक मूल्यों से मिलते है और नैतिक मूल्य सत्य, अहिंसा, सद्भावना, अस्तेय, अपरिग्रह, इंद्रियनिग्रह से ही मिलता है। आओ शिक्षा को शिक्षा रहने दें, और गलत का विरोध कर जीवन को सशक्त बनाने के लिए आगे बढ़े, ताकि हमारे प्राकृतिक संसाधन व मानव मूल्य नेक्स्ट पीढ़ी तक पहुंच सके।
जय हिंद, वंदे मातरम